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करूर भगदड़: दोगुनी भीड़ से मचा हाहाकार, विजय के आरोपों पर तमिलनाडु सरकार का पलटवार

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AIN NEWS 1 मेरठ: पुलिस विभाग में एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। कैराना कोतवाली के पूर्व प्रभारी निरीक्षक प्रेमवीर सिंह राणा पर भ्रष्टाचार का गंभीर मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोप है कि उन्होंने अपनी वैध आय से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की और जब उनसे इस बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया तो वह संतोषजनक जवाब देने में असफल रहे।

यह मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) के तहत दर्ज हुआ है और अब विभागीय व कानूनी जांच आगे बढ़ रही है।

जांच की शुरुआत

प्रेमवीर सिंह राणा के खिलाफ जांच का सिलसिला दिसंबर 2020 से शुरू हुआ। राज्य शासन के सतर्कता अनुभाग-3 ने 8 दिसंबर 2020 को खुली जांच के आदेश दिए थे। मेरठ सेक्टर की सतर्कता टीम को जिम्मेदारी दी गई। कई महीनों की जांच और दस्तावेजी प्रमाणों के बाद 21 फरवरी 2024 को शासन को विस्तृत रिपोर्ट सौंपी गई।

इस रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि राणा की घोषित आय और उनके द्वारा अर्जित संपत्तियों में भारी अंतर है।

आय और संपत्ति का अंतर

जांच में सामने आया कि राणा ने अपने पूरे कार्यकाल में वैध स्रोतों से केवल 1,65,36,556 रुपये की आय प्राप्त की। लेकिन इसी अवधि में उनके द्वारा अर्जित संपत्ति और खर्चों की कुल राशि 4,57,42,602 रुपये पाई गई।
इस तरह से उनके पास 2,92,06,045 रुपये की अतिरिक्त संपत्ति मिली, जिसका कोई वैध स्रोत नहीं था।

मुकदमा दर्ज और धाराएं

सतर्कता अधिष्ठान, मेरठ सेक्टर के प्रभारी निरीक्षक कृष्णवीर सिंह ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। यह मुकदमा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 13(1)बी और 13(2) के तहत दायर किया गया है।
इन धाराओं के अंतर्गत आय से अधिक संपत्ति अर्जित करना दंडनीय अपराध है और इसके लिए कठोर सजा का प्रावधान है।

राज्य शासन ने 18 अगस्त 2025 को इस मुकदमे को आधिकारिक रूप से दर्ज कराते हुए आगे की गहन जांच के आदेश दिए।

कैराना में कार्यकाल

प्रेमवीर राणा अगस्त 2020 से जनवरी 2022 तक कैराना कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक रहे। इस दौरान उनकी छवि एक सख्त पुलिस अधिकारी के रूप में बनी। उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान भी मिले—

  • वर्ष 2007: उत्कृष्ट सम्मान चिह्न

  • वर्ष 2016: राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार

  • वर्ष 2019: बेस्ट इन्वेस्टिगेशन अवार्ड (गृह मंत्रालय)

  • इसके अलावा, उन्हें डीजीपी द्वारा भी प्रशंसा पत्र मिला।

हालांकि इन उपलब्धियों के बावजूद उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि पर गहरा धब्बा लगा दिया।

रिटायरमेंट और विवाद

प्रेमवीर राणा 31 दिसंबर 2024 को सेवानिवृत्त हुए। रिटायरमेंट के बाद भी वे कैराना लौटे, जहां उनका स्वागत किया गया। हालांकि स्थानीय स्तर पर चर्चा रही कि यह स्वागत जबरन आयोजित कराया गया था।

उनकी लोकप्रियता और विवादों का यह मिश्रण दिखाता है कि पुलिस विभाग में उनके कार्यकाल को लेकर लोगों की राय बंटी हुई थी।

जांच में विसंगतियां

जांच टीम ने कई बार उनसे स्पष्टीकरण मांगा कि आखिर उनकी आय से अधिक संपत्ति कहां से आई। लेकिन राणा किसी भी बार ठोस जवाब देने में विफल रहे।

  • आय: 1.65 करोड़ रुपये

  • खर्च/संपत्ति: 4.57 करोड़ रुपये

  • अतिरिक्त/अनधिकृत संपत्ति: 2.92 करोड़ रुपये

यह अंतर ही उनके खिलाफ कार्रवाई का आधार बना।

सतर्कता विभाग की भूमिका

सतर्कता विभाग ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया। विभाग ने न केवल राणा की बैंकिंग और प्रॉपर्टी डिटेल खंगाली बल्कि उनकी जीवनशैली और खर्चों का भी मूल्यांकन किया।

निष्कर्ष यही निकला कि उनकी घोषित आय के मुकाबले खर्च कहीं अधिक थे, जो भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।

भ्रष्टाचार और पुलिस विभाग पर सवाल

यह मामला सिर्फ प्रेमवीर राणा तक सीमित नहीं है। इसने पूरे पुलिस विभाग की पारदर्शिता और ईमानदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आम जनता के लिए यह एक बड़ा संदेश है कि यदि पुलिस विभाग का वरिष्ठ अधिकारी भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो आम नागरिक किस पर भरोसा करें?

सम्मान बनाम आरोप

प्रेमवीर राणा ने अपने करियर में कई बड़े पुरस्कार और सम्मान अर्जित किए। लेकिन जिस तरह से उनकी आय और संपत्ति में विसंगति मिली, उसने उनकी पूरी सेवा को विवादों में डाल दिया।
यह उदाहरण बताता है कि बाहरी उपलब्धियां हमेशा आंतरिक ईमानदारी की गारंटी नहीं होतीं।

प्रेमवीर राणा का मामला यह स्पष्ट करता है कि सरकारी अधिकारियों के वित्तीय लेनदेन पर लगातार निगरानी जरूरी है।

यदि कोई अधिकारी अपनी वैध आय से अधिक संपत्ति अर्जित करता है और उसके स्रोतों की जानकारी नहीं देता, तो उसे कानून का सामना करना ही पड़ेगा।
यह मुकदमा न केवल प्रेमवीर राणा के व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करेगा बल्कि पूरे पुलिस विभाग के लिए एक सख्त सबक भी बनेगा।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत यह कार्रवाई साबित करती है कि कानून सबके लिए बराबर है—चाहे वह साधारण नागरिक हो या फिर एक पुरस्कृत पुलिस अधिकारी।

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