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क्या लड़कियों का खतना POCSO एक्ट का उल्लंघन है? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब!

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AIN NEWS 1: देश में लड़कियों के खतना (Female Genital Mutilation – FGM) को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। यह याचिका ‘चेतना वेलफेयर सोसाइटी’ नाम की संस्था ने दायर की है। इसमें दावा किया गया है कि लड़कियों का खतना न तो इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है और न ही किसी धार्मिक ग्रंथ में इसका स्पष्ट आदेश मिलता है। इसके विपरीत, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रथा छोटे बच्चों—खासकर नाबालिग लड़कियों—के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है और POCSO एक्ट का सीधे-सीधे खतरा बढ़ाती है।

FGM क्या है और विवाद क्यों?

FGM यानी महिला जननांग विकृति एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें नाबालिग लड़कियों के जननांगों को किसी न किसी रूप में काटा या नुकसान पहुंचाया जाता है। दुनिया के कई देशों में इसे स्वास्थ्य, मानसिक और सामाजिक नुकसान के कारण पहले ही अपराध घोषित किया जा चुका है। भारत में यह प्रथा मुख्यतः दाऊदी बोहरा समुदाय में देखी जाती है, जहां लड़कियों के बचपन में ‘खतना’ या ‘खफ्स’ किया जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रथा के कारण लड़कियों को संक्रमण, दर्द, मानसिक आघात, बार-बार पेशाब संबंधित समस्याएं, और बाद में प्रसव के दौरान गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे महिलाओं के मानवाधिकारों के खिलाफ बताया है।

याचिका में क्या कहा गया है?

चेतना वेलफेयर सोसाइटी ने अपनी याचिका में कहा है कि:

खतना करने की प्रथा POCSO Act का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि यह बच्चों के शरीर को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने वाला कार्य है।

यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15(1) (लैंगिक भेदभाव से सुरक्षा) और 21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का भी उल्लंघन करती है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि किसी ऐसे कार्य को बढ़ावा दिया जाए, जिससे किसी बच्चे के शरीर या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचे।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि खतना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और अनेक अन्य मुस्लिम समुदायों में यह प्रथा नहीं पाई जाती।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार को नोटिस भेजा है और पूछा है कि भारत में FGM पर सरकार की क्या नीति है। क्या इसे अपराध घोषित किया जा सकता है? क्या यह POCSO Act के दायरे में आता है?

अदालत ने कहा कि यह केवल एक धार्मिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह बच्चों की सुरक्षा, मानवाधिकारों और संविधान की मूल भावना से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए इस पर संतुलित और संवेदनशील तरीके से फैसला करना आवश्यक है।

पहले भी उठ चुका है मुद्दा

खतना पर विवाद कोई नया नहीं है। वर्ष 2017–18 में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी। उस समय केंद्र सरकार ने कहा था कि वह FGM पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में है क्योंकि यह लड़कियों के लिए हानिकारक है। हालांकि, बाद में इस मामले पर लंबी सुनवाई नहीं हो पाई।

दाऊदी बोहरा समुदाय का एक बड़ा हिस्सा खतना को धार्मिक पहचान से जुड़ी परंपरा बताता है, लेकिन समुदाय की कई महिलाएँ—खासकर पीड़ित—इसके खिलाफ सामने आ चुकी हैं। उनका कहना है कि बचपन में यह प्रक्रिया उनके मन और शरीर पर गहरा घाव छोड़ जाती है।

POCSO Act से संबंध

POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) Act बच्चों को यौन उत्पीड़न, शारीरिक शोषण और किसी भी तरह की हानि से बचाने वाला सख्त कानून है। कानून के तहत बच्चे के शरीर को बिना उसकी इच्छा के चोट पहुंचाना या उसके यौन अंगों को नुकसान पहुंचाना अपराध माना जाता है।

कई कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि चूंकि खतना नाबालिग लड़कियों के जननांगों को नुकसान पहुंचाता है, इसलिए यह सीधे-सीधे POCSO के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

सामाजिक और मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया

महिला अधिकार और बाल सुरक्षा से जुड़े संगठन इस प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि:

खतना लड़कियों के विश्वास, मानसिक स्वास्थ्य और शरीर पर गंभीर प्रभाव डालता है।

यह परंपरा समाज में महिला शरीर के प्रति नियंत्रण और पितृसत्ता की सोच को मजबूत करती है।

दूसरी तरफ, कुछ लोग इसे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि यह प्रथा उनकी संस्कृति का हिस्सा है, लेकिन वे इसके सुरक्षित और कम हानिकारक तरीके की बात करते हैं।

आगे क्या?

अब मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है। अदालत के आदेश के बाद सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। यदि कोर्ट यह मान लेता है कि खतना POCSO Act का उल्लंघन है, तो यह प्रथा देशभर में अपराध घोषित हो सकती है।

यह फैसला केवल एक समुदाय को नहीं, बल्कि भारत में बच्चों के अधिकारों और महिलाओं की सुरक्षा को व्यापक रूप से प्रभावित करेगा। इसलिए इस मुद्दे पर सरकार, अदालत और समाज—तीनों की संयुक्त भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

Female Genital Mutilation (FGM) in India has once again come under scrutiny as the Supreme Court issued a notice to the Centre on a petition claiming that FGM violates the POCSO Act and fundamental rights of minor girls. The practice, primarily associated with the Dawoodi Bohra community, raises serious concerns about child protection laws, human rights, and constitutional guarantees. The petition argues that FGM is not an essential religious practice and calls for a complete ban to safeguard girls from physical and psychological harm.

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