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कांवड़ यात्रा में भीड़ के बावजूद बंद हैं ढाबे! होटल कारोबारियों में डर और नाराजगी क्यों?

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Why Are Hotels and Dhabas Shut on Kanwar Route Despite Huge Pilgrim Rush?

कांवड़ यात्रा में श्रद्धालुओं की भीड़, फिर भी बंद हैं ढाबे! जानिए होटल कारोबारियों की परेशानी

AIN NEWS 1: हरिद्वार से शुरू हुई कांवड़ यात्रा पूरे उत्तर भारत में धार्मिक उत्साह का प्रतीक बन चुकी है। लाखों शिवभक्त गंगाजल लेकर मेरठ, मुजफ्फरनगर होते हुए दिल्ली, गुरुग्राम और पंजाब तक यात्रा कर रहे हैं। हर साल की तरह इस बार भी भीड़ जबरदस्त है, सड़कें श्रद्धालुओं से भरी पड़ी हैं। लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस पूरे मार्ग पर जहां-जहां ढाबे और होटल दिखाई देते थे, वे अब सुनसान पड़े हैं — दरवाजे बंद, खिड़कियों पर ताले और साइनबोर्ड ढके हुए हैं।

AIN NEWS 1 की टीम ने इस स्थिति की पड़ताल की और कुछ चौंकाने वाले कारण सामने आए।

ढाबा मालिकों की चिंता: भीड़ नहीं, सुरक्षा का डर

टीम सबसे पहले पहुंची मेरठ के मशहूर ‘मलिक ढाबा’ पर। ये ढाबा आम दिनों में काफी मशहूर है, खासकर कांवड़ यात्रा के दौरान। लेकिन इस बार यहां पूरी तरह सन्नाटा था, ढाबे के बाहर पर्दे लगे हुए थे और शटर बंद। जब आसपास के लोगों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि पिछले साल यात्रा के दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने ढाबे में जमकर तोड़फोड़ की थी, जिससे ढाबा मालिक काफी नुकसान में आ गए थे। इसी डर से उन्होंने इस बार यात्रा के दौरान ढाबा ही बंद रखने का निर्णय लिया है।

‘जैन शिकंजी’ भी बंद: कैमरे से दूर रहना चाहते हैं व्यापारी

इसके बाद टीम मेरठ से मुजफ्फरनगर की ओर बढ़ी और रास्ते में प्रसिद्ध ‘जैन शिकंजी’ ढाबा देखा। हमेशा चहल-पहल वाले इस ढाबे पर भी ताले जड़े थे और चारों ओर खामोशी पसरी हुई थी। जब वहां के मालिक से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कैमरे के सामने आने से मना कर दिया, लेकिन इतना जरूर कहा कि ” कुछ कांवड़ियों के व्यवहार से डर लगता है, इसलिए कुछ दिनों के लिए ढाबा बंद रखना ही ठीक समझा।”

 ‘नीलकंठ ढाबा’: नुकसान से बचने के लिए बंद

टीम की अगली मंजिल थी ‘नीलकंठ ढाबा’, जो पूरे क्षेत्र में एक प्रमुख भोजनालय माना जाता है। लेकिन यह भी पूरी तरह से बंद मिला। ढाबा मालिक से बात करने पर उन्होंने बताया कि कांवड़ यात्रा के दौरान ही कुछ लोग ज्यादा हुड़दंग मचाते हैं, तोड़फोड़ भी करते हैं, जिसकी कीमत उन्हें उठानी पड़ती है। उनके अनुसार, कई बार तो स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि पुलिस बुलानी पड़ती है।

वे बताते हैं, “हम किसी धर्म या आस्था के खिलाफ बिल्कुल  नहीं हैं, लेकिन अगर धार्मिक यात्रा के नाम पर हमारे व्यवसाय को नुकसान हो, तो हमें भी अपने परिवार का पेट पालने के लिए सोच-समझकर कदम उठाना पड़ता है।”

 “कांवड़ कैंपों में खाना मिल जाता है, ढाबे में क्यों आएं?”

एक और बड़ी वजह जो ढाबा मालिकों ने बताई, वह यह थी कि अधिकतर कांवड़िए ढाबों पर खाना नहीं खाते, बल्कि उन्हें रास्ते में बने कांवड़ कैंपों में मुफ्त भोजन, जलपान, फल और प्रसाद मिल जाता है। इससे ढाबों पर ग्राहकों की संख्या काफी कम हो जाती है और बिक्री में गिरावट आती है। ऐसे में उन्हें ढाबा खोलने का कोई आर्थिक लाभ नहीं दिखता।

पुलिस पर भरोसा नहीं?

सवाल उठता है कि जब मार्ग पर चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात है, तो फिर ढाबा और होटल मालिकों को सुरक्षा को लेकर इतनी चिंता क्यों है? इस पर प्रशासन का कहना है कि किसी भी तरह की गड़बड़ी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हाल ही में जो भी घटनाएं हुई हैं, उन पर कार्रवाई की गई है।

मेरठ पुलिस के एक अधिकारी ने बताया:

“हम पूरी सतर्कता से निगरानी कर रहे हैं। CCTV कैमरे, क्विक रिस्पॉन्स टीम और अस्थायी पुलिस चेक पोस्ट जगह-जगह लगाए गए हैं। लोगों को डरने की जरूरत नहीं है।”

लेकिन ढाबा मालिकों की भावनाएं अलग हैं। उनका कहना है कि तोड़फोड़ या बवाल होने पर पुलिस बाद में आती है, लेकिन नुकसान तो हमें उसी समय हो जाता है।

श्रद्धा का मौसम, लेकिन घाटे का सौदा

कांवड़ यात्रा का सीजन ढाबा कारोबारियों के लिए आमतौर पर कमाई का सुनहरा मौका माना जाता है। लेकिन जब वही सीजन डर और नुकसान का कारण बन जाए, तो वे विवश होकर अपना कारोबार बंद करने पर मजबूर हो जाते हैं।

कांवड़ मार्ग के हर दसवें किलोमीटर पर बंद होटल और ढाबे इस चिंता को जाहिर करते हैं कि धार्मिक यात्राओं का माहौल शांतिपूर्ण और भरोसेमंद हो — तभी श्रद्धा भी बनी रहे और व्यापार भी।

हर साल की तरह इस बार भी करोड़ों शिवभक्त कांवड़ यात्रा पर निकले हैं। लेकिन यह भी जरूरी है कि इस धार्मिक आयोजन का माहौल संयमित, अनुशासित और सभी के लिए सुरक्षित हो। ढाबा मालिकों की चिंता भी उतनी ही वैध है जितनी किसी श्रद्धालु की आस्था। प्रशासन, समाज और संगठनों को मिलकर ऐसे प्रयास करने होंगे जिससे आस्था का पर्व सभी के लिए खुशियों का कारण बने — न कि डर और नुकसान का।

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During the 2025 Kanwar Yatra, millions of pilgrims are traveling through key routes like Haridwar, Muzaffarnagar, and Meerut. Yet, hotels and dhabas on these routes remain shut. Our ground report uncovers why dhaba owners are closing shops during peak season, fearing vandalism and disturbances despite police deployment. This closure on the Kanwar route highlights issues of law, trust, and economic loss during a time that is usually seen as profitable for food businesses.

 

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