AIN NEWS 1 सोमनाथ मंदिर नॉनवेज बैन मामला: गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के आसपास मांस, मछली, अंडे और अन्य मांसाहारी खाद्य पदार्थों की तैयारी, बिक्री और भंडारण पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को बरकरार रखते हुए लंबित अपील पर जल्द सुनवाई करने और यथासंभव दो महीने के भीतर फैसला सुनाने का अनुरोध किया है। इस आदेश के बाद फिलहाल सोमनाथ मंदिर के निर्धारित प्रतिबंधित क्षेत्रों में मांसाहारी खाद्य पदार्थों से जुड़ी गतिविधियों पर रोक जारी रहेगी।
यह मामला केवल खानपान और रेस्टोरेंट कारोबार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें धार्मिक भावनाओं, कारोबार करने के मौलिक अधिकार और प्रशासनिक शक्तियों की कानूनी सीमाओं जैसे महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़े हैं।

सुप्रीम कोर्ट में छह कारोबारियों को नहीं मिली अंतरिम राहत
6 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत के सामने छह खाद्य कारोबारियों की ओर से गुजरात हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई थी।
याचिका में सोमनाथ के रेस्टोरेंट संचालकों ने प्रतिबंध पर तत्काल रोक लगाने की मांग की थी। कारोबारियों का कहना था कि वे कई दशकों से इस क्षेत्र में होटल और रेस्टोरेंट चला रहे हैं। अचानक लगाए गए प्रतिबंध से उनके व्यवसाय, आर्थिक स्थिति और कर्मचारियों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर प्रतिबंध हटाने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल हाईकोर्ट में लंबित अपील का जल्द निपटारा होना चाहिए। इसी उद्देश्य से गुजरात हाईकोर्ट से अनुरोध किया गया कि वह मामले का फैसला प्राथमिकता के आधार पर यथासंभव दो महीने में करे।
सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी मौखिक टिप्पणी की कि ऐसे मामले में सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए बीच का रास्ता निकालने की आवश्यकता हो सकती है।
10 अगस्त को जिलाधिकारी ने जारी की थी प्रतिबंध की अधिसूचना
इस पूरे विवाद की शुरुआत गिर सोमनाथ जिले के जिलाधिकारी की ओर से 10 अगस्त 2026 को जारी अंतिम अधिसूचना से हुई थी।
गुजरात पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 33 के तहत जारी इस अधिसूचना में सोमनाथ मंदिर के आसपास के निर्धारित क्षेत्रों में मांस, मटन, मछली, अंडे और अन्य मांसाहारी खाद्य पदार्थों को तैयार करने, बेचने और स्टोर करने पर प्रतिबंध लगाया गया था।
इसमें सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे के साथ-साथ तीर्थयात्रा से जुड़े छह अन्य निर्धारित सार्वजनिक मार्गों और इलाकों को भी शामिल किया गया था। इस तरह प्रतिबंध का दायरा केवल मंदिर के मुख्य परिसर तक सीमित नहीं था।
प्रशासन की ओर से इस कदम के पीछे धार्मिक भावनाओं की रक्षा, तीर्थयात्रियों की सुविधा और धार्मिक स्थल के आसपास के वातावरण को बनाए रखने का तर्क दिया गया था।
सरकार का कहना था कि सोमनाथ देश के प्रमुख धार्मिक तीर्थस्थलों में से एक है और यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसलिए मंदिर तक जाने वाले प्रमुख रास्तों पर मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री और प्रदर्शन को नियंत्रित करना आवश्यक है।
गुजरात हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 30 अक्टूबर को रद्द कर दिया था प्रतिबंध
जिलाधिकारी की अधिसूचना को चुनौती देते हुए छह रेस्टोरेंट संचालकों ने गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया था। कारोबारियों ने दलील दी कि प्रशासन को गुजरात पुलिस अधिनियम के तहत किसी वैध व्यवसाय पर इस तरह पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति निशा एम. ठाकोर की एकल पीठ ने की।
30 अक्टूबर 2026 को एकल पीठ ने कारोबारियों की याचिका स्वीकार करते हुए जिलाधिकारी की 10 अगस्त की अधिसूचना को रद्द कर दिया था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि प्रशासन को कानून के तहत नियमन और लाइसेंस संबंधी शक्तियां प्राप्त हैं, लेकिन इन शक्तियों का इस्तेमाल करके किसी वैध खाद्य कारोबार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता।
एकल पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का भी उल्लेख किया। यह अनुच्छेद नागरिकों को अपनी पसंद का वैध व्यवसाय, व्यापार या पेशा करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
अदालत ने यह भी माना था कि भोजन का चुनाव व्यक्तिगत पसंद से जुड़ा विषय है। धार्मिक भावनाओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन प्रतिबंध लगाने के लिए प्रशासन को कानून के तहत पर्याप्त अधिकार भी होना चाहिए।
गुजरात सरकार की अपील पर उसी दिन फिर लागू हो गया प्रतिबंध
एकल पीठ के फैसले के बाद गुजरात सरकार ने तत्काल हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपील दाखिल कर दी।
30 अक्टूबर को ही कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनाश रंजन पाठक और न्यायमूर्ति निर्झर एस. देसाई की खंडपीठ ने सरकार की अपील पर विशेष सुनवाई की।
खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले पर रोक लगा दी और निर्देश दिया कि जिलाधिकारी की 10 अगस्त की अधिसूचना अगली सुनवाई तक प्रभावी रहेगी।
अदालत ने दीपावली और गुजराती नववर्ष के दौरान सोमनाथ मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को भी ध्यान में रखा।
इस आदेश के कारण एकल पीठ से कारोबारियों को मिली राहत कुछ ही घंटों में समाप्त हो गई और निर्धारित क्षेत्रों में प्रतिबंध फिर से लागू हो गया।
खंडपीठ ने मामले में अगली सुनवाई के लिए 25 नवंबर 2026 की तारीख निर्धारित की थी।
कारोबारियों ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?
सुप्रीम कोर्ट में कारोबारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने पक्ष रखा।
उन्होंने दलील दी कि गुजरात पुलिस अधिनियम के तहत जिलाधिकारी को किसी क्षेत्र में मांसाहारी भोजन की तैयारी, बिक्री और भंडारण पर इस तरह पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है।
कारोबारियों की ओर से कहा गया कि उनके प्रतिष्ठान पिछले 35 से 40 वर्षों से संचालित हो रहे हैं। वे वैध लाइसेंस के तहत कारोबार कर रहे हैं और अचानक लगाए गए प्रतिबंध से उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, यह उसकी व्यक्तिगत पसंद का मामला है। कानून के माध्यम से लोगों की खानपान संबंधी आदतों को नियंत्रित करने के लिए वैधानिक आधार होना चाहिए।
उन्होंने दीपावली के व्यावसायिक सीजन का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतिबंध से कारोबारियों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
गुजरात सरकार ने प्रतिबंध के समर्थन में क्या कहा?
राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रतिबंध का समर्थन किया।
सरकार का पक्ष था कि निर्धारित प्रतिबंधित क्षेत्र के बाहर कारोबारी अपना व्यवसाय जारी रख सकते हैं। प्रतिबंध का उद्देश्य रेस्टोरेंट बंद कराना नहीं, बल्कि सोमनाथ जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक तीर्थस्थल के आसपास निर्धारित क्षेत्रों में मांसाहारी खाद्य पदार्थों की गतिविधियों को नियंत्रित करना है।
सरकार ने धार्मिक स्थल की महत्ता, श्रद्धालुओं की आवाजाही और तीर्थयात्रा के रास्तों की प्रकृति को अपने पक्ष में प्रमुख आधार बनाया।
इससे पहले गुजरात हाईकोर्ट में भी राज्य सरकार ने सोमनाथ आने वाले श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या का हवाला दिया था। सरकार के अनुसार जनवरी से सितंबर 2026 के बीच सोमनाथ में लगभग 1.16 करोड़ यात्राएं दर्ज की गई थीं।
अनुच्छेद 25 के मामले का भी हो सकता है असर
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 25 से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मामले का भी उल्लेख किया।
अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। हालांकि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की पीठ के सामने सबरीमाला संदर्भ मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और अन्य मौलिक अधिकारों के बीच संबंध से जुड़े व्यापक संवैधानिक सवाल विचाराधीन हैं।
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने मौखिक रूप से संकेत दिया कि उस मामले में आने वाले फैसले का सोमनाथ विवाद पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
हालांकि, इस टिप्पणी को सोमनाथ मामले में किसी अंतिम कानूनी निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
अब आगे क्या होगा और कारोबारियों को कब मिलेगी राहत?
सुप्रीम कोर्ट के 6 नवंबर के आदेश के बाद अब इस विवाद की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई गुजरात हाईकोर्ट में होगी। मामले की अगली तारीख 25 नवंबर 2026 निर्धारित है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ को सुप्रीम कोर्ट ने लंबित अपील पर यथासंभव दो महीने के भीतर फैसला करने का अनुरोध किया है।
अंतिम सुनवाई में हाईकोर्ट को यह तय करना होगा कि जिलाधिकारी ने गुजरात पुलिस अधिनियम के तहत अपनी शक्तियों का सही इस्तेमाल किया था या नहीं। साथ ही कारोबार करने के मौलिक अधिकार और धार्मिक स्थल की गरिमा एवं श्रद्धालुओं की भावनाओं के बीच कानूनी संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है।
यदि हाईकोर्ट अधिसूचना को वैध ठहराता है तो प्रतिबंध जारी रह सकता है। वहीं यदि अधिसूचना को रद्द किया जाता है तो कारोबारियों को राहत मिल सकती है। इसके बाद भी पक्षकारों के पास कानून के अनुसार आगे न्यायिक चुनौती देने का विकल्प रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का क्या है वास्तविक मतलब?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी मांसाहारी भोजन पर प्रतिबंध को स्थायी रूप से सही या गलत घोषित नहीं किया है। अदालत ने केवल गुजरात हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया है।
इसलिए फिलहाल सोमनाथ मंदिर के निर्धारित प्रतिबंधित क्षेत्रों में मांसाहारी खाद्य पदार्थों की तैयारी, बिक्री और भंडारण पर रोक जारी रहेगी। प्रतिबंध की वैधता पर अंतिम फैसला गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ को करना है।
सोमनाथ मंदिर के आसपास नॉनवेज प्रतिबंध का मामला अब एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी विवाद बन चुका है। एक तरफ धार्मिक स्थल की गरिमा और श्रद्धालुओं की भावनाओं का सवाल है, तो दूसरी तरफ कारोबारियों के मौलिक अधिकार और प्रशासनिक शक्तियों की सीमा का मुद्दा है। अब सबकी नजर 25 नवंबर को होने वाली गुजरात हाईकोर्ट की सुनवाई और उसके बाद आने वाले अंतिम फैसले पर रहेगी।
The Supreme Court of India has refused to lift the interim ban on the preparation, sale and storage of non-vegetarian food and eggs within 500 metres of Somnath Temple in Gujarat and other notified areas. The case involves six restaurant owners challenging the Gir Somnath District Magistrate’s notification dated August 10, 2026, under the Gujarat Police Act, 1951. The Supreme Court bench of Justice MM Sundresh and Justice PB Varale has requested the Gujarat High Court to decide the pending appeal preferably within two months. The dispute raises important legal questions concerning religious sentiments, freedom of food choice, the fundamental right to carry on business under Article 19(1)(g), and religious freedom under Article 25 of the Indian Constitution.



















