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मोदी सरकार का मिशन 360: महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर दो-तिहाई बहुमत की तैयारी, मानसून सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक

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AIN NEWS 1 | 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार एक बार फिर उन बड़े विधेयकों को आगे बढ़ाने की रणनीति बना रही है, जिनके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार महिला आरक्षण और लोकसभा सीटों के परिसीमन (Delimitation) से जुड़े विधेयकों को आगे बढ़ाने की तैयारी कर सकती है।

इसी रणनीति के तहत केंद्र सरकार ने 19 जुलाई को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इस बैठक में सरकार सभी राजनीतिक दलों को मानसून सत्र के एजेंडे से अवगत कराएगी और संसद के सुचारू संचालन के लिए सहयोग मांगेगी। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक में सरकार विभिन्न दलों का रुख भी जानने का प्रयास करेगी, ताकि महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर समर्थन की संभावनाओं का आकलन किया जा सके।

मिशन 360 क्या है और क्यों है अहम?

लोकसभा में किसी सामान्य विधेयक को पारित कराने के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त होता है, लेकिन संविधान संशोधन से जुड़े विधेयकों के लिए संसद में विशेष बहुमत यानी दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है।

लोकसभा की कुल 543 सीटों में फिलहाल कुछ सीटें रिक्त हैं। ऐसे में प्रभावी संख्या के आधार पर दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा लगभग 360 सांसदों के आसपास माना जा रहा है। इसी लक्ष्य को राजनीतिक हलकों में “मिशन 360” कहा जा रहा है।

सरकार का मानना है कि यदि उसे पर्याप्त सहयोगी और कुछ विपक्षी दलों का समर्थन मिल जाता है, तो वह संवैधानिक संशोधन वाले महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की स्थिति में पहुंच सकती है।

महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर सरकार की नजर

राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े मुद्दों पर आगे बढ़ सकती है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक आधिकारिक रूप से यह घोषणा नहीं की गई है कि ये विधेयक मानसून सत्र में निश्चित रूप से पेश किए जाएंगे।

महिला आरक्षण लंबे समय से देश की राजनीति का प्रमुख मुद्दा रहा है। वहीं परिसीमन का विषय भी काफी संवेदनशील माना जाता है क्योंकि इससे लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं एवं सीटों की संख्या में बदलाव संभव होता है।

इसी कारण इन दोनों विषयों पर राजनीतिक दलों के अलग-अलग मत रहे हैं और संसद में व्यापक सहमति बनाना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

अप्रैल में नहीं मिल पाया था पर्याप्त समर्थन

सूत्रों के अनुसार, संसद के विशेष सत्र के दौरान सरकार इन मुद्दों पर आगे बढ़ना चाहती थी, लेकिन उस समय आवश्यक राजनीतिक समर्थन नहीं मिलने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

अब करीब तीन महीने बाद सरकार फिर से राजनीतिक समीकरण मजबूत करने में जुटी हुई है। माना जा रहा है कि इसी उद्देश्य से लगातार बैठकों का दौर चल रहा है और सहयोगी दलों के साथ संवाद बढ़ाया गया है।

बीजेपी में लगातार हो रही रणनीतिक बैठकें

मानसून सत्र से पहले भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की कई महत्वपूर्ण बैठकें हुई हैं। सबसे अहम बैठक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास पर हुई, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन और संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।

सूत्रों के अनुसार, इन बैठकों में केवल संसद की रणनीति ही नहीं बल्कि संगठनात्मक बदलाव, विपक्ष की संभावित रणनीति और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों पर भी विस्तृत चर्चा हुई।

यह भी माना जा रहा है कि जल्द ही बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान किया जा सकता है। इसके लिए विभिन्न राज्यों से संभावित पदाधिकारियों के नामों पर विचार किया जा रहा है।

क्या सरकार पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में है?

बीजेपी और एनडीए का मानना है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में सरकार पहले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में है।

सरकार को उम्मीद है कि कुछ ऐसे क्षेत्रीय दल भी विशेष परिस्थितियों में समर्थन दे सकते हैं जो हर मुद्दे पर विपक्ष के साथ नहीं चलते। इसी वजह से सरकार विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ संवाद बनाए हुए है।

हालांकि विपक्ष का दावा है कि संविधान से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मामलों पर सरकार के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना आसान नहीं होगा।

किन दलों पर टिकी हैं सरकार की नजर?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सरकार की नजर कुछ ऐसे क्षेत्रीय दलों पर है जिनका संसद में प्रभावी प्रतिनिधित्व है।

चर्चा है कि डीएमके, वाईएसआरसीपी, शरद पवार गुट और कुछ अन्य दलों के रुख पर सरकार की विशेष नजर बनी हुई है। हालांकि इन दलों की ओर से किसी भी संभावित समर्थन को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

सूत्रों के मुताबिक, सरकार यह भी देख रही है कि किन मुद्दों पर विपक्ष के भीतर मतभेद पैदा हो सकते हैं और किन दलों के साथ सहमति बनाई जा सकती है।

डीएमके को लेकर क्यों हो रही है चर्चा?

राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि तमिलनाडु की राजनीति में बदले हुए समीकरणों के कारण डीएमके का रुख भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकता है।

हालांकि यह भी सच है कि इससे पहले परिसीमन जैसे मुद्दों पर डीएमके खुलकर विरोध दर्ज करा चुकी है। ऐसे में सरकार को समर्थन मिलेगा या नहीं, यह पूरी तरह राजनीतिक परिस्थितियों और विधेयक की अंतिम रूपरेखा पर निर्भर करेगा।

फिलहाल इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

एनडीए का मौजूदा राजनीतिक गणित

लोकसभा में एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत है, लेकिन संविधान संशोधन के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता।

राजनीतिक गणित के अनुसार यदि कुछ क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय सांसदों का समर्थन सरकार को मिल जाता है, तो एनडीए का आंकड़ा काफी बढ़ सकता है।

इसी संभावित गणित के आधार पर राजनीतिक विश्लेषण किया जा रहा है कि सरकार दो-तिहाई बहुमत के लक्ष्य के कितने करीब पहुंच सकती है।

हालांकि अंतिम स्थिति संसद में मतदान के समय ही स्पष्ट होगी।

अमित शाह की लगातार राजनीतिक बैठकें

पिछले कुछ दिनों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कई महत्वपूर्ण नेताओं से मुलाकात की है।

उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। इसके अलावा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और अन्य नेताओं के साथ भी अलग-अलग बैठकें कीं।

राजनीतिक जानकार इन बैठकों को मानसून सत्र की तैयारी और संसद में संख्या बल मजबूत करने की रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं।

हालांकि सरकार की ओर से इन बैठकों को नियमित राजनीतिक और संगठनात्मक गतिविधियों का हिस्सा बताया गया है।

विपक्ष की रणनीति भी तैयार

जहां एक ओर सरकार समर्थन जुटाने में लगी है, वहीं कांग्रेस सहित विपक्षी दल भी अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।

विपक्ष का प्रयास रहेगा कि यदि सरकार संवैधानिक संशोधन से जुड़े बड़े विधेयक लाती है तो संयुक्त रणनीति के जरिए उसका सामना किया जाए।

विपक्षी दलों का कहना है कि ऐसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर व्यापक चर्चा और सभी राज्यों की सहमति आवश्यक है।

अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे गुट के संकेत

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पहले भी कुछ शर्तों के साथ महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर समर्थन की बात कह चुके हैं।

वहीं शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के नेता संजय राउत ने भी संकेत दिए हैं कि यदि उनकी कुछ मांगों पर सरकार विचार करती है तो पार्टी समर्थन पर विचार कर सकती है।

हालांकि दोनों दलों की ओर से अभी तक कोई अंतिम और आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है।

19 जुलाई की सर्वदलीय बैठक क्यों है महत्वपूर्ण?

मानसून सत्र शुरू होने से पहले होने वाली सर्वदलीय बैठक संसदीय परंपरा का हिस्सा होती है।

इस बैठक में सरकार सभी दलों को संसद के एजेंडे की जानकारी देती है और सदन को सुचारू रूप से चलाने के लिए सहयोग का आग्रह करती है।

इस बार यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि राजनीतिक हलकों में कई बड़े विधेयकों को लेकर चर्चाएं तेज हैं।

संभावना है कि इस बैठक के दौरान विभिन्न दल अपने-अपने मुद्दे भी सरकार के सामने रखेंगे।

21 जुलाई को होगी एनडीए संसदीय दल की बैठक

सर्वदलीय बैठक के बाद 21 जुलाई को एनडीए संसदीय दल की बैठक भी प्रस्तावित है।

इस बैठक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संबोधित करेंगे। माना जा रहा है कि इसमें मानसून सत्र की रणनीति, सांसदों की भूमिका और संसद में सरकार की प्राथमिकताओं पर चर्चा होगी।

मानसून सत्र पर पूरे देश की नजर

इस बार का मानसून सत्र कई मायनों में बेहद अहम माना जा रहा है। एक तरफ सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहती है, तो दूसरी ओर विपक्ष भी सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है।

यदि सरकार महिला आरक्षण या परिसीमन जैसे संवैधानिक संशोधन वाले विधेयक पेश करती है, तो संसद में व्यापक बहस देखने को मिल सकती है। ऐसे विधेयकों के लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि पर्याप्त संख्या बल और विभिन्न दलों के बीच सहमति भी जरूरी होगी।

आने वाले दिनों में 19 जुलाई की सर्वदलीय बैठक, 20 जुलाई से शुरू होने वाला मानसून सत्र और 21 जुलाई की एनडीए संसदीय दल की बैठक यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी कि सरकार अपने “मिशन 360” के लक्ष्य के कितनी करीब पहुंच पाती है और संसद में कौन-कौन से बड़े विधेयकों को आगे बढ़ाया जाता है। फिलहाल देश की निगाहें संसद और बदलते राजनीतिक समीकरणों पर टिकी हुई हैं।

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