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साइबर फ्रॉड केस में बड़ा फैसला: “सिर्फ खाते में ठगी का पैसा आना अपराध साबित नहीं करता”, मुंबई कोर्ट ने युवक को किया बरी!

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साइबर ठगी मामले में मुंबई कोर्ट का बड़ा फैसला, मनोज किस्कू को मिली राहत

AIN NEWS 1: मुंबई की गिरगांव अदालत ने साइबर फ्रॉड से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए झारखंड के रहने वाले 23 वर्षीय मनोज किस्कू को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि केवल किसी व्यक्ति के बैंक खाते में ठगी की रकम ट्रांसफर हो जाना इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि वह व्यक्ति अपराध में शामिल था।

कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी आरोपी की प्रत्यक्ष भूमिका, आपराधिक साजिश या ठगी में सक्रिय भागीदारी के ठोस सबूत मौजूद न हों, तब तक उसे अपराधी नहीं माना जा सकता। यह फैसला साइबर अपराधों की जांच और कानूनी प्रक्रिया के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अदालत ने क्या कहा?

गिरगांव कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) एस.जी. चिमनकर ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को “उचित संदेह से परे” साबित करने में असफल रहा।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल आर्थिक लाभ मिलने से कोई व्यक्ति अपराधी साबित नहीं हो जाता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने अपराध की योजना बनाई, किसी तरह की साजिश में हिस्सा लिया या ठगी को अंजाम देने में सीधी भूमिका निभाई।

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि मनोज किस्कू ने फर्जी लिंक भेजे, फोन कॉल किए या शिकायतकर्ता से संपर्क कर धोखाधड़ी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला साल 2022 का है। शिकायतकर्ता प्रियंका हनुमंत पवार, जो पुलिस विभाग में कार्यरत हैं, को 26 फरवरी 2022 को एक SMS प्राप्त हुआ था।

मैसेज में दावा किया गया कि उनका HDFC बैंक खाता सक्रिय बनाए रखने के लिए PAN कार्ड अपडेट करना जरूरी है। संदेश में एक लिंक दिया गया था, जिस पर क्लिक करने के बाद प्रियंका एक फर्जी वेबसाइट पर पहुंच गईं। वहां उन्होंने अपनी निजी बैंकिंग जानकारी भर दी।

कुछ देर बाद उन्हें एक व्यक्ति का फोन आया, जिसने खुद को बैंक अधिकारी बताया। कॉल करने वाले ने खाते की प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर OTP मांगा। OTP साझा करते ही उनके बैंक खाते से दो अलग-अलग ट्रांजैक्शन में पैसे निकाल लिए गए।

पहले ट्रांजैक्शन में 99,986 रुपये और दूसरे में 2,99,970 रुपये निकाले गए। इस तरह कुल लगभग चार लाख रुपये की साइबर ठगी को अंजाम दिया गया।

जांच में क्या सामने आया?

मामले की जांच के दौरान पुलिस ने ट्रांजैक्शन ट्रेल और मोबाइल नंबरों की जांच की। जांच में पता चला कि धोखाधड़ी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर झारखंड के जामताड़ा निवासी रऊफ अंसारी के नाम पर रजिस्टर्ड थे।

पुलिस को बैंक ट्रांजैक्शन की जांच में यह भी पता चला कि ठगी की रकम में से 99,986 रुपये मनोज किस्कू के बैंक खाते में ट्रांसफर हुए थे। इसी आधार पर पुलिस ने 17 मार्च 2023 को मनोज किस्कू को गिरफ्तार कर लिया।

उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 419, 420, 465 और 467 के तहत मामला दर्ज किया गया। इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की संबंधित धाराएं भी लगाई गईं। हालांकि बाद में अक्टूबर 2023 में अदालत ने उसे जमानत दे दी थी।

बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?

सुनवाई के दौरान मनोज किस्कू की ओर से पेश अधिवक्ता अमोल थोमारे ने अदालत में कई अहम दलीलें रखीं।

बचाव पक्ष ने कहा कि पुलिस इस पूरे मामले के मुख्य आरोपी रऊफ अंसारी को गिरफ्तार करने में नाकाम रही। जबकि वही व्यक्ति कथित तौर पर शिकायतकर्ता के संपर्क में था और उसी ने फर्जी कॉल और धोखाधड़ी को अंजाम दिया।

वकील ने अदालत को बताया कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो सके कि मनोज किस्कू और रऊफ अंसारी के बीच किसी तरह का संपर्क, बातचीत या आपराधिक साजिश थी।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि केवल बैंक खाते में पैसा आना किसी व्यक्ति की आपराधिक भूमिका साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

अदालत ने अपने फैसले में माना कि अभियोजन पक्ष केवल इतना साबित कर पाया कि शिकायतकर्ता के खाते से धोखाधड़ी के जरिए रकम निकाली गई थी।

लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि मनोज किस्कू ने किसी भी स्तर पर इस साइबर अपराध में हिस्सा लिया था। न तो उसके खिलाफ कोई डिजिटल सबूत मिला और न ही किसी तरह की बातचीत या संपर्क का रिकॉर्ड पेश किया गया।

कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियां अधिकतम “दीवानी दायित्व” का मामला बना सकती हैं, लेकिन उन्हें आपराधिक अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

फैसले का क्या महत्व है?

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक यह फैसला साइबर अपराध मामलों में जांच एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल बैंक खाते में पैसे पहुंचने के आधार पर किसी को आरोपी बनाना पर्याप्त नहीं है।

साइबर फ्रॉड मामलों में पुलिस और जांच एजेंसियों को आरोपी की भूमिका, डिजिटल साक्ष्य, कॉल रिकॉर्ड, बैंकिंग ट्रेल और आपराधिक साजिश के ठोस प्रमाण पेश करने होंगे।

यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है, जहां किसी व्यक्ति का बैंक खाता केवल पैसे ट्रांसफर करने के लिए इस्तेमाल हुआ हो लेकिन उसकी प्रत्यक्ष संलिप्तता साबित न हो पाई हो।

Mumbai Girgaon Court delivered a significant judgment in a cyber fraud case by acquitting Jharkhand resident Manoj Kisku. The court observed that merely receiving fraud money in a bank account cannot establish criminal liability unless there is clear evidence of conspiracy or direct involvement in the cyber scam. The case involved an HDFC Bank phishing and OTP fraud in which nearly ₹4 lakh was stolen from a police employee’s account. The verdict highlights important legal principles related to cyber crime investigations, online banking fraud, digital evidence, and criminal conspiracy under Indian law.

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