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लखनऊ हाईकोर्ट में वसीम रिज़वी की PIL खारिज, शिया-सुन्नी वक्फ बोर्ड के विलय की मांग पर कोर्ट ने दी नई याचिका दाखिल करने की छूट!

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लखनऊ हाईकोर्ट में वसीम रिज़वी की PIL खारिज, शिया-सुन्नी वक्फ बोर्ड के विलय की मांग पर कोर्ट ने दी नई याचिका दाखिल करने की छूट

AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड को एकीकृत कर एक संयुक्त वक्फ बोर्ड बनाए जाने की मांग को लेकर दायर की गई जनहित याचिका (PIL) पर आज इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में अहम सुनवाई हुई। यह याचिका श्री जीतेन्द्र नारायण सिंह उर्फ सैय्यद वसीम रिज़वी की ओर से दाखिल की गई थी।

हालांकि, सुनवाई के दौरान उठाए गए एक प्रारंभिक आपत्ति (Preliminary Objection) के आधार पर कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही याचिकाकर्ता को सही नाम के साथ नई याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता भी प्रदान की गई।

📌 क्या थी याचिका की मुख्य मांग?

इस जनहित याचिका (WPIL No. 182/2026) में राज्य सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी कि उत्तर प्रदेश में मौजूदा शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों को समाप्त कर एक एकीकृत वक्फ बोर्ड का गठन किया जाए।

याचिका में दलील दी गई थी कि वक्फ अधिनियम की धारा 13(2) के अनुसार किसी भी राज्य में अलग शिया वक्फ बोर्ड का गठन तभी किया जा सकता है, जब उस राज्य में कुल वक्फ संपत्तियों में से कम से कम 15 प्रतिशत संपत्तियां शिया वक्फ के अंतर्गत आती हों।

याचिकाकर्ता का कहना था कि उत्तर प्रदेश में शिया वक्फ संपत्तियों की संख्या इस निर्धारित सीमा से कम है, ऐसे में अलग शिया वक्फ बोर्ड बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है।

📌 नामित सदस्यों को हटाने की भी उठाई गई मांग

याचिका में एक अन्य महत्वपूर्ण मांग यह भी की गई थी कि शिया और सुन्नी दोनों वक्फ बोर्डों में नियुक्त (Nominated) सदस्यों को तत्काल प्रभाव से हटाया जाए।

इस संबंध में यह तर्क दिया गया कि अप्रैल 2025 में वक्फ अधिनियम में किए गए संशोधन के बाद पहले से गठित बोर्डों में केवल निर्वाचित (Elected) सदस्य ही अपने कार्यकाल को पूरा करने के पात्र हैं। ऐसे में नामित सदस्यों का पद पर बने रहना संशोधित कानून के प्रावधानों के विरुद्ध है।

⚖️ सुनवाई के दौरान उठा नाम को लेकर विवाद

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और दोनों वक्फ बोर्डों की ओर से याचिका की वैधता पर प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कराई गई।

उनका कहना था कि यह PIL भले ही श्री जीतेन्द्र नारायण सिंह के नाम से दाखिल की गई है, लेकिन याचिका के साथ संलग्न हलफनामे में प्रस्तुत आधार कार्ड में याचिकाकर्ता का नाम केवल “सैय्यद वसीम रिज़वी” दर्ज है।

इतना ही नहीं, याचिका के साथ ऐसा कोई भी दस्तावेज या प्रमाण संलग्न नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने विधिवत रूप से अपना नाम बदलकर जीतेन्द्र नारायण सिंह रख लिया है।

इसके अतिरिक्त, याचिका में कहीं भी यह उल्लेख नहीं किया गया था कि उन्होंने इस्लाम धर्म का त्याग कर हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया है और इसी कारण उनका नाम परिवर्तन हुआ है।

🏛️ कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने सरकार और वक्फ बोर्ड की ओर से उठाए गए इन प्रारंभिक आपत्तियों को गंभीरता से लिया और उन्हें स्वीकार कर लिया।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब याचिका में उल्लिखित नाम और प्रस्तुत पहचान पत्र में दर्ज नाम में स्पष्ट अंतर है, तो याचिका की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इस स्थिति में याचिका पर आगे की सुनवाई करना न्यायोचित नहीं होगा।

इसी आधार पर अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह छूट भी दी कि वे अपने सही और प्रमाणित नाम के साथ नई याचिका दाखिल कर सकते हैं।

👨‍⚖️ किन जजों की बेंच ने की सुनवाई?

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई कोर्ट नंबर-1 में जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस अभिषेक कुमार चौधरी की खंडपीठ द्वारा की गई।

सुनवाई के दौरान:

शिया वक्फ बोर्ड की ओर से एडवोकेट सैय्यद आफताब अहमद ने पक्ष रखा।

वहीं, सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से एडवोकेट मोहम्मद हमजा शमीम ने बहस की।

दोनों पक्षों ने याचिका में नाम संबंधी विसंगतियों को रेखांकित करते हुए इसे तकनीकी रूप से त्रुटिपूर्ण बताया।

📍 आगे क्या हो सकता है?

अब इस मामले में आगे की कार्यवाही इस बात पर निर्भर करेगी कि याचिकाकर्ता अपने सही नाम और वैध दस्तावेजों के साथ नई याचिका दाखिल करते हैं या नहीं।

यदि नई याचिका दाखिल होती है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कोर्ट इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई के लिए सहमत होता है या नहीं, क्योंकि यह मामला उत्तर प्रदेश में वक्फ बोर्डों की संरचना और प्रशासनिक व्यवस्था से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।

The Lucknow Bench of Allahabad High Court has dismissed a Public Interest Litigation (PIL) filed by Wasim Rizvi seeking the merger of Shia and Sunni Waqf Boards in Uttar Pradesh under the Waqf Act Section 13(2). The court rejected the petition due to discrepancies in the petitioner’s name and granted liberty to file a fresh writ petition with proper documentation. The case highlights key legal issues related to the Uttar Pradesh Waqf Board structure, Waqf Act Amendment 2025, and governance of Shia and Sunni Waqf properties in India.

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