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फ्रेंडली लोन पर झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ दोस्ती के आधार पर दिया गया पैसा NI Act की धारा 138 के तहत कानूनी कर्ज़ नहीं!

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AIN NEWS 1: झारखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामलों से जुड़े एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल “फ्रेंडली लोन” यानी दोस्ती या व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर दिया गया पैसा अपने आप में ऐसा कानूनी कर्ज़ नहीं माना जा सकता, जिसे Negotiable Instruments Act (NI Act) की धारा 138 के तहत लागू कराया जा सके।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी लेन-देन के पीछे वैध कानूनी अनुबंध (Legal Contract) या स्पष्ट प्रतिफल (Consideration) मौजूद नहीं है, तो उसे “कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। ऐसे मामलों में चेक बाउंस होने पर धारा 138 के तहत कार्रवाई स्वतः लागू नहीं होगी।

यह महत्वपूर्ण फैसला झारखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति Justice Rajesh Kumar की एकल पीठ ने सुनाया।

क्या था पूरा मामला?

मामला जमशेदपुर के Complaint C-1 Case No. 807 of 2007 से जुड़ा हुआ था। शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि उसने 3 जनवरी 2007 को आरोपी को उसके व्यवसाय में आर्थिक मदद देने के उद्देश्य से कुल 2 लाख रुपये उधार दिए थे।

शिकायतकर्ता के अनुसार, यह रकम “फ्रेंडली लोन” के तौर पर दी गई थी। इसमें से 1 लाख रुपये चेक के माध्यम से और 1 लाख रुपये नकद दिए गए थे।

इसके बदले आरोपी ने सुरक्षा के तौर पर दो पोस्ट-डेटेड चेक दिए थे—एक 1.5 लाख रुपये का और दूसरा 50 हजार रुपये का।

बाद में जब शिकायतकर्ता ने इन चेकों को बैंक में जमा किया तो दोनों चेक अपर्याप्त धनराशि (Insufficient Funds) के कारण बाउंस हो गए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने आरोपी को कानूनी नोटिस भेजकर भुगतान की मांग की। भुगतान न मिलने पर Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत मामला दर्ज कराया गया।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को किया था बरी

मामले की सुनवाई के बाद जमशेदपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने 28 जुलाई 2008 को आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया था।

ट्रायल कोर्ट का मानना था कि शिकायतकर्ता यह साबित नहीं कर पाया कि कथित रकम वास्तव में ऐसा कानूनी ऋण थी, जिसे कानून के तहत वसूल किया जा सके।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट में क्या हुई सुनवाई?

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने स्वयं को CW-1 के रूप में पेश किया। उसने अदालत को बताया कि आरोपी के साथ उसके दोस्ताना संबंध थे और उसी आधार पर उसने आर्थिक मदद की थी।

उसने यह भी कहा कि आरोपी ने अपने हाथों से चेक लिखकर दिए थे और यह राशि वापस करने के उद्देश्य से जारी किए गए थे।

वहीं दूसरी ओर बचाव पक्ष ने दलील दी कि यह कोई औपचारिक व्यावसायिक लेन-देन नहीं था। इसलिए इसे कानूनी रूप से लागू किए जाने योग्य ऋण नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि NI Act की धारा 138 मुख्य रूप से व्यापारिक और वित्तीय लेन-देन को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने के लिए बनाई गई है।

कोर्ट ने माना कि कानून के तहत चेक धारक के पक्ष में एक वैधानिक अनुमान (Statutory Presumption) जरूर होता है कि चेक किसी देनदारी या कर्ज़ के बदले जारी किया गया है। लेकिन यह अनुमान अंतिम नहीं होता। यदि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह दिखाते हैं कि कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण नहीं था, तो यह अनुमान टूट सकता है।

अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा:

“दोस्ती को किसी अनुबंध का आधार या वैध प्रतिफल नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट ने आगे कहा कि यदि किसी लेन-देन के पीछे वैध अनुबंध मौजूद नहीं है, तो उसे कानूनी रूप से लागू नहीं कराया जा सकता।

“फ्रेंडली लोन” पर अदालत की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने इस मामले में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं इस रकम को “फ्रेंडली लोन” बताया था।

अदालत ने कहा कि केवल व्यक्तिगत संबंधों या दोस्ती के आधार पर दिया गया पैसा हर स्थिति में कानूनी ऋण नहीं बन जाता। यदि उस लेन-देन को साबित करने के लिए पर्याप्त कानूनी दस्तावेज, समझौता या वैध अनुबंध मौजूद नहीं है, तो ऐसे मामले में धारा 138 का लाभ नहीं लिया जा सकता।

ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल से इनकार

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करने के बाद माना कि ट्रायल कोर्ट का फैसला उचित था और उसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता यह साबित करने में सफल नहीं हुआ कि कथित रकम ऐसा “Legally Enforceable Debt” थी, जिसकी वसूली कानून के माध्यम से की जा सकती थी।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोषमुक्ति के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया।

कानूनी विशेषज्ञ क्यों मान रहे हैं बड़ा फैसला?

कानूनी जानकारों के अनुसार यह फैसला भविष्य में आने वाले चेक बाउंस मामलों पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। खासतौर पर उन मामलों में जहां पैसे का लेन-देन केवल व्यक्तिगत भरोसे या दोस्ती के आधार पर किया गया हो।

यह फैसला इस बात का संकेत देता है कि अदालतें अब केवल चेक जारी होने को पर्याप्त नहीं मानेंगी, बल्कि यह भी देखेंगी कि उस चेक के पीछे कोई वैध और कानूनी देनदारी वास्तव में मौजूद थी या नहीं।

केस डिटेल

Case Title: Md. Masudul Haque Ansari v. State of Jharkhand and Others

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The Jharkhand High Court, in an important cheque bounce case under Section 138 of the Negotiable Instruments Act, ruled that a friendly loan based purely on personal relations does not automatically qualify as a legally enforceable debt. The court observed that friendship alone cannot form valid legal consideration for a contract. The judgment came in the case of Md. Masudul Haque Ansari v. State of Jharkhand and Others, where the High Court upheld the acquittal of the accused in a cheque dishonour dispute involving post-dated cheques and an alleged friendly loan transaction.

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