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31 साल बाद गिरफ्त में आया सलीम वास्तिक: पहचान बदलकर जी रहा था फरार आरोपी, ऐसे खुला पूरा राज!

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AIN NEWS 1: दिल्ली के चर्चित अपहरण और हत्या के पुराने मामले में फरार चल रहे आरोपी सलीम वास्तिक की गिरफ्तारी ने एक बार फिर पुलिस जांच और तकनीक की भूमिका पर सवाल और चर्चा दोनों खड़े कर दिए हैं। करीब तीन दशक तक कानून से बचता रहा यह आरोपी आखिरकार पुलिस की पकड़ में कैसे आया—इसकी कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।

शुरुआत: “मर चुका है” कहकर टाल दिया गया था मामला

पिछले साल जब पुलिस उत्तर प्रदेश के शामली जिले के नन्नूपुरा मोहल्ले में सलीम के घर पहुंची, तो उसके रिश्तेदारों ने साफ तौर पर कहा कि वह अब इस दुनिया में नहीं है। इस जानकारी के बाद पुलिस की जांच कुछ समय के लिए धीमी पड़ गई। हालांकि, कुछ महीनों बाद एक नई सूचना ने केस की दिशा ही बदल दी।

पुलिस को पता चला कि “सलीम वास्तिक” और “सलीम खान” नाम के दो व्यक्ति दरअसल एक ही हो सकते हैं। शुरुआत में इस इनपुट को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन बाद में छोटे-छोटे सुरागों ने इस शक को मजबूत कर दिया।

आधार कार्ड और परिवार की जानकारी से जुड़ा शक

जांच के दौरान पुलिस ने सलीम के आधार कार्ड का रिकॉर्ड खंगाला। इसमें उसकी पुरानी तस्वीर में वह बेहद दुबला दिखाई दे रहा था, जबकि वर्तमान में उसकी पहचान बदल चुकी थी। इसके अलावा, उसके पिता का नाम नूर हसन और पत्नी का नाम अफसाना भी रिकॉर्ड में समान पाया गया।

इन समानताओं ने पुलिस को यह सोचने पर मजबूर किया कि कहीं यह वही व्यक्ति तो नहीं, जो सालों से फरार है और अपनी पहचान बदलकर रह रहा है।

यूट्यूब वीडियो ने बढ़ाया शक

मामले में एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब पुलिस को सलीम की कुछ यूट्यूब वीडियो मिलीं। इन वीडियो में वह कुंग-फू और मार्शल आर्ट्स की बातें करता नजर आ रहा था। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, उसकी बातचीत का तरीका और शारीरिक हाव-भाव पुराने रिकॉर्ड से मेल खाते थे, जिससे शक और गहरा हो गया।

फिंगरप्रिंट मैच से खुला राज

आखिरकार पुलिस ने तकनीकी जांच का सहारा लिया। सलीम वास्तिक के फिंगरप्रिंट्स को पुराने केस में दर्ज “सलीम खान” के जमानत रिकॉर्ड से मिलाया गया। जब दोनों के फिंगरप्रिंट्स मैच हो गए, तो यह साफ हो गया कि दोनों नामों के पीछे एक ही व्यक्ति है।

इसके बाद पुलिस ने बिना देर किए उसे गिरफ्तार कर लिया।

इतने साल तक कैसे बचता रहा आरोपी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सलीम इतने लंबे समय तक पुलिस से बचकर कैसे रह पाया। इस पर पुलिस अधिकारियों का कहना है कि 90 के दशक में राज्यों के बीच सूचना साझा करने के आधुनिक सिस्टम मौजूद नहीं थे।

आज जिस Crime and Criminal Tracking Network & Systems (CCTNS) जैसे नेटवर्क की मदद से अपराधियों का रिकॉर्ड तुरंत ट्रैक किया जा सकता है, वह उस समय उपलब्ध नहीं था। पुलिस को मुख्य रूप से मुखबिरों और स्थानीय सूचनाओं पर निर्भर रहना पड़ता था।

अलग-अलग राज्यों में रहकर बदली पहचान

पुलिस जांच में सामने आया कि सलीम मूल रूप से शामली का रहने वाला था। फरार होने के बाद उसने करीब 10 साल हरियाणा में बिताए और फिर 2011 में गाजियाबाद के लोनी इलाके में आकर बस गया। यहां उसने अपनी पहचान बदल ली और सामान्य जिंदगी जीने लगा।

लोनी, जो दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर के पास स्थित है, एक ऐसा इलाका है जहां बड़ी संख्या में बाहरी लोग रहते हैं, जिससे उसकी पहचान छिपाना आसान हो गया।

स्थानीय पुलिस को नहीं थी जानकारी

गाजियाबाद पुलिस ने भी माना कि उन्हें सलीम के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड की कोई जानकारी नहीं थी। गाजियाबाद (ग्रामीण) के पुलिस उपायुक्त Surender Nath Tiwari ने The Indian Express से बातचीत में कहा:

“हमें इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह दिल्ली के हत्या के मामले में शामिल है। शुक्रवार को दिल्ली पुलिस ने हमें बताया कि वे उससे पूछताछ करना चाहते हैं। बाद में हमें उसकी गिरफ्तारी की सूचना दी गई।”

1995 का मामला: अब फिर खुलेगा सच

सलीम वास्तिक का नाम 1995 में दिल्ली में हुए अपहरण और हत्या के एक गंभीर मामले में सामने आया था। उस समय वह पुलिस की पकड़ से बच निकला और धीरे-धीरे पूरी तरह गायब हो गया।

अब उसकी गिरफ्तारी के बाद उम्मीद है कि इस पुराने केस के कई अनसुलझे पहलुओं पर से पर्दा उठेगा और पीड़ित परिवार को न्याय मिल सकेगा।

तकनीक बनाम पुराने तरीके

यह मामला इस बात का उदाहरण है कि कैसे आधुनिक तकनीक और डेटा सिस्टम ने अपराध जांच को पूरी तरह बदल दिया है। जहां पहले अपराधी सालों तक पहचान बदलकर बच सकते थे, वहीं आज डिजिटल रिकॉर्ड, बायोमेट्रिक डेटा और नेटवर्किंग सिस्टम के कारण उनकी पहचान छिपाना बेहद मुश्किल हो गया है।

सलीम वास्तिक की गिरफ्तारी केवल एक आरोपी की पकड़ नहीं है, बल्कि यह पुलिस की बदलती कार्यप्रणाली और तकनीकी प्रगति की भी कहानी है। यह केस बताता है कि भले ही अपराधी कितनी भी चालाकी से छिप जाए, लेकिन समय और तकनीक के आगे उसकी सच्चाई सामने आ ही जाती है।

The arrest of Salim Vastik, a long-time fugitive in a 1995 Delhi kidnapping and murder case, highlights the evolution of police investigation in India. After evading law enforcement for over three decades by changing his identity and living in multiple states like Haryana and Ghaziabad, he was finally caught using advanced systems like biometric fingerprint matching and CCTNS. This case demonstrates how modern technology is transforming crime tracking and helping authorities capture criminals who once seemed untraceable.

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