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यूपी में जज रवि कुमार दिवाकर ने कहा- ‘मरना पसंद करूंगा, डरपोक कहलाना नहीं’: नदीम को फांसी सुनाते हुए मुकदमे हटाने और धमकियों का किया जिक्र

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AIN NEWS 1 मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट-3 में सोमवार, 7 सितंबर को एक हत्या के मामले में सुनाए गए फैसले ने न्यायिक व्यवस्था और अदालतों पर दबाव को लेकर नई चर्चा छेड़ दी। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने शाहपुर शहजादी हत्याकांड में उसके पति नदीम को मृत्युदंड की सजा सुनाई। अदालत ने उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

फैसला सुनाते समय जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने निर्णय में व्यक्तिगत रूप से महसूस किए जा रहे दबाव, न्यायिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और अपनी अदालत से मुकदमों को दूसरी अदालतों में भेजे जाने को लेकर कई गंभीर टिप्पणियां कीं। उन्होंने लिखा कि वह डर के कारण अपने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय पद छोड़ना पसंद करेंगे।

‘भगवान से डरना सिखाया, किसी और से नहीं’

जज रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में लिखा कि उनके माता-पिता ने उन्हें बचपन से भगवान से डरने और किसी अन्य व्यक्ति से न डरने की सीख दी है। उन्होंने कहा कि यदि न्यायाधीश किसी व्यक्ति, अपराधी, माफिया या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में आने लगे तो लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर हो जाएगा।

उन्होंने लिखा कि जब तक वह अपने सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकते हैं, तब तक न्यायिक सेवा में रहेंगे। अगर परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं कि वह स्वतंत्र रूप से फैसले नहीं ले सकते, तो इस्तीफा देना बेहतर समझेंगे।

उनके शब्दों का भाव था कि वह मरना पसंद करेंगे, लेकिन डरपोक जज कहलाना स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक वह जज की कुर्सी पर हैं, तब तक निर्णय लेने का अधिकार उनका होना चाहिए।

5 महीने में 23 दोषियों को सुनाई मृत्युदंड की सजा

फैसले में जज दिवाकर ने अपने न्यायिक करियर का भी उल्लेख किया। उपलब्ध विवरण के मुताबिक उन्होंने करीब 17 वर्षों की न्यायिक सेवा में अब तक 36 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया है।

मुजफ्फरनगर में 29 नवंबर 2025 को कार्यभार संभालने के बाद लगभग पांच महीने की अवधि में उनकी अदालत से 23 दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने का उल्लेख फैसले में किया गया है। हालांकि मृत्युदंड सुनाया जाना अंतिम रूप से फांसी दिए जाने के समान नहीं होता। ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया और पुष्टि महत्वपूर्ण होती है।

करीब 100 मुकदमे दूसरी अदालतों में ट्रांसफर होने से आहत होने की बात

जज ने अपने फैसले में यह भी लिखा कि पिछले महीने उनकी अदालत से करीब 100 मुकदमों को रिकॉल कर दूसरी अदालतों में स्थानांतरित किया गया। उन्होंने इस घटनाक्रम पर अपनी नाराजगी और पीड़ा व्यक्त की।

उन्होंने लिखा कि वह इस व्यवहार से बहुत आहत हैं और खुद को व्यक्तिगत विचार व्यक्त करने से रोक नहीं पा रहे हैं। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस पूरे मामले के पीछे की परिस्थितियों के बारे में उन्हें जानकारी है, लेकिन पद की मर्यादा के कारण वह फिलहाल विस्तार से कुछ नहीं कहना चाहते।

जज के मुताबिक कोई व्यक्ति दुनिया के सामने कुछ भी छिपा सकता है, लेकिन अपनी अंतरात्मा से नहीं बच सकता।

‘मुजफ्फरनगर में अपराधियों को कानून का डर नहीं था’

फैसले में मुजफ्फरनगर के अपराध के पुराने दौर का भी जिक्र किया गया। जज ने अदालत परिसर में हुई विक्की त्यागी की हत्या का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसी घटना से अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक समय अपराधियों में कानून का भय किस स्तर तक कम हो गया था।

उन्होंने इलाके में गैंग और माफिया के प्रभाव का उल्लेख करते हुए शौकीन गैंग का भी जिक्र किया। फैसले में बताया गया कि इसी अदालत ने हाल ही में शौकीन के भाई शाहनवाज को भी मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।

ज्ञानवापी मामले के बाद धमकियों का दावा

जज रवि कुमार दिवाकर का नाम वाराणसी के ज्ञानवापी मामले की सुनवाई से भी जुड़ा रहा है। अपने फैसले में उन्होंने दावा किया कि ज्ञानवापी मामले के बाद उन्हें और उनके परिवार को कई बार जान से मारने की धमकियां मिलीं।

उन्होंने कहा कि उन्हें कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर से भी धमकियां मिलीं। फैसले में एक आरोपी के सोशल मीडिया अकाउंट से कथित धमकी का भी उल्लेख किया गया है। जज ने आरोप लगाया कि उनकी तस्वीर का इस्तेमाल कर आपत्तिजनक भाषा में धमकी दी गई थी।

उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि उन्हें लगता है कि उनकी सुरक्षा में अपेक्षित गंभीरता नहीं बरती जा रही है। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि कुछ अधिकारियों को ऐसा लगता है जैसे सुरक्षा उपलब्ध कराकर वे कोई एहसान कर रहे हों।

गैंगस्टर के कथित मैसेज का भी जिक्र

फैसले में जज ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक कथित गैंगस्टर से मिले संदेश का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार संदेश में कहा गया था कि अभी तो केवल मुकदमों को दूसरी अदालतों में हटवाया गया है, लेकिन यदि वह पीछे पड़े तो उनका कोर्ट भी बदलवाया जा सकता है और जिले से बाहर ट्रांसफर कराया जा सकता है।

जज ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता के लिए गंभीर चिंता बताते हुए लिखा कि किसी लोकतांत्रिक देश में यदि न्यायाधीश दबाव या प्रभाव के कारण स्वतंत्र रूप से न्याय करने में असमर्थ होने लगें तो यह गंभीर संकट की स्थिति है।

हालांकि, इन दावों और कथित संदेशों को लेकर संबंधित पक्षों की स्वतंत्र प्रतिक्रिया सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा।

आखिर क्या था शहजादी हत्याकांड?

यह पूरा मामला 23 जुलाई 2018 की रात का है। अभियोजन के मुताबिक रात करीब 8:30 बजे नदीम का अपनी पत्नी शहजादी से विवाद हुआ। आरोप है कि उसने पत्नी के साथ मारपीट और गाली-गलौज की और फिर उस पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी।

गंभीर रूप से झुलसी शहजादी को इलाज के लिए दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां 28 जुलाई 2018 को उसकी मौत हो गई।

मामले की सुनवाई के दौरान शहजादी के माता-पिता और भाई अपने बयानों से कथित तौर पर मुकर गए। इसके बावजूद अभियोजन के लिए शहजादी का मृत्यु से पहले दिया गया बयान बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।

आखिरी बयान बना फैसले का आधार

24 जुलाई 2018 को सफदरजंग अस्पताल में कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने शहजादी का बयान दर्ज किया गया था। इसमें उसने कथित तौर पर अपने पति नदीम को आग लगाने के लिए जिम्मेदार बताया था।

अदालत ने इस बयान को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना और सोमवार को नदीम को मृत्युदंड की सजा सुनाई।

हालांकि, शहजादी ने अपने बयान में दहेज की मांग या दहेज के लिए प्रताड़ित किए जाने की बात नहीं कही थी। इसलिए अदालत ने नदीम को दहेज हत्या के आरोप से बरी कर दिया।

मामले में आरोपी ननद सोनी को भी सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। वहीं आरोपी सास शमशीदा की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो चुकी है।

कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?

रवि कुमार दिवाकर ने न्यायिक सेवा की शुरुआत 17 दिसंबर 2009 को की थी। उन्होंने अलग-अलग जिलों में न्यायिक जिम्मेदारियां निभाई हैं। उनके कार्यक्षेत्र में आजमगढ़, सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी, बरेली और चित्रकूट समेत कई स्थान शामिल रहे हैं।

व्यक्तिगत एवं सेवा विवरण:

जन्म: 5 जुलाई 1980

पिता: पुत्तू लाल

गृहनगर: लखनऊ

शिक्षा: बीकॉम, एलएलबी, एलएलएम

न्यायिक सेवा: 17 दिसंबर 2009 से

मुजफ्फरनगर में कार्यभार: 29 नवंबर 2025

वर्तमान अदालत: फास्ट ट्रैक कोर्ट-3, मुजफ्फरनगर

पद: अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश

फैसले ने खड़े किए कई बड़े सवाल

नदीम को मृत्युदंड सुनाए जाने के साथ जज रवि कुमार दिवाकर की टिप्पणियां भी चर्चा का केंद्र बन गई हैं। एक ओर अदालत ने शहजादी के आखिरी बयान के आधार पर हत्या के आरोपी को गंभीर सजा दी, वहीं दूसरी ओर फैसले में न्यायिक स्वतंत्रता, सुरक्षा, मुकदमों के स्थानांतरण और कथित दबाव का मुद्दा उठाया गया।

जज का यह कहना कि ‘डरकर न्याय करना न्यायिक पद की गरिमा के खिलाफ है’, उनके फैसले की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणियों में से एक माना जा रहा है।

हालांकि मृत्युदंड के मामलों में आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। इसलिए नदीम को सुनाई गई फांसी की सजा के अंतिम कानूनी परिणाम का निर्धारण उच्च न्यायालय की प्रक्रिया के बाद ही होगा।

Muzaffarnagar Judge Ravi Kumar Diwakar sentenced Nadeem to death in the Shahjadi murder case and made strong observations about judicial independence, alleged threats, security concerns and the transfer of around 100 cases from his court. The Ravi Kumar Diwakar case has attracted attention because of his remarks about refusing to work under fear or pressure, his record of death sentences, and the circumstances surrounding the Shahjadi murder trial in Uttar Pradesh.

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Pawan Chaudhary
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पवन चौधरी एक सक्रिय पत्रकार एवं समाचार लेखक हैं, जो जनहित से जुड़े मुद्दों, स्थानीय घटनाक्रम और सामाजिक सरोकारों को प्रमुखता से अपनी पत्रकारिता में स्थान देते हैं। वे जमीनी स्तर की खबरों को तथ्यपरक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। पत्रकारिता के माध्यम से पवन चौधरी आम लोगों की समस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों, सामाजिक मुद्दों और क्षेत्रीय घटनाओं को सामने लाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य निष्पक्ष एवं जिम्मेदार पत्रकारिता के जरिए समाज में जागरूकता बढ़ाना और महत्वपूर्ण मुद्दों को लोगों की आवाज बनाना है।

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