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यूएई-ईरान टकराव ने बदले मिडिल ईस्ट के समीकरण, सीक्रेट हमलों और मिसाइलों से बढ़ा तनाव!

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AIN NEWS 1: मिडिल ईस्ट में पहले से जारी तनाव अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे टकराव के बीच अब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का नाम भी खुलकर सामने आने लगा है। हालिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि यूएई ने गुप्त रूप से ईरान की महत्वपूर्ण तेल रिफाइनरी पर हमला किया था, जिसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए भारी संख्या में मिसाइल और ड्रोन दागे। इस पूरे घटनाक्रम ने खाड़ी क्षेत्र की राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को बदलकर रख दिया है।

जानकारी के मुताबिक, यह घटना उस समय की बताई जा रही है जब अमेरिका की ओर से युद्धविराम यानी सीजफायर की घोषणा की गई थी। इसी दौरान ईरान के लावन द्वीप स्थित तेल रिफाइनरी में अचानक भीषण आग लग गई थी। उस समय ईरान ने इसे दुश्मन देश की साजिश बताया था, लेकिन किसी देश का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया था। अब दावा किया जा रहा है कि इस ऑपरेशन के पीछे यूएई की भूमिका थी।

बताया जा रहा है कि इस हमले में ईरान की तेल उत्पादन क्षमता को बड़ा नुकसान पहुंचा। लावन रिफाइनरी ईरान के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जाती है। इस पर हुए नुकसान का असर ईरान की अर्थव्यवस्था और तेल निर्यात पर कई महीनों तक पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, हमले के बाद वहां लंबे समय तक आग लगी रही और उत्पादन ठप हो गया।

ईरान ने इस हमले को सीधे चुनौती के रूप में लिया और फिर जवाबी कार्रवाई शुरू हुई। सूत्रों के मुताबिक, ईरान ने यूएई की ओर बड़ी संख्या में मिसाइलें और ड्रोन दागे। कहा जा रहा है कि यूएई पर जितने ड्रोन और मिसाइल छोड़े गए, वह संख्या इजरायल के खिलाफ किए गए कई हमलों से भी अधिक थी। हालांकि यूएई ने इन हमलों को लेकर आधिकारिक तौर पर ज्यादा जानकारी साझा नहीं की, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया।

इन हमलों का असर सिर्फ सैन्य स्तर तक सीमित नहीं रहा। दुबई और अबू धाबी जैसे शहरों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। कई उड़ानों पर असर पड़ा, एयर ट्रैफिक बाधित हुआ और पर्यटन उद्योग को नुकसान पहुंचा। यूएई की अर्थव्यवस्था काफी हद तक विदेशी निवेश, पर्यटन और रियल एस्टेट सेक्टर पर आधारित है। ऐसे में युद्ध जैसे हालात ने निवेशकों और पर्यटकों दोनों की चिंता बढ़ा दी।

बताया जा रहा है कि अमेरिका ने भी इस पूरे मामले में यूएई का अप्रत्यक्ष समर्थन किया। अमेरिकी प्रशासन का मानना था कि उस समय तक सीजफायर पूरी तरह लागू नहीं हुआ था, इसलिए यूएई की कार्रवाई को लेकर कोई सार्वजनिक आपत्ति नहीं जताई गई। व्हाइट हाउस की ओर से यह संकेत भी दिए गए कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास सभी विकल्प खुले हुए हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यूएई लंबे समय से खुद को व्यापार, पर्यटन और आधुनिक विकास मॉडल के रूप में पेश करता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ईरान समर्थित गतिविधियों और क्षेत्रीय तनावों ने यूएई की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया। यही वजह है कि अब यूएई सिर्फ आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति के रूप में भी अपनी मौजूदगी दिखाने लगा है।

यूएई की वायुसेना को खाड़ी क्षेत्र की सबसे आधुनिक सेनाओं में गिना जाता है। उसके पास पश्चिमी देशों से खरीदे गए अत्याधुनिक लड़ाकू विमान और निगरानी सिस्टम हैं। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ईरान के ऊपर फ्रांसीसी मिराज फाइटर जेट और चीनी विंग लूंग ड्रोन देखे गए थे। इन हथियारों का इस्तेमाल यूएई की सेना करती है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि अब तक सामने नहीं आई है।

सिर्फ सैन्य मोर्चे पर ही नहीं, यूएई ने आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर भी ईरान पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। दुबई में ईरान से जुड़ी कई कारोबारी गतिविधियों पर निगरानी कड़ी कर दी गई है। ईरानी संस्थानों, क्लबों और कुछ सांस्कृतिक संगठनों पर भी कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं। इसके अलावा ईरानी नागरिकों के वीजा और ट्रांजिट सुविधाओं में भी कटौती किए जाने की बात कही जा रही है।

संयुक्त राष्ट्र में भी यूएई ने ऐसे प्रस्तावों का समर्थन किया है, जिनमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में ईरान के प्रभाव को कम करने के लिए सख्त कदम उठाने की बात की गई। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल सप्लाई होता है। इस इलाके में किसी भी तरह का तनाव वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित कर सकता है।

मिडिल ईस्ट मामलों की विशेषज्ञ दीना एसफंदियारी का मानना है कि किसी खाड़ी देश का सीधे ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल होना एक बड़ा बदलाव है। अब तक यूएई अपनी संतुलित विदेश नीति और व्यापारिक हितों के लिए जाना जाता था, लेकिन मौजूदा हालात ने उसे अधिक आक्रामक रणनीति अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में ईरान खाड़ी देशों के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश कर सकता है, खासकर उन देशों के बीच जो बातचीत के जरिए तनाव कम करना चाहते हैं। दूसरी ओर यूएई यह संदेश देना चाहता है कि वह अपनी आर्थिक और सामरिक ताकत की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

माना जा रहा है कि यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक सैन्य टकराव नहीं, बल्कि मिडिल ईस्ट में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत है। अमेरिका, इजरायल, ईरान और खाड़ी देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति को और जटिल बना सकती है।

फिलहाल, यूएई और ईरान के बीच बढ़ता तनाव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यदि यह संघर्ष और बढ़ता है तो इसका असर सिर्फ खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल बाजार, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

The UAE vs Iran conflict has emerged as a major geopolitical crisis in the Middle East after reports of secret UAE strikes on Iran’s Lavan oil refinery during a US-backed ceasefire. Iran allegedly responded with massive missile and drone attacks targeting the UAE, escalating regional tensions beyond the Iran-Israel war. The conflict has affected Dubai and Abu Dhabi’s economy, air traffic, tourism, and regional security while also strengthening UAE-US military cooperation. Experts believe this secret war could permanently reshape Middle East geopolitics and Gulf security dynamics.

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