AIN NEWS 1 प्रयागराज: पुलिस थानों में लगे CCTV कैमरों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि थाने में CCTV निगरानी व्यवस्था केवल नाम के लिए नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके कैमरे 24 घंटे, सातों दिन और साल के 365 दिन चालू रहने चाहिए। यदि तकनीकी खराबी के कारण CCTV काम करना बंद करता है तो इसकी पूरी जानकारी पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज करनी होगी।
यह आदेश Raghvendra Dubey And Another vs. State of U.P. And 4 Others मामले में 23 सितंबर 2026 को दिया गया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने की। हाईकोर्ट ने न सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी को रद्द किया, बल्कि पुलिस थाने में CCTV खराब होने की स्थिति में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया भी स्पष्ट कर दी।
CCTV फुटेज गायब होने से शुरू हुआ पूरा विवाद
मामला चित्रकूट के थाना सरधुवा से जुड़ा था। याचिकाकर्ता राघवेंद्र दुबे एक मामले में पुलिस हिरासत में थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें अवैध तरीके से हिरासत में रखा गया और उनकी गिरफ्तारी का समय भी सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस थाने के पांच CCTV कैमरों में से केवल दो कैमरों की फुटेज उपलब्ध थी। थाने के तत्कालीन SHO ने अदालत को बताया कि तीन कैमरों की फुटेज कंप्यूटर ऑपरेटर ने DVR में सेव नहीं की थी।
अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि DVR सामान्य रूप से कैमरों की फुटेज अपने आप रिकॉर्ड करता है। ऐसे में किसी कैमरे की फुटेज उपलब्ध न होने के पीछे कैमरे के खराब होने, रिकॉर्डिंग बंद किए जाने या रिकॉर्ड हो चुकी फुटेज को हटाए जाने जैसी संभावनाएं हो सकती हैं।
CCTV फुटेज और पुलिस रिकॉर्ड में सामने आया अंतर
अदालत के सामने उपलब्ध फुटेज में राघवेंद्र दुबे को 13 जुलाई 2026 को सुबह करीब 9 बजे थाने में आते हुए देखा गया। इसके बाद वह सुबह 10:19 बजे थाने से बाहर निकले। फुटेज में उनके साथ जांच अधिकारी भी दिखाई दिए।
इसके बाद उन्हें रात करीब 8:24 बजे दोबारा थाने लाया गया।
दूसरी तरफ पुलिस के गिरफ्तारी मेमो में उनकी गिरफ्तारी का समय दोपहर 3:30 बजे दर्ज था। इतना ही नहीं, जनरल डायरी में उन्हें शाम 6:41 बजे थाने के लॉकअप में रखे जाने की बात दर्ज थी।
हाईकोर्ट ने CCTV फुटेज और पुलिस रिकॉर्ड के बीच इस अंतर को गंभीर माना। अदालत के अनुसार, जब फुटेज यह दिखा रही थी कि व्यक्ति रात 8:24 बजे थाने वापस आया, तो उससे पहले शाम 6:41 बजे उसे लॉकअप में दाखिल किए जाने की GD एंट्री सवाल खड़े करती है।
पुलिस की दलील पर कोर्ट ने जताई नाराजगी
राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि CCTV की तीन कैमरों की फुटेज कंप्यूटर ऑपरेटर द्वारा सेव नहीं की गई थी और संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई भी की गई थी।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि यदि CCTV कैमरे खराब थे तो पुलिस को इसकी जानकारी अदालत के सामने रखनी चाहिए थी। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि किसी कर्मचारी ने फुटेज सेव नहीं की।
कोर्ट ने परिस्थितियों के आधार पर माना कि थाने के अंदर की तीन कैमरों की फुटेज या तो जानबूझकर सेव नहीं की गई या फिर बाद में हटाई गई। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की कार्रवाई बिना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की जानकारी के होना आसान नहीं माना जा सकता।
अब CCTV खराब होने पर SHO को क्या करना होगा?
हाईकोर्ट ने CCTV व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि एक बार पुलिस थाने में CCTV सिस्टम स्थापित और कार्यशील हो जाए तो उसे 24×7×365 चालू रहना चाहिए।
अगर किसी तकनीकी कारण से CCTV निगरानी बंद हो जाती है तो:
SHO को तुरंत इसकी GD में एंट्री करनी होगी।
CCTV कब खराब हुआ, उसका समय दर्ज करना होगा।
किस अधिकारी को लिखित रूप में खराबी की जानकारी दी गई, इसका भी रिकॉर्ड रखना होगा।
जिले के Superintendent of Police (SP) को इसकी जानकारी देना जरूरी होगा।
SP को CCTV की डाउनटाइम अवधि न्यूनतम रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे।
CCTV को दोबारा चालू कराने के लिए की गई कार्रवाई का रिकॉर्ड भी रखा जाना चाहिए।
यानी भविष्य में केवल यह कह देना कि “CCTV खराब था” पर्याप्त नहीं होगा। खराबी की स्थिति में पुलिस को उसके बारे में दस्तावेजी रिकॉर्ड भी रखना होगा।
CCTV बंद होने के दौरान थाने आने वाले हर व्यक्ति का रिकॉर्ड जरूरी
हाईकोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण व्यवस्था तय की है।
यदि CCTV सिस्टम बंद है और इस दौरान किसी व्यक्ति को पूछताछ या गिरफ्तारी के लिए थाने लाया जाता है, तो उसकी जानकारी तुरंत GD में दर्ज करनी होगी।
इसमें व्यक्ति के थाने आने का समय और उससे संबंधित आवश्यक जानकारी दर्ज करनी होगी।
यदि पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया जाता है तो पुलिस को उसकी रिहाई का समय भी GD में दर्ज करना होगा।
इसके साथ ही संबंधित व्यक्ति से रसीद भी ली जानी चाहिए, जिसमें यह दर्ज हो कि उसे किस समय छोड़ा गया और उसे किस व्यक्ति, परिजन या संबंधित व्यक्ति के सुपुर्द किया गया।
नियम नहीं माने तो पुलिस के खिलाफ लग सकता है प्रतिकूल अनुमान
हाईकोर्ट के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है।
अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(g) के समकक्ष भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Bharatiya Sakshya Adhiniyam) की धारा 119(g) के सिद्धांत का उल्लेख किया।
इसका मतलब यह है कि यदि किसी मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य पुलिस के पास उपलब्ध होना चाहिए था, लेकिन उसे पेश नहीं किया गया या उसके गायब होने का संतोषजनक कारण नहीं बताया गया, तो अदालत परिस्थितियों के आधार पर यह मान सकती है कि वह साक्ष्य पुलिस के पक्ष में नहीं था।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि यदि CCTV बंद रहने के दौरान व्यक्ति को थाने लाने, पूछताछ करने और छोड़ने का उचित रिकॉर्ड नहीं रखा गया, तो अवैध हिरासत के आरोपों के संबंध में अदालत प्रतिकूल अनुमान लगा सकती है।
गिरफ्तारी के तरीके पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल
इस मामले में सिर्फ CCTV ही विवाद का विषय नहीं था। अदालत ने गिरफ्तारी के आधार को भी पर्याप्त नहीं माना।
कोर्ट के अनुसार, गिरफ्तारी के आधार व्यक्ति को कानून के अनुसार स्पष्ट रूप से बताए जाने चाहिए। केवल केस डायरी में मौजूद जानकारी की ओर इशारा करना पर्याप्त नहीं माना गया।
हाईकोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी के आधार बताने से संबंधित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ और इस कारण गिरफ्तारी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति के अधिकारों के विपरीत थी।
हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी रद्द की, 10 हजार रुपये मुआवजा भी
मामले में हाईकोर्ट ने राघवेंद्र दुबे की गिरफ्तारी को रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
कोर्ट ने करीब 24 घंटे की अवैध हिरासत के लिए 10,000 रुपये का मुआवजा भी मंजूर किया। अदालत ने कहा कि जांच के बाद जिम्मेदारी तय होने पर यह रकम संबंधित जिम्मेदार व्यक्ति से वसूल की जा सकती है।
अदालत ने अपने आदेश में मामले की परिस्थितियों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया तथ्य यह संकेत देते हैं कि पुलिसकर्मियों ने शिकायतकर्ता की ओर से पैसे की वसूली करने वाले एजेंट की तरह काम किया। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों का आपराधिक मुकदमे की सुनवाई पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
आम लोगों के लिए आदेश क्यों महत्वपूर्ण है?
हाईकोर्ट का यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पुलिस थाने में पूछताछ या हिरासत से जुड़े विवादों में CCTV फुटेज एक अहम इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य हो सकता है।
अब यदि CCTV उपलब्ध नहीं है तो पुलिस को यह बताना होगा कि वह क्यों उपलब्ध नहीं है और उसके दौरान थाने में आने-जाने वाले लोगों का रिकॉर्ड कैसे रखा गया।
इससे हिरासत में लिए गए व्यक्ति के साथ-साथ पुलिस के लिए भी एक स्पष्ट रिकॉर्ड तैयार होगा। विवाद होने पर GD, रिहाई की रसीद और CCTV खराब होने की सूचना जैसे दस्तावेज अदालत के सामने स्थिति स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि हर CCTV खराबी को अदालत पुलिस की गलती मानेगी। तकनीकी उपकरणों में वास्तविक खराबी संभव है। लेकिन ऐसी स्थिति में पुलिस को खराबी की तत्काल सूचना, GD एंट्री, वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी और मरम्मत की कार्रवाई का रिकॉर्ड रखना होगा।
यही इस फैसले का सबसे अहम संदेश है—CCTV बंद होने की स्थिति में रिकॉर्ड रखने की जिम्मेदारी खत्म नहीं होगी, बल्कि और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगी।
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The Allahabad High Court has issued important directions regarding CCTV cameras in police stations in the Raghvendra Dubey case. Police stations must keep CCTV surveillance functional 24x7x365. If CCTV becomes non-functional, the SHO must record the failure in the General Diary, inform the Superintendent of Police and maintain records of every person brought for interrogation or arrest. Entry and release timings must be documented, and a signed release receipt should be obtained. The court also warned that failure to follow these safeguards may lead to an adverse inference in cases involving allegations of illegal detention under Section 119(g) of the Bharatiya Sakshya Adhiniyam.



















