AIN NEWS 1 नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट के पास सड़क पार करना आम लोगों के लिए जोखिम भरा बना हुआ है। मथुरा रोड पर पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं होने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों के प्रति कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने मौखिक चेतावनी दी कि यदि 25 नवंबर 2026 तक समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जज खुद दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य द्वार पर धरने पर बैठ जाएंगे और काम पूरा होने तक वहां से नहीं उठेंगे।
16 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ किया कि केवल समितियां बनाने और बैठकों में चर्चा करने से काम नहीं चलेगा। पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए जमीन पर ठोस कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया जा सकता है।
मथुरा रोड पर सड़क पार करना क्यों है जोखिम भरा?
दिल्ली हाईकोर्ट और राष्ट्रीय प्राणी उद्यान यानी चिड़ियाघर के आसपास मथुरा रोड पर वाहनों की आवाजाही काफी अधिक रहती है। इस मार्ग से प्रतिदिन बड़ी संख्या में वकील, वादकारी, अदालत के कर्मचारी, बच्चे और परिवार गुजरते हैं। इनमें से कई लोगों को सड़क के एक तरफ से दूसरी तरफ जाने के लिए रास्ता पार करना पड़ता है।
ऐसे व्यस्त मार्ग पर पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग और प्रभावी यातायात नियंत्रण बेहद जरूरी हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी गई जानकारी के अनुसार, वहां मौजूद व्यवस्थाएं लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। तेज रफ्तार वाहनों के बीच सड़क पार करना दुर्घटना का कारण बन सकता है।
अदालत ने इसी समस्या को गंभीरता से लेते हुए अधिकारियों से सवाल किया कि जब मामला लोगों की रोजमर्रा की सुरक्षा से जुड़ा है, तो इसका समाधान करने में इतनी देरी क्यों हो रही है।
जजों ने धरने की चेतावनी क्यों दी?
सुनवाई करने वाली पीठ में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन शामिल थे। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने बताया कि इस मामले पर विचार करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई है।
हालांकि, अदालत समिति की कार्यवाही से संतुष्ट नजर नहीं आई। पीठ ने सवाल उठाया कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा जैसे बुनियादी विषय के लिए केवल समिति पर निर्भर रहने की क्या जरूरत है। अदालत का जोर इस बात पर था कि संबंधित अधिकारी आवश्यक तकनीकी विशेषज्ञों और इंजीनियरों की मदद लेकर जल्द से जल्द समाधान निकालें।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जजों ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि यदि अगली सुनवाई तक ठोस काम नहीं हुआ, तो वे खुद दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य द्वार पर जाकर बैठेंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि काम पूरा होने तक वे वहां से नहीं उठेंगे।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि निर्देशों का पालन नहीं हुआ, तो दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को अदालत में उपस्थित होने के लिए कहा जा सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि धरने की चर्चा सुनवाई के दौरान की गई मौखिक चेतावनी थी। इसे जजों के धरने पर बैठने का अंतिम या औपचारिक आदेश नहीं समझना चाहिए।
पहले भी कई बार उठ चुका है मामला
मथुरा रोड पर पैदल यात्रियों की सुरक्षा का मुद्दा पहली बार अदालत के सामने नहीं आया है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट इस मार्ग पर सुरक्षित सड़क पार करने की व्यवस्था करने की आवश्यकता पर जोर दे चुका है।
7 अक्टूबर 2025 को सड़क सुरक्षा से जुड़े मामले में अदालत ने उन स्थानों पर अतिरिक्त पैदल क्रॉसिंग की जरूरत पर ध्यान दिलाया था, जहां बड़ी संख्या में लोग सड़क पार करते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट और राष्ट्रीय प्राणी उद्यान के आसपास का क्षेत्र भी इसी श्रेणी में शामिल किया गया था।
इसके बाद 15 सितंबर 2026 की सुनवाई में अदालत को बताया गया कि वहां ट्रैफिक सिग्नल लगाया गया है। हालांकि, केवल सिग्नल लगा देना पर्याप्त नहीं माना गया। पैदल यात्रियों को सुरक्षित तरीके से सड़क पार कराने के लिए स्पीड ब्रेकर, रंबल स्ट्रिप और अन्य यातायात नियंत्रण उपायों पर भी विचार करने की जरूरत बताई गई।
5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने फिर निर्देश दिया कि दिल्ली हाईकोर्ट और चिड़ियाघर के पास मथुरा रोड पर पैदल यात्रियों के लिए क्रॉसिंग की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए।
इसके बावजूद जब 16 अक्टूबर की सुनवाई में समस्या के समाधान को लेकर ठोस प्रगति का सवाल उठा, तो अदालत ने नाराजगी जताई और 25 नवंबर तक कार्रवाई की समय-सीमा पर जोर दिया।
क्या केवल ट्रैफिक सिग्नल लगाने से समस्या हल हो जाएगी?
सड़क सुरक्षा के लिए ट्रैफिक सिग्नल उपयोगी हैं, लेकिन उनका प्रभावी ढंग से काम करना भी जरूरी है। अदालत में पेश की गई जानकारी के अनुसार, वहां लगाया गया पैदल यात्री सिग्नल कई मौकों पर काम नहीं करता। ऐसे में लोगों को सड़क पार करने के लिए सुरक्षित अवसर नहीं मिल पाता।
इस समस्या से निपटने के लिए यातायात संकेतों के बेहतर तालमेल, वाहनों की गति नियंत्रित करने वाले उपायों और जरूरत के अनुसार अन्य सुरक्षित क्रॉसिंग व्यवस्थाओं पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, कौन-सा तकनीकी समाधान अंतिम रूप से लागू किया जाएगा, इसका निर्णय संबंधित अधिकारियों को विशेषज्ञों की सलाह और स्थल की परिस्थितियों के आधार पर करना होगा। सुप्रीम कोर्ट की मुख्य चिंता यह है कि समाधान केवल कागजों पर न रहे, बल्कि उसका लाभ सड़क पर चलने वाले लोगों को मिले।
सड़क दुर्घटना पीड़ितों के मुआवजे का मुद्दा भी उठा
16 अक्टूबर की सुनवाई में सड़क सुरक्षा के अलावा दुर्घटना पीड़ितों को अंतरिम राहत देने की योजना का विषय भी सामने आया। अदालत को बताया गया कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164A के तहत दुर्घटना पीड़ितों को अंतरिम राहत उपलब्ध कराने से संबंधित योजना को लेकर पहले भी निर्देश दिए गए थे।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि इस संबंध में योजना तैयार की गई है। इस पर अदालत ने सवाल किया कि क्या इसे आधिकारिक रूप से अधिसूचित किया गया है और यदि ऐसा है, तो संबंधित पक्षों को इसकी जानकारी क्यों नहीं है।
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि जनता के हित में बनाई गई किसी योजना की जानकारी लोगों तक पहुंचनी चाहिए। यदि पात्र लोगों को योजना के बारे में पता ही नहीं होगा, तो वे उसका लाभ कैसे उठा पाएंगे?
अदालत ने सुझाव दिया कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 212 के अनुरूप योजना को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित किया जाए और उसका व्यापक प्रचार किया जाए, ताकि दुर्घटना पीड़ितों तथा उनके परिवारों को उपलब्ध राहत के बारे में जानकारी मिल सके।
सड़क दुर्घटनाओं की वार्षिक रिपोर्ट में देरी पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान सड़क दुर्घटनाओं से संबंधित वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करने में देरी का विषय भी उठाया गया। अदालत को बताया गया कि वर्ष 2024 की रिपोर्ट 11 जून 2026 को प्रकाशित हुई, जबकि वर्ष 2025 की रिपोर्ट तय समय-सीमा के बाद भी उपलब्ध नहीं थी।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से जवाब मांगा। अदालत ने सड़क सुरक्षा से जुड़े निर्देशों के पालन और संबंधित जानकारी समय पर सार्वजनिक करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इससे स्पष्ट है कि सुनवाई का दायरा केवल दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर सड़क पार करने की समस्या तक सीमित नहीं था। अदालत सड़क सुरक्षा से जुड़े व्यापक प्रशासनिक और नीतिगत मुद्दों पर भी जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहती है।
25 नवंबर को होगी अगली महत्वपूर्ण सुनवाई
अब इस मामले में 25 नवंबर 2026 की तारीख महत्वपूर्ण है। संबंधित अधिकारियों को तब तक पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए उठाए गए ठोस कदमों की जानकारी देनी होगी। जरूरत पड़ने पर दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति का निर्देश भी दिया जा सकता है।
फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह पुष्टि नहीं की जा सकती कि सुरक्षित क्रॉसिंग का निर्माण पूरा हो गया है। इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि समस्या का समाधान हो चुका है।
दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर मथुरा रोड पर पैदल यात्रियों की सुरक्षा का मामला बताता है कि शहरों में सड़क व्यवस्था बनाते समय पैदल चलने वालों की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि लोगों की जान से जुड़े बुनियादी इंतजामों में अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जाएगी।
25 नवंबर तक ठोस कार्रवाई की मांग और जजों की मौखिक धरने की चेतावनी ने इस मामले को महत्वपूर्ण बना दिया है। अब निगाहें संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई और अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
The Supreme Court of India has expressed serious concern over the lack of a safe pedestrian crossing near the Delhi High Court on Mathura Road. The bench of Justice JB Pardiwala and Justice KV Viswanathan orally warned the Centre that judges could stage a dharna outside the Delhi High Court if concrete safety measures are not implemented by November 25, 2026. The case highlights pedestrian safety, Delhi traffic management, road crossing infrastructure, speed control measures, and government accountability. The next hearing is expected to focus on compliance with the court’s directions and steps taken to protect lawyers, litigants, children, and other pedestrians.



















