AIN NEWS 1 पवन तिवारी : उत्तर प्रदेश पुलिस के कामकाज में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्णा (IPS) की ओर से जारी नए परिपत्र (संख्या 18/2026) में साफ निर्देश दिए गए हैं कि अब हर शिकायत पर सीधे FIR दर्ज करना जरूरी नहीं होगा। पुलिस को पहले यह जांचना होगा कि संबंधित मामले में कानून के अनुसार FIR दर्ज की जानी चाहिए या फिर पीड़ित पक्ष को अदालत में परिवाद (Complaint) दाखिल करना होगा।
यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा 25 फरवरी 2026 को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले के अनुपालन में जारी किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कुछ विशेष अपराधों में FIR दर्ज करने की बजाय केवल परिवाद के आधार पर ही संज्ञान लिया जा सकता है।
⚖️ क्या है पूरा मामला?
यह मामला अनुरुद्ध तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस से जुड़ा है, जिसमें अदालत ने पाया कि पुलिस ने कुछ ऐसी धाराओं में FIR दर्ज कर दी थी, जिनमें कानून के अनुसार ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था।
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 219, 220, 221 और 222 का हवाला देते हुए कहा कि:
कुछ अपराध ऐसे हैं, जिनमें केवल पीड़ित व्यक्ति की शिकायत (Complaint) पर ही कोर्ट संज्ञान ले सकता है।
इन मामलों में पुलिस द्वारा सीधे FIR दर्ज करना कानूनी रूप से गलत है।
📌 किन मामलों में FIR नहीं होगी?
परिपत्र के अनुसार, निम्न प्रकार के मामलों में FIR दर्ज नहीं की जाएगी:
1. विवाह से जुड़े अपराध (BNS धारा 81 से 84)
जैसे:
पति-पत्नी के बीच विवाद
वैवाहिक उत्पीड़न के कुछ विशेष मामले
2. मानहानि (Defamation – BNS धारा 356)
इन मामलों में पीड़ित को सीधे अदालत में परिवाद दाखिल करना होगा। पुलिस केवल मार्गदर्शन दे सकती है, FIR दर्ज नहीं करेगी।
📊 पहले भी जारी हो चुका है ऐसा निर्देश
इससे पहले भी 2025 में सुधीर गोयल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस में हाईकोर्ट ने इसी तरह की टिप्पणी की थी। इसके बाद पुलिस महानिदेशक (अभियोजन) ने दो अलग-अलग सूचियां जारी की थीं:
✔️ पहली सूची: जिनमें केवल परिवाद दाखिल होगा (31 एक्ट)
इनमें शामिल हैं:
घरेलू हिंसा अधिनियम 2005
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट 1881 (चेक बाउंस)
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट 2006
दहेज निषेध अधिनियम (कुछ धाराएं)
महिला कार्यस्थल उत्पीड़न अधिनियम
👉 इन मामलों में सीधे कोर्ट में शिकायत करनी होगी।
✔️ दूसरी सूची: जिनमें FIR दर्ज होगी (39 एक्ट)
इनमें शामिल हैं:
NDPS एक्ट (नशा संबंधित अपराध)
आर्म्स एक्ट
SC/ST एक्ट
POCSO एक्ट (बच्चों के खिलाफ अपराध)
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम
IT एक्ट
UAPA (आतंकवाद विरोधी कानून)
👉 इन मामलों में पुलिस FIR दर्ज कर जांच करेगी।
🚨 नया निर्देश क्या कहता है?
DGP के आदेश में सभी पुलिस अधिकारियों को साफ निर्देश दिए गए हैं कि:
FIR दर्ज करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि संबंधित कानून में इसकी अनुमति है या नहीं
यदि मामला ऐसा है जिसमें केवल परिवाद के आधार पर ही कार्रवाई हो सकती है, तो FIR दर्ज न करें
ऐसे मामलों में पीड़ित को अदालत जाने की सलाह दी जाए
⚠️ गलती करने पर क्या होगा?
परिपत्र में यह भी कहा गया है कि:
अगर कोई पुलिस अधिकारी इन निर्देशों का पालन नहीं करता है
या गलत तरीके से FIR दर्ज करता है
तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
🧠 इस फैसले का क्या असर पड़ेगा?
इस नए निर्देश से कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं:
✅ फायदे:
गलत FIR दर्ज होने से बचाव
अदालत में मामलों की वैधता मजबूत होगी
अभियुक्त को तकनीकी आधार पर राहत मिलने की संभावना कम होगी
❌ चुनौतियां:
आम जनता को प्रक्रिया समझने में दिक्कत हो सकती है
पुलिस पर सही कानूनी निर्णय लेने का दबाव बढ़ेगा
📢 जनता के लिए क्या जरूरी है समझना?
अब अगर कोई व्यक्ति पुलिस स्टेशन जाता है और उसकी शिकायत पर FIR दर्ज नहीं होती, तो इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस मदद नहीं कर रही। हो सकता है कि उस मामले में कानून के अनुसार FIR दर्ज करना ही संभव न हो।
ऐसे में:
पीड़ित को अदालत में परिवाद दाखिल करना होगा
पुलिस केवल मार्गदर्शन देगी
उत्तर प्रदेश पुलिस का यह नया निर्देश कानून के सही पालन और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार होगा, बल्कि अदालतों में मामलों की गुणवत्ता भी बेहतर होगी।
हालांकि, आम लोगों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे अपने अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया को समझें, ताकि उन्हें सही समय पर सही कदम उठाने में मदद मिल सके।
The Uttar Pradesh Police has issued new FIR guidelines in 2026 following the Allahabad High Court order, clarifying that FIRs cannot be registered in certain cases under BNSS 2023 and BNS laws. The directive emphasizes the difference between FIR and complaint procedures, especially in cases like defamation and matrimonial disputes. This move aims to strengthen legal compliance, reduce procedural errors, and ensure that police officers follow correct legal provisions before registering FIRs.


















