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बंगाल में इमामों और पुजारियों का मानदेय बंद, सुवेंदु सरकार का बड़ा फैसला!

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AIN NEWS 1: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नई सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में कई अहम फैसले लिए हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा उस निर्णय की हो रही है, जिसके तहत राज्य में इमामों, मुअज्जिनों और मंदिरों के पुजारियों को दिया जाने वाला सरकारी मानदेय जून 2026 से बंद कर दिया जाएगा। इसके साथ ही कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के बाद राज्य की मौजूदा OBC सूची को भी रद्द करने का फैसला लिया गया है।

सरकार के इस फैसले को बंगाल की राजनीति में एक बड़े नीतिगत बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। नई सरकार का कहना है कि सरकारी कल्याण योजनाएं धर्म के आधार पर नहीं चलनी चाहिए और राज्य की सहायता सभी नागरिकों के लिए समान रूप से होनी चाहिए।

जून से बंद होंगी धार्मिक आधार वाली योजनाएं

राज्य सरकार के अनुसार सूचना एवं सांस्कृतिक मामलों के विभाग और अल्पसंख्यक मामलों एवं मदरसा शिक्षा विभाग द्वारा संचालित कई योजनाएं फिलहाल इस महीने के अंत तक जारी रहेंगी। लेकिन जून 2026 से इन्हें पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा।

सरकार का तर्क है कि किसी भी समुदाय विशेष को धर्म के आधार पर आर्थिक सहायता देना संविधान की मूल भावना के खिलाफ माना जा सकता है। इसी सोच के तहत यह बड़ा फैसला लिया गया है।

कैबिनेट बैठक के बाद मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा कि राज्य सरकार सामाजिक और आर्थिक आधार पर नई नीति तैयार करेगी। साथ ही OBC आरक्षण की पात्रता तय करने के लिए एक नई समिति बनाई जाएगी।

इमामों के मानदेय की शुरुआत कब हुई थी?

पश्चिम बंगाल में इमामों को सरकारी मानदेय देने की योजना पहली बार वर्ष 2012 में शुरू की गई थी। उस समय तृणमूल कांग्रेस की सरकार सत्ता में थी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आर्थिक रूप से कमजोर मुस्लिम धार्मिक नेताओं को सहायता देने के उद्देश्य से यह योजना लागू की थी।

इस योजना के तहत राज्यभर के रजिस्टर्ड इमामों को हर महीने 2,500 रुपये मानदेय दिया जाता था। सरकार का कहना था कि कई छोटे गांवों और कस्बों में मस्जिदों के इमामों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है, इसलिए उन्हें आर्थिक सहयोग देना जरूरी है।

इस फैसले के बाद उस समय राजनीतिक विवाद भी खड़ा हुआ था। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि सरकार धर्म विशेष को खुश करने की राजनीति कर रही है।

मुअज्जिनों को भी मिलता था भत्ता

इमामों के बाद राज्य सरकार ने मुअज्जिनों के लिए भी आर्थिक सहायता योजना शुरू की थी। मुअज्जिन वे लोग होते हैं जो मस्जिदों में नमाज के समय अजान देकर लोगों को बुलाते हैं।

यह सहायता राशि भी अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के जरिए दी जाती थी। सरकार का दावा था कि इससे गरीब मुस्लिम परिवारों को राहत मिलेगी।

हालांकि विपक्ष लगातार इन योजनाओं को “धार्मिक तुष्टिकरण” बताकर विरोध करता रहा।

2020 में पुजारियों को भी शामिल किया गया

साल 2020 में ममता बनर्जी सरकार ने हिंदू मंदिरों के पुजारियों और पुरोहितों के लिए भी इसी तरह की योजना शुरू की। इसे उस आलोचना का जवाब माना गया, जिसमें कहा जा रहा था कि सरकार सिर्फ मुस्लिम धार्मिक नेताओं को ही आर्थिक सहायता दे रही है।

इस योजना के तहत रजिस्टर्ड हिंदू पुजारियों को शुरुआत में हर महीने लगभग 1,000 रुपये मानदेय दिया जाने लगा। बाद में विधानसभा चुनावों से पहले इस राशि को बढ़ाकर 2,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया।

सरकार का कहना था कि छोटे मंदिरों में पूजा कराने वाले कई पुजारियों की आय बेहद सीमित होती है, इसलिए उन्हें सहायता की जरूरत है।

OBC लिस्ट पर भी बड़ा फैसला

नई बंगाल सरकार ने सिर्फ धार्मिक मानदेय ही नहीं रोका, बल्कि राज्य की मौजूदा OBC सूची को भी रद्द करने का फैसला लिया है। यह कदम कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के बाद उठाया गया है।

दरअसल, हाई कोर्ट ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में OBC श्रेणी में शामिल कई वर्गों को लेकर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण प्रक्रिया में पारदर्शिता और सही सर्वेक्षण जरूरी है।

इसके बाद राज्य सरकार ने नई समिति बनाने का फैसला किया है, जो यह तय करेगी कि किन समुदायों को OBC श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए।

राजनीतिक माहौल हुआ गरम

सरकार के इस फैसले के बाद बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दल इसे “साहसिक फैसला” बता रहे हैं, जबकि कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।

कुछ संगठनों का कहना है कि गरीब धार्मिक नेताओं को मिलने वाली सहायता अचानक बंद करना सही नहीं है। वहीं सरकार समर्थकों का कहना है कि सरकारी योजनाएं धर्म के बजाय आर्थिक और सामाजिक स्थिति के आधार पर होनी चाहिए।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला आने वाले समय में बंगाल की राजनीति को प्रभावित कर सकता है। खासकर 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक विषय बन सकता है।

क्या पड़ेगा असर?

इस फैसले का सीधा असर हजारों इमामों, मुअज्जिनों और पुजारियों पर पड़ेगा, जो पिछले कई वर्षों से सरकारी सहायता प्राप्त कर रहे थे। कई लोगों के लिए यह राशि उनकी नियमित आय का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

अब सरकार नई नीति के तहत सामाजिक और आर्थिक आधार पर योजनाएं बनाने की बात कर रही है। हालांकि अभी यह साफ नहीं हुआ है कि भविष्य में इन धार्मिक समुदायों के लिए कोई वैकल्पिक योजना लाई जाएगी या नहीं।

बंगाल में नई नीति की शुरुआत

सुवेंदु अधिकारी सरकार के इस फैसले को बंगाल में नई प्रशासनिक और राजनीतिक दिशा के तौर पर देखा जा रहा है। सरकार का दावा है कि वह राज्य में “समान नीति” लागू करना चाहती है, जहां सरकारी सहायता धर्म के आधार पर नहीं बल्कि जरूरत के आधार पर दी जाए।

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले पर जनता, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों की क्या प्रतिक्रिया रहती है। फिलहाल इतना तय है कि बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा लंबे समय तक चर्चा में रहने वाला है।

The West Bengal government led by Suvendu Adhikari has announced a major policy change by stopping government allowances for imams, muezzins, and Hindu priests from June 2026. The cabinet also decided to cancel the current OBC list following the Calcutta High Court order. The decision marks a significant shift in Bengal politics and welfare policy, as the state government stated that welfare schemes should not be based on religion. The move is expected to trigger political debate across West Bengal ahead of future elections.

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