AIN NEWS 1 प्रयागराज। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार बताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि शांति भंग की आशंका या निवारक कार्रवाई (Preventive Detention) के नाम पर किसी भी व्यक्ति को कानून से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। यदि ऐसा किया जाता है तो पीड़ित को ₹25,000 प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा दिया जाएगा और बाद में यह राशि जिम्मेदार पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट के वेतन से वसूल की जाएगी।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने यह आदेश एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका की सुनवाई के दौरान दिया।
क्या था मामला?
याचिका के अनुसार प्रयागराज के खीरी थाना क्षेत्र निवासी एक व्यक्ति को 19 मार्च 2026 की रात पुलिस उसके घर से उठाकर ले गई। परिवार का आरोप था कि गिरफ्तारी का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया और बाद में थाने में उसके साथ मारपीट भी की गई।
परिजनों ने मुख्यमंत्री पोर्टल सहित विभिन्न अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित व्यक्ति को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 170, 126 और 135 के तहत शांति भंग की आशंका के आधार पर हिरासत में लिया गया था और बाद में न्यायिक अभिरक्षा में भेजा गया।
कोर्ट ने क्या पाया?
रिकॉर्ड का परीक्षण करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि व्यक्ति को 19 मार्च 2026 को सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) के समक्ष पेश किया गया था। अदालत के अनुसार ACP ने उसी दिन उसे जेल भेज दिया और अगली तारीख 27 मार्च 2026 तय कर दी।
कोर्ट ने कहा कि यदि व्यक्ति ने व्यक्तिगत मुचलका (Personal Bond) नहीं भरा था, तब भी उसे अगले ही दिन या उचित समय पर फिर से अवसर दिया जाना चाहिए था। सीधे आठ दिन बाद की तारीख लगाकर उसे जेल भेजना कानून की भावना के विपरीत है।
अदालत ने माना कि संबंधित व्यक्ति को 8 दिन तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
पीड़ित को ₹2 लाख मुआवजा
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि पीड़ित को ₹25,000 प्रतिदिन के हिसाब से कुल ₹2 लाख का मुआवजा राज्य सरकार छह सप्ताह के भीतर अदा करे।
इसके बाद यह राशि विभागीय जांच पूरी होने पर संबंधित ACP, बारा (प्रयागराज) से वसूल की जाएगी।
पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने प्रयागराज और गाजियाबाद कमिश्नरेट से जुड़े आंकड़े भी पेश किए गए।
गाजियाबाद कमिश्नरेट द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार मई 2025 से अप्रैल 2026 के बीच 2522 लोगों को धारा 170, 126 और 135 BNSS के तहत हिरासत में रखा गया। इनमें कई लोगों की हिरासत अवधि 1 दिन से लेकर 17 दिन तक रही।
वहीं प्रयागराज में वर्ष 2024, 2025 और 2026 के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को इन धाराओं के तहत जेल भेजे जाने का विवरण अदालत के सामने आया। कई मामलों में हिरासत अवधि एक सप्ताह से लेकर 20 दिन या उससे अधिक पाई गई।
इस पर अदालत ने कहा कि पुलिस कमिश्नरों को जो मजिस्ट्रेटी शक्तियां दी गई हैं, उनका कई मामलों में गलत इस्तेमाल होता दिखाई दे रहा है।
हाईकोर्ट के नए दिशा-निर्देश
अदालत ने अपने पूर्व के एक फैसले का हवाला देते हुए पूरे प्रदेश में लागू होने वाले महत्वपूर्ण निर्देश दोहराए हैं—
1. व्यक्तिगत मुचलके पर रिहाई प्राथमिकता
निवारक कार्रवाई में पकड़े गए व्यक्ति से केवल व्यक्तिगत मुचलका लिया जाए। सामान्यतः इसकी राशि ₹20,000 से अधिक न हो और जमानतदार (Surety) की अनिवार्यता न रखी जाए।
2. उसी दिन रिहाई का अवसर
यदि व्यक्ति व्यक्तिगत मुचलका भर देता है तो उसे उसी दिन रिहा किया जाए।
3. इंकार होने पर रिकॉर्डिंग जरूरी
यदि कोई व्यक्ति मुचलका भरने से इंकार करता है तो उसका लिखित और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड तैयार किया जाए।
4. 24 घंटे से अधिक हिरासत पर जवाबदेही
यदि बिना उचित कारण किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक हिरासत में रखा जाता है तो उसे ₹25,000 प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा दिया जाएगा।
5. अफसरों की जेब से वसूली
राज्य सरकार द्वारा दिया गया मुआवजा बाद में जिम्मेदार पुलिस अधिकारी, मजिस्ट्रेट या दोनों के वेतन से वसूला जाएगा।
6. विभागीय कार्रवाई भी होगी
जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई (Departmental Proceedings) भी चलाई जाएगी।
14 सितंबर तक मांगी अनुपालन रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने प्रयागराज पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया है कि इस आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट 14 सितंबर 2026 तक अदालत में प्रस्तुत की जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आदेश का पालन नहीं हुआ तो पुलिस आयुक्त को स्वयं अदालत में उपस्थित होना पड़ सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला केवल एक व्यक्ति को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा शांति भंग की आशंका के मामलों में की जाने वाली कार्रवाई के लिए नई जवाबदेही तय करता है।
अब किसी भी व्यक्ति को बिना पर्याप्त कानूनी आधार के लंबे समय तक हिरासत में रखने पर न केवल सरकार को मुआवजा देना पड़ेगा, बल्कि संबंधित अधिकारी को भी व्यक्तिगत आर्थिक और विभागीय परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
कोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी
“व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और कानून की प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी नागरिक को जेल में नहीं रखा जा सकता।”


















