AIN NEWS 1 हाथरस: उत्तर प्रदेश के हाथरस से सात साल पुराने एससी/एसटी एक्ट के एक मामले में अदालत के फैसले के बाद मामला एक बार फिर चर्चा में है। विशेष सत्र न्यायालय (एससी/एसटी एक्ट) ने वन विभाग के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हरिओम दुबे को मामले में दोषमुक्त कर दिया। अदालत के सामने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी को समर्थन देने वाला कोई ठोस गवाह सामने नहीं आया। इतना ही नहीं, मामले के वादी ने भी अदालत में अपने शुरुआती आरोपों से अलग बयान दिया।
अदालत ने 18 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए हरिओम दुबे को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। साथ ही अदालत ने वादी के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही में झूठे साक्ष्य देने और झूठा मुकदमा दर्ज कराने के आरोपों को लेकर BNSS की धारा 383(1) के तहत अलग से कार्रवाई शुरू करने और नोटिस जारी करने का आदेश दिया।
2019 में दर्ज हुआ था मुकदमा
यह मामला वर्ष 2019 का है। रिपोर्टों के मुताबिक, फिरोजाबाद के शिकोहाबाद निवासी मान सिंह उस समय वन विभाग में चालक के पद पर कार्यरत थे। आरोप था कि 27 मई 2019 को ड्यूटी के दौरान डीएफओ कार्यालय के पास सरकारी वाहन से संबंधित विवाद के बाद उनकी हरिओम दुबे से कहासुनी हो गई।
मान सिंह ने आरोप लगाया था कि विवाद बढ़ने के बाद हरिओम दुबे ने उनके साथ मारपीट की, जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और पाइप से हमला किया। शिकायत में हाथ की हथेली में फ्रैक्चर होने की बात भी कही गई थी।
शिकायत के आधार पर पुलिस ने हरिओम दुबे के खिलाफ मारपीट, धमकी और एससी/एसटी एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। इसके बाद मामला अदालत पहुंचा और करीब सात वर्षों तक इसकी सुनवाई चली।
अदालत में बदल गया वादी का बयान
मामले की सुनवाई के दौरान घटनाक्रम में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब खुद वादी मान सिंह अपने शुरुआती आरोपों पर कायम नहीं रहे।
अदालत में दिए बयान के मुताबिक, उन्होंने बताया कि वाहन को पीछे करने के दौरान कहासुनी हुई थी और बाद में उनका पैर फिसल गया, जिससे वह गिर गए और उन्हें चोट आई। यानी अदालत में उन्होंने चोट लगने की वजह मारपीट के बजाय गिरना बताया।
मामले के अन्य गवाह भी अभियोजन की ओर से लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं कर सके। सुनवाई के दौरान घटना के समर्थन में ऐसा कोई प्रत्यक्ष तथ्यात्मक साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को अदालत के सामने साबित कर सके।
हरिओम दुबे को अदालत ने किया दोषमुक्त
गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद विशेष अदालत ने आरोपी हरिओम दुबे को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
अदालत के फैसले में कहा गया कि घटना के संबंध में कोई तथ्य का साक्षी अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं कर सका। इसके अलावा वादी ने स्वयं चोट का कारण गिरना बताया। इन परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रमाणित नहीं माना गया।
यहां यह समझना जरूरी है कि किसी आरोपी का अदालत से दोषमुक्त होना और किसी शिकायतकर्ता के खिलाफ झूठे मुकदमे का मामला अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। इस मामले में अदालत ने वादी के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया है, लेकिन उस कार्रवाई में आगे की न्यायिक प्रक्रिया पूरी होना अभी बाकी है।
वादी के खिलाफ BNSS की धारा 383(1) में कार्रवाई
अदालत ने मामले में वादी मान सिंह के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 383(1) के तहत कार्रवाई के लिए अलग वाद पंजीकृत करने और नोटिस जारी करने का निर्देश दिया।
अदालत के अनुसार, वादी द्वारा आरोपी के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराने और न्यायालय के सामने झूठे साक्ष्य दिए जाने को लेकर यह कार्रवाई की जा रही है। अब इस प्रक्रिया में संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और आगे की कार्रवाई न्यायालय के आदेशों के अनुसार होगी।
इसलिए खबर को कानूनी रूप से सटीक रखने के लिए यह कहना उचित है कि अदालत ने वादी के खिलाफ झूठे मुकदमे और झूठे साक्ष्य को लेकर कार्रवाई का आदेश दिया है, न कि यह कि वादी को पहले ही झूठे मुकदमे के लिए दोषी ठहरा दिया गया है।
सरकारी सहायता मिली तो वापस करनी होगी
इस मामले में अदालत ने आर्थिक सहायता से जुड़ा महत्वपूर्ण निर्देश भी दिया है।
अदालत ने कहा कि यदि वादी ने एससी/एसटी एक्ट के तहत सरकार से किसी प्रकार की सहायता या अनुदान राशि प्राप्त की है, तो उसे यह रकम एक महीने के भीतर जिला समाज कल्याण विभाग में वापस जमा करनी होगी।
अगर निर्धारित समय में राशि वापस नहीं की जाती है तो जिलाधिकारी, हाथरस को उसकी वसूली करने के निर्देश दिए गए हैं।
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एससी/एसटी मामलों में पात्र पीड़ितों को कानून के तहत राहत और पुनर्वास सहायता उपलब्ध कराने का प्रावधान है। ऐसे में अदालत द्वारा किसी मामले में सहायता राशि वापस करने का निर्देश दिए जाने से उस मामले की न्यायिक जांच और उसके परिणाम का आर्थिक सहायता पर प्रभाव भी सामने आता है।
एससी/एसटी एक्ट के मामलों में सत्यापन पर जोर
हाथरस का यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश में एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों और राहत राशि के सत्यापन को लेकर भी न्यायिक स्तर पर चर्चा हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल में एससी/एसटी एक्ट से जुड़े मामलों में सरकारी सहायता जारी करने से पहले उचित जांच और सत्यापन व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया था। एक मामले में गाजियाबाद में डेढ़ साल के दौरान दर्ज कुछ मामलों के फर्जी पाए जाने और सहायता राशि की रिकवरी का भी उल्लेख किया गया।
रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने राहत राशि को वास्तविक पात्र पीड़ितों तक पहुंचाने के लिए निगरानी और सत्यापन व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताई है। इसी क्रम में मामलों और राहत दावों की जांच को अधिक व्यवस्थित बनाने की बात सामने आई है।
सात साल पुराने मामले में आया फैसला
करीब सात साल तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब इस मामले में अदालत का फैसला सामने आया है। एक तरफ हरिओम दुबे को मामले में दोषमुक्त कर दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ वादी के खिलाफ झूठे साक्ष्य और मुकदमे को लेकर अलग न्यायिक प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया गया है।
अब आगे की प्रक्रिया में यह देखा जाएगा कि BNSS की धारा 383(1) के तहत शुरू की गई कार्यवाही में अदालत क्या निष्कर्ष निकालती है और वादी की ओर से क्या जवाब दिया जाता है।
क्या है पूरे मामले का सार?
मामला वर्ष 2019 में दर्ज हुआ था।
शिकायतकर्ता ने वन विभाग के कर्मचारी हरिओम दुबे पर मारपीट, पाइप से हमला और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप लगाया था।
मामले की सुनवाई के दौरान वादी अपने शुरुआती आरोपों से अलग बयान पर आ गया।
वादी ने चोट गिरने से लगने की बात कही।
अन्य गवाह भी अभियोजन की कहानी की पुष्टि नहीं कर सके।
18 सितंबर 2026 को विशेष अदालत ने हरिओम दुबे को दोषमुक्त कर दिया।
अदालत ने वादी के खिलाफ BNSS धारा 383(1) के तहत कार्रवाई के लिए अलग वाद और नोटिस का आदेश दिया।
यदि वादी ने सरकारी सहायता/अनुदान प्राप्त किया है तो अदालत ने उसे एक महीने में वापस करने का निर्देश दिया है।
राशि वापस नहीं होने पर हाथरस के जिलाधिकारी को रिकवरी की कार्रवाई करने को कहा गया है।
इस मामले में आगे की कानूनी कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि आरोपी के दोषमुक्त होने के बाद अब वादी के खिलाफ अदालत द्वारा शुरू की गई प्रक्रिया पर भी न्यायिक निर्णय होना बाकी है।
The Hathras SC/ST case dating back to 2019 has reached an important legal stage after the Special Sessions Court acquitted forest department employee Hariom Dubey. The court found that the prosecution evidence did not establish the allegations, while the complainant gave a different account of how the injury occurred. The court also ordered proceedings against the complainant under BNSS Section 383(1) concerning false evidence and directed that any government assistance received under the SC/ST Act be returned within one month.



















