AIN NEWS 1 नई दिल्ली। किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में लेने के बाद उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी करके संवैधानिक अधिकारों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा उसकी वास्तविक हिरासत शुरू होने के समय से गिनी जाएगी, न कि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज औपचारिक गिरफ्तारी के समय से। यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई है और उसे पुलिस अपने नियंत्रण में रख रही है, तो केवल यह कहकर हिरासत की अवधि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उसकी गिरफ्तारी अभी कागजों में दर्ज नहीं की गई है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नागरिकों के मौलिक अधिकारों, पुलिस की जवाबदेही और आपराधिक न्याय व्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया है कि संविधान में दिए गए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को पुलिस की प्रशासनिक या जांच संबंधी प्रक्रिया के नाम पर कमजोर नहीं किया जा सकता।
यह महत्वपूर्ण निर्णय 5 नवंबर 2026 को न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने Sujit Das and Others v. Union of India मामले में सुनाया। इस फैसले का आधिकारिक संदर्भ 2026 INSC 1195 है। मामला SLP (Criminal) संख्या 12451-12453/2026 से संबंधित था।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला त्रिपुरा में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट (NDPS Act) के तहत दर्ज एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ा था। इस मामले में सुजीत दास, सुमन दास और रूपक सरकार सहित आरोपियों की जमानत याचिकाएं त्रिपुरा हाईकोर्ट ने 29 अप्रैल 2026 को खारिज कर दी थीं। इसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता ने एक गंभीर कानूनी सवाल उठाया। उन्होंने अदालत को बताया कि 29 सितंबर 2025 को दोपहर लगभग 2:30 बजे चारों आरोपियों को रोककर उनके खिलाफ तलाशी और जब्ती की कार्रवाई की गई थी। इसके बावजूद पुलिस ने उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर 2025 को सुबह 11:15 बजे दर्ज दिखाई।
आरोपियों को 30 सितंबर को शाम लगभग 5 बजे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। बचाव पक्ष का कहना था कि पुलिस ने वास्तविक हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच समय का अंतर रखकर संविधान के अनुच्छेद 22(2) में निर्धारित 24 घंटे की समय-सीमा को प्रभावित किया।
इस दलील को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जांच अधिकारी से इस संबंध में विशेष हलफनामा दाखिल करने को कहा। इसके बाद अदालत ने पूरे मामले में वास्तविक हिरासत, तलाशी और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच कानूनी अंतर की विस्तार से समीक्षा की।
सुप्रीम कोर्ट ने 24 घंटे की गणना पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत 24 घंटे की अवधि की गणना उस समय से शुरू होगी, जब संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में सीमित कर दी जाती है और उसे पुलिस हिरासत में रखा जाता है।
अदालत के अनुसार, पुलिस किसी व्यक्ति को अपने नियंत्रण में रखकर उससे पूछताछ करे, उसे जाने की अनुमति न दे और बाद में औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करे, तो केवल कागजी कार्रवाई के आधार पर 24 घंटे की गणना को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि संविधान गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर पैदा करके नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कमजोर करने की अनुमति नहीं देता। यदि किसी व्यक्ति को अपराध में संलिप्तता के संदेह में पुलिस अपने नियंत्रण में रखती है और उसकी स्वतंत्रता प्रभावी रूप से छीन लेती है, तो उसी समय से संवैधानिक सुरक्षा लागू हो जाती है।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि हिरासत के दौरान व्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगी वास्तविक रोक महत्वपूर्ण है, न कि पुलिस ने गिरफ्तारी के दस्तावेज किस समय तैयार किए।
पूछताछ, तलाशी और जब्ती के दौरान भी लागू होगा संवैधानिक संरक्षण
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू तलाशी और जब्ती की कार्रवाई से जुड़ा है। कई मामलों में पुलिस किसी व्यक्ति को पहले रोकती है, उसके बाद उससे पूछताछ करती है, तलाशी लेती है और सामान जब्त करने की प्रक्रिया पूरी करती है। इसके बाद औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया के नाम पर किसी व्यक्ति की वास्तविक हिरासत को संवैधानिक समय-सीमा से बाहर नहीं रखा जा सकता।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस द्वारा की गई प्रत्येक पूछताछ या हर स्वैच्छिक जांच में भागीदारी अपने आप गिरफ्तारी मानी जाएगी। महत्वपूर्ण यह है कि क्या व्यक्ति को वास्तव में जाने से रोका गया था और क्या उसकी स्वतंत्रता पर प्रभावी रूप से प्रतिबंध लगाया गया था।
यदि पुलिस किसी व्यक्ति को अपने नियंत्रण में रखती है और उसकी स्वतंत्रता छीन लेती है, तो केवल औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज नहीं होने का बहाना उसके संवैधानिक अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता।
24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(2) प्रत्येक गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए व्यक्ति को महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अनुसार, गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना किसी व्यक्ति को इस अवधि से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि 24 घंटे की गणना में केवल मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने के लिए आवश्यक यात्रा का समय ही बाहर रखा जा सकता है। पूछताछ, तलाशी, जब्ती, जांच या अन्य पुलिस कार्रवाई के नाम पर अतिरिक्त समय घटाने की अनुमति नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हिरासत की अवधि 24 घंटे से कम होने का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस व्यक्ति को मनमाने ढंग से पूरे 24 घंटे तक थाने में रख सकती है। हिरासत की अवधि परिस्थितियों के अनुसार उचित और आवश्यक भी होनी चाहिए।
24 घंटे से अधिक हिरासत पर तत्काल रिहाई का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि यदि किसी व्यक्ति को वास्तविक हिरासत में लेने के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाता और इस अवधि में वैध न्यायिक अनुमति प्राप्त नहीं की जाती, तो ऐसी हिरासत असंवैधानिक होगी।
ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को तत्काल हिरासत से रिहा किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी केवल गिरफ्तारी के कागजात देखकर रिमांड देना नहीं है। मजिस्ट्रेट को यह जांचना होगा कि व्यक्ति को वास्तव में किस तारीख और किस समय हिरासत में लिया गया था। इसके बाद उसी समय को आधार बनाकर 24 घंटे की संवैधानिक सीमा का पालन हुआ या नहीं, इसका परीक्षण करना होगा।
यदि मजिस्ट्रेट को पता चलता है कि व्यक्ति को उचित समय से अधिक हिरासत में रखा गया है, तो वह रिमांड देने से इनकार भी कर सकता है।
तीन हाईकोर्ट के पुराने फैसलों की कानूनी व्याख्या पर असहमति
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में ओडिशा हाईकोर्ट के Aryaman Pattnayak, मद्रास हाईकोर्ट के Kannan और केरल हाईकोर्ट के Arun K. Thomas मामलों में दी गई कानूनी व्याख्या से भी असहमति जताई।
इन मामलों में तलाशी और जब्ती के दौरान व्यक्ति को रोके जाने तथा औपचारिक गिरफ्तारी के समय के बीच अंतर को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाशी और जब्ती के दौरान किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभावी रोक लगने के बावजूद उसे केवल अस्थायी हिरासत बताकर संवैधानिक सुरक्षा से बाहर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 22(2) की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए जिससे मौलिक अधिकारों का संरक्षण मजबूत हो, न कि उनकी सुरक्षा कमजोर पड़े।
आरोपियों को राहत, हाईकोर्ट का आदेश निरस्त
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के 29 अप्रैल 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने पाया कि आरोपियों की हिरासत अनुच्छेद 22(2) की संवैधानिक समय-सीमा और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 58 के अनुरूप नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपियों को अधिकतम सात दिनों के भीतर संबंधित विशेष अदालत के सामने पेश किया जाए और उसके बाद उचित शर्तों पर उन्हें जमानत पर रिहा किया जाए।
यहां यह समझना जरूरी है कि अदालत ने केवल 24 घंटे के नियम की व्याख्या ही नहीं की, बल्कि इस मामले के तथ्यों के आधार पर आरोपियों को राहत देने का स्पष्ट आदेश भी दिया।
पुलिस और मजिस्ट्रेट के लिए भी महत्वपूर्ण निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों और राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को भेजने का निर्देश दिया।
इसका उद्देश्य पुलिस अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों को संवैधानिक समय-सीमा तथा वास्तविक हिरासत की सही गणना के बारे में स्पष्ट जानकारी देना है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के बाद पुलिस को अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए। हिरासत उचित अवधि के भीतर होनी चाहिए और संवैधानिक सुरक्षा का पालन करना अनिवार्य है।
आम नागरिकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें किसी आपराधिक जांच के दौरान पुलिस अपने नियंत्रण में लेती है। अब पुलिस केवल औपचारिक गिरफ्तारी का समय बाद में दर्ज करके पहले से चली आ रही वास्तविक हिरासत को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
इससे पुलिस की जवाबदेही बढ़ेगी और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति की हिरासत का वास्तविक समय जांचने का महत्व भी बढ़ेगा।
हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी मामले में गिरफ्तारी होते ही आरोपी को स्वतः जमानत मिल जाएगी। इसका सीधा संबंध वास्तविक हिरासत और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने की संवैधानिक समय-सीमा से है। अन्य कानूनी प्रावधान और अपराध की प्रकृति भी अपने स्थान पर लागू रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने Sujit Das v. Union of India मामले में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत स्थापित किया है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर वास्तविक रोक लगने का समय ही 24 घंटे की गणना का आधार होगा। औपचारिक गिरफ्तारी की तारीख और समय दिखाकर पुलिस संवैधानिक जवाबदेही से बच नहीं सकती। यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के शासन और पुलिस की जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
AIN NEWS 1
The Supreme Court of India has delivered a landmark ruling in Sujit Das v. Union of India (2026 INSC 1195), clarifying that the 24-hour constitutional deadline for producing a detained person before a magistrate begins from the moment of actual detention rather than the formal arrest recorded by police. The judgment interprets Article 22(2) of the Indian Constitution and Section 58 of the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS), strengthening safeguards against unlawful police detention, delayed arrest formalities and violations of personal liberty.



















