AIN NEWS 1 सहारनपुर: सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद में जिला न्यायालय ने 2 सितंबर 2026 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जिला जज सहारनपुर की अदालत ने मोहम्मद तनवीर अहमद की ओर से दाखिल प्रकीर्ण सिविल अपील संख्या 108/2026 को खारिज कर दिया। इसके साथ ही नगर मजिस्ट्रेट सहारनपुर द्वारा 16 जुलाई 2026 को पारित बेदखली और क्षतिपूर्ति संबंधी आदेश को बरकरार रखा गया है। उपलब्ध न्यायिक दस्तावेज में मामले, पक्षकारों और अदालत के अंतिम आदेश का विवरण दर्ज है।
मामला उत्तर प्रदेश लोक परिसर (अनधिकृत अध्यवासियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 से जुड़ा है। विवादित संपत्ति सहारनपुर के मौजा पठानपुरा में स्थित खसरा नंबर 539 की भूमि से संबंधित है। अदालत के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि संबंधित भूमि और उस पर बने निर्माण पर अनधिकृत कब्जे तथा सरकारी संपत्ति से जुड़े कानून के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं।

क्या है पूरा मामला?
न्यायालय के सामने पेश दस्तावेजों के अनुसार, सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद और उससे जुड़े निर्माण को लेकर प्रशासन की ओर से कार्रवाई की गई थी। नगर मजिस्ट्रेट सहारनपुर ने वाद संख्या 2032/2025, सरकार बनाम अब्दुल हमीद आदि, में 16 जुलाई 2026 को आदेश पारित किया था।
इस आदेश में विवादित परिसर से बेदखली के साथ क्षतिपूर्ति की बात कही गई थी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मोहम्मद तनवीर अहमद ने जिला न्यायालय में अपील दाखिल की।
अपीलकर्ता की ओर से कई आधार अदालत के सामने रखे गए। उनका दावा था कि विवादित खसरा नंबर 539 की जमीन लगभग 28 बीघा 4 बिस्वे 4 बिस्वांशी यानी 5.780 हेक्टेयर है और यह ‘नॉन-जेड.ए.’ भूमि है। उनका कहना था कि जमीन का जमींदारी उन्मूलन या अधिग्रहण नहीं हुआ और राजस्व अभिलेखों में यह जमींदारान के नाम दर्ज रही है। इसलिए इसे लोक परिसर की सार्वजनिक संपत्ति मानकर बेदखली की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
मस्जिद पुरानी होने का भी दिया गया तर्क
अपील में यह तर्क भी रखा गया कि विवादित मस्जिद 1947 और उससे पहले से अस्तित्व में है। इसके आधार पर Places of Worship Act से संबंधित दलील भी अदालत के सामने रखी गई।
इसके अलावा अपीलकर्ता ने बताया कि वर्ष 1960 में यूनियन ऑफ इंडिया की ओर से मस्जिद से संबंधित परिसर में उप-डाकघर के इस्तेमाल के लिए लीज डीड की गई थी और किराये का भुगतान भी किया जाता रहा। अपीलकर्ता ने इस तथ्य को सरकार के खिलाफ अपने पक्ष में महत्वपूर्ण आधार बताया।
मामले में यह भी दलील दी गई कि मस्जिद नगर निगम के पुराने रिकॉर्ड में वर्ष 1957 से दर्ज है और इसे वक्फ संख्या 451 के रूप में पंजीकृत बताया गया। अपीलकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को मामले में आवश्यक पक्षकार बनाया जाना चाहिए था।
अदालत ने रिकॉर्ड और दस्तावेजों को माना महत्वपूर्ण
जिला अदालत के समक्ष अपीलकर्ता की ओर से बड़ी संख्या में दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। इनमें वादपत्र, जवाब, खतौनी, अलग-अलग फसली वर्षों के खसरे, नगर निगम के पुराने वार्षिक मूल्यांकन रिकॉर्ड, डाक विभाग से संबंधित दस्तावेज और लीज से जुड़े कागजात शामिल थे।
अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड का विस्तृत परीक्षण किया। फैसले में विवादित जमीन के पुराने राजस्व रिकॉर्ड और उस पर सरकारी कार्यालयों की मौजूदगी का भी उल्लेख किया गया है।
न्यायालय ने यह भी देखा कि संबंधित परिसर में मस्जिद के अलावा कमरे और दुकान जैसे निर्माण किए गए थे और उन्हें किराये पर दिए जाने का तथ्य रिकॉर्ड में सामने आया।
6.41 करोड़ रुपये से ज्यादा की क्षतिपूर्ति का मुद्दा
इस मामले में क्षतिपूर्ति की रकम भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा रही। फैसले में दर्ज है कि अपीलकर्ता की ओर से ₹6,41,65,500 की क्षतिपूर्ति राशि निर्धारित किए जाने पर आपत्ति की गई थी।
अपीलकर्ता का तर्क था कि यह राशि उचित आधार पर निर्धारित नहीं की गई। वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से अदालत के सामने यह पक्ष रखा गया कि सरकारी संपत्ति के लगभग 315 वर्ग मीटर क्षेत्र पर मस्जिद और दुकानों आदि का निर्माण कर उन्हें किराये पर देकर लाभ प्राप्त किया गया।
अदालत ने क्षतिपूर्ति निर्धारित करने से जुड़े कानूनी प्रावधानों और उपलब्ध रिकॉर्ड की समीक्षा की।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख
जिला अदालत ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया। इनमें सरकारी अथवा सार्वजनिक भूमि पर अनधिकृत निर्माण और कब्जे से संबंधित न्यायिक सिद्धांतों का हवाला दिया गया।
अदालत ने यह रेखांकित किया कि सार्वजनिक उपयोग की जमीन, सड़क, फुटपाथ, सार्वजनिक स्थान आदि पर अनधिकृत कब्जे को केवल लंबे समय से मौजूद होने के आधार पर वैध नहीं माना जा सकता। सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और उसका जनहित में उपयोग सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि अनधिकृत कब्जे को केवल इसलिए नियमित करने का औचित्य नहीं बनता कि वह लंबे समय से चला आ रहा है।
अदालत ने अपील क्यों खारिज की?
जिला जज सहारनपुर ने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों की समीक्षा करने के बाद माना कि अपीलकर्ता अपने दावे और विवादित संपत्ति पर अपने कथित वैध और स्वामित्वपूर्ण अध्यास के संबंध में पर्याप्त एवं विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके।
अदालत ने पाया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर विचारण न्यायालय के आदेश में ऐसी कोई कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि साबित नहीं हुई, जिसके आधार पर उसे रद्द किया जा सके।
अदालत ने यह भी माना कि प्रस्तुत प्रकीर्ण सिविल अपील बलहीन होने के कारण खारिज किए जाने योग्य है।
2 सितंबर 2026 को आया अंतिम आदेश
जिला न्यायाधीश सहारनपुर सतेन्द्र कुमार की अदालत ने 2 सितंबर 2026 को अपना फैसला सुनाया। अदालत ने मोहम्मद तनवीर अहमद की ओर से दाखिल प्रकीर्ण सिविल अपील संख्या 108/2026 को खारिज कर दिया।
साथ ही नगर मजिस्ट्रेट सहारनपुर द्वारा 16 जुलाई 2026 को पारित आदेश को पुष्ट किया गया। आदेश में दोनों पक्षों को अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने के लिए कहा गया है।
अदालत ने विचारण न्यायालय की मूल पत्रावली को भी निर्णय की प्रति के साथ तत्काल वापस भेजने का निर्देश दिया।
क्या है इस फैसले का मतलब?
सरल शब्दों में कहें तो जिला अदालत ने फिलहाल नगर मजिस्ट्रेट के उस आदेश को सही माना है, जिसके तहत विवादित परिसर से बेदखली और क्षतिपूर्ति का आदेश दिया गया था। अपील खारिज होने के बाद निचली अदालत का आदेश बरकरार है।
हालांकि, यह खबर अदालत के 2 सितंबर 2026 के आदेश में दर्ज तथ्यों और निष्कर्षों पर आधारित है। आगे इस आदेश के खिलाफ कोई उच्च न्यायालयीन चुनौती दाखिल होती है या नहीं, अथवा किसी अन्य न्यायिक प्रक्रिया से स्थिति बदलती है, यह भविष्य की कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
The Saharanpur Collectorate Mosque Case has reached an important stage after the Saharanpur District Court dismissed a civil appeal filed by Mohd. Tanveer Ahmad on September 2, 2026. The court upheld the July 16, 2026 order concerning eviction and compensation under the Uttar Pradesh Public Premises (Eviction of Unauthorized Occupants) Act, 1972. The judgment examined the land records, claims concerning the mosque, municipal records, lease-related documents and arguments regarding unauthorized occupation and compensation.



















