AIN NEWS 1 रांची, झारखंड। झारखंड हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में चार दोषियों की अपील खारिज करते हुए उन्हें सुनाई गई 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि घटना के 72 घंटे बाद हुई मेडिकल जांच में वीर्य नहीं मिलने, प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने में तीन दिन की देरी होने या शुरुआत में आरोपियों के नाम नहीं बता पाने के आधार पर पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, पीड़िता के बयान और मेडिकल रिपोर्ट पर विचार करने के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि पीड़िता के शरीर पर मिले चोटों के निशान उसकी गवाही की पुष्टि करने वाले महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। बचाव पक्ष भी ऐसा कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो सके कि पीड़िता ने आरोपियों को झूठे मामले में फंसाया था।
हाईकोर्ट के इस फैसले में एक बार फिर स्पष्ट किया गया कि यौन अपराधों के मामलों में मेडिकल रिपोर्ट को पीड़िता की गवाही से अलग करके नहीं देखा जा सकता। मामले की परिस्थितियों, बयान की विश्वसनीयता और उपलब्ध सभी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करना आवश्यक है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के पटमदा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 5 नवंबर 2013 की है। उस दिन पीड़िता अपने ससुराल से मायके जा रही थी। रास्ते में जब वह लपित छेंचा जंगल के आसपास पहुंची, तब चार आरोपियों ने कथित तौर पर उसे घेर लिया।
आरोप था कि चारों व्यक्ति पीड़िता को जबरन जंगल के भीतर ले गए और उसके साथ बारी-बारी से सामूहिक दुष्कर्म किया। अभियोजन के मुताबिक, आसपास लोगों की आहट मिलने पर आरोपी मौके से भाग निकले।
घटना के बाद पीड़िता ने मदद मांगी। इसके बाद मामले को गांव के स्तर पर सुलझाने के लिए पंचायत बुलाए जाने की बात सामने आई। हालांकि, आरोपी पंचायत में उपस्थित नहीं हुए और मामला पुलिस तक पहुंचा।
पीड़िता की शिकायत पर 8 नवंबर 2013 को पटमदा थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई। यानी घटना के तीन दिन बाद कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। बाद में पुलिस की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान मामला अदालत पहुंचा।
FIR में तीन दिन की देरी पर अदालत ने क्या कहा?
आरोपियों की ओर से अपील में प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई देरी को सवालों के घेरे में रखा गया था। सामान्य तौर पर आपराधिक मामलों में शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी की परिस्थितियों पर विचार किया जाता है, ताकि यह समझा जा सके कि देरी का कोई उचित कारण था या नहीं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले में पीड़िता की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण को स्वीकार किया। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि पीड़िता के गांव में पुलिस के पास जाने से पहले पंचायत बुलाने की परंपरा थी। इसी सामाजिक व्यवस्था के कारण तत्काल पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बजाय पहले गांव के स्तर पर मामला सुलझाने का प्रयास किया गया।
अदालत ने परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए माना कि केवल तीन दिन की देरी को पीड़िता की गवाही पर संदेह करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी का मूल्यांकन किसी तय समयसीमा के आधार पर नहीं, बल्कि मामले की वास्तविक परिस्थितियों और दिए गए स्पष्टीकरण के आधार पर किया जाना चाहिए।
आरोपियों के नाम तुरंत नहीं बता पाना भी नहीं बना आधार
बचाव पक्ष की ओर से पीड़िता द्वारा शुरुआत में आरोपियों के नाम नहीं बता पाने का मुद्दा भी उठाया गया था। अदालत ने इस पहलू पर विचार करते हुए पाया कि नाम नहीं बता पाना और आरोपियों की पहचान नहीं कर पाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
मामले में पीड़िता ने अदालत के सामने आरोपियों की पहचान उनके चेहरों के आधार पर की थी। इसलिए शुरुआती चरण में नामों की जानकारी नहीं होने को उसकी गवाही खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।
अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता को ध्यान में रखते हुए बचाव पक्ष की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
72 घंटे बाद मेडिकल जांच में वीर्य नहीं मिला, फिर भी सजा क्यों बरकरार रही?
इस मामले में मेडिकल रिपोर्ट भी सुनवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। घटना के लगभग 72 घंटे बाद पीड़िता की चिकित्सकीय जांच हुई थी। जांच में वीर्य नहीं मिलने को आरोपियों की ओर से अपनी दलीलों के समर्थन में उठाया गया।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को निर्णायक नहीं माना। अदालत ने कहा कि घटना और मेडिकल जांच के बीच लगभग तीन दिन का अंतर था। ऐसे में केवल वीर्य नहीं मिलने के आधार पर पीड़िता के बयान को अविश्वसनीय नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि पीड़िता के शरीर के विभिन्न हिस्सों पर चोटों के निशान मिले थे। मेडिकल रिपोर्ट में पीठ, स्तन, कलाई और पैरों सहित शरीर के अन्य हिस्सों पर चोट के निशान दर्ज किए गए थे। अदालत ने इन चोटों को पीड़िता की गवाही के समर्थन में महत्वपूर्ण माना।
इस मामले में न्यायालय का दृष्टिकोण यह रहा कि किसी एक चिकित्सकीय निष्कर्ष को पूरे मामले का अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता। मेडिकल रिपोर्ट, घटनाक्रम, पीड़िता का बयान और अन्य उपलब्ध साक्ष्य एक साथ देखकर ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि मेडिकल साक्ष्य महत्वहीन हैं। अदालत का जोर इस बात पर था कि मेडिकल रिपोर्ट में किसी एक विशेष साक्ष्य का नहीं मिलना अपने आप में घटना नहीं होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
झूठा फंसाने की दलील को भी नहीं मिला समर्थन
आरोपियों ने अपनी अपील में यह दलील भी दी कि उन्हें झूठा फंसाया गया है। लेकिन हाईकोर्ट के सामने इस दावे के समर्थन में कोई ठोस मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
अदालत ने पीड़िता की गवाही, शरीर पर मिले चोटों के निशान और मामले की अन्य परिस्थितियों का मूल्यांकन किया। इन तथ्यों के आधार पर पीड़िता के बयान को विश्वसनीय माना गया।
हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने आरोपियों को दोषी ठहराने में कोई ऐसी गलती नहीं की थी, जिसके कारण उसके फैसले में हस्तक्षेप करना आवश्यक हो।
निचली अदालत ने 2018 में सुनाई थी सजा
इस मामले में जमशेदपुर की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-X सह फास्ट ट्रैक अदालत ने 23 अगस्त 2018 को चारों आरोपियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 29 अगस्त 2018 को प्रत्येक दोषी को 20 साल के कठोर कारावास और 40,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।
इस फैसले को आरोपियों ने झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपीलों पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत के निष्कर्षों और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा की।
अंततः खंडपीठ ने अपीलें खारिज कर दीं और चारों दोषियों की 20-20 साल के कठोर कारावास तथा प्रत्येक पर 40,000 रुपये जुर्माने की सजा बरकरार रखी।
फैसले का कानूनी महत्व
झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला यौन अपराधों से जुड़े मामलों में साक्ष्यों के मूल्यांकन के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी, आरोपियों के नाम तुरंत नहीं बता पाना या मेडिकल जांच में वीर्य नहीं मिलना जैसे तथ्यों का मूल्यांकन मामले की पूरी परिस्थितियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
ऐसे मामलों में पीड़िता की गवाही की विश्वसनीयता, बयान की निरंतरता, घटनाक्रम, चिकित्सकीय निष्कर्ष और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को एक साथ देखा जाना आवश्यक है। यदि पीड़िता का बयान भरोसेमंद है, तो केवल किसी एक सहायक साक्ष्य के अभाव में उसे स्वतः खारिज नहीं किया जा सकता।
इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि अदालतें शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी के पीछे मौजूद सामाजिक परिस्थितियों पर विचार कर सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत के माध्यम से विवाद सुलझाने की कोशिश जैसे तथ्यों को मामले के संदर्भ में परखा जा सकता है।
झारखंड हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और पीड़िता की विश्वसनीय गवाही के आधार पर चारों दोषियों की अपील खारिज कर दी। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 20 साल के कठोर कारावास और प्रत्येक दोषी पर 40,000 रुपये जुर्माने की सजा को बरकरार रखा।
AIN NEWS 1 के लिए कानूनी समाचार।
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The Jharkhand High Court has upheld the 20-year rigorous imprisonment sentence imposed on four convicts in a gang rape case from East Singhbhum district. The court dismissed their appeals, observing that a three-day delay in filing the FIR, the initial inability to name the accused, and the absence of semen in a medical examination conducted 72 hours after the incident do not automatically discredit credible survivor testimony. The court considered the injuries recorded in the medical report and the overall evidence while upholding the trial court’s judgment. The ruling highlights the importance of evaluating medical evidence, witness credibility, delayed reporting and the circumstances of sexual assault cases in India.
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