AIN NEWS 1प्रयागराज/लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सात वर्ष या उससे कम सजा वाले अपराधों में जेल में निरुद्ध आरोपियों के मामलों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला स्तर पर जानकारी जुटाने की प्रक्रिया शुरू की है। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को भेजे गए पत्र में ऐसे आरोपियों का डेटा निर्धारित प्रारूप में उपलब्ध कराने को कहा गया है।
यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के Satender Kumar Antil बनाम Central Bureau of Investigation मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के संदर्भ में की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2021 के अपने फैसले में सात वर्ष या उससे कम सजा वाले कुछ अपराधों को Category-A में रखते हुए जमानत प्रक्रिया को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए थे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के पत्र में क्या कहा गया?
उपलब्ध पत्र के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को पत्र भेजा गया है। पत्र पर Letter No. 12198/Admin G-II तथा 19 सितंबर 2026 की तारीख अंकित है।
पत्र का विषय है—7 वर्ष या उससे कम सजा वाले अपराधों के तहत जेल में बंद आरोपियों के संबंध में जानकारी।
पत्र में सुप्रीम कोर्ट के 7 अक्टूबर 2021 के Satender Kumar Antil Vs. CBI फैसले का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सात वर्ष या उससे कम सजा वाले अपराधों से संबंधित कुछ मामलों में जमानत अर्जियों को आरोपी को शारीरिक हिरासत में लिए बिना सुनने तथा जमानत आवेदन के निर्णय तक अंतरिम जमानत देने की व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश दिए हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी संदर्भ में ऐसे आरोपियों की जानकारी जुटाने के लिए संबंधित न्यायिक अधिकारियों से डेटा उपलब्ध कराने को कहा है।
21 सितंबर तक मांगी गई थी जानकारी
पत्र में संबंधित अधिकारियों को Annexure-I में मांगी गई जानकारी DISHA पोर्टल के माध्यम से उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। पत्र में इसके लिए 21 सितंबर 2026 तक जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया था।
इससे स्पष्ट है कि हाईकोर्ट स्तर पर प्रदेश की जिला अदालतों से आंकड़े एकत्र कर यह देखा जा रहा है कि सात वर्ष या उससे कम सजा वाले अपराधों से संबंधित कितने आरोपी जेल में निरुद्ध हैं और उनके मामलों में जमानत से संबंधित स्थिति क्या है।
हालांकि, उपलब्ध पत्र में ऐसे आरोपियों की कुल संख्या या जिलेवार आंकड़े नहीं दिए गए हैं। इसलिए इस दस्तावेज के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रदेश में ऐसे कितने लोग वर्तमान में जेल में हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में क्या कहा गया था?
Satender Kumar Antil Vs. CBI मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपराधों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटते हुए जमानत प्रक्रिया को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए थे।
Category-A में ऐसे अपराध रखे गए हैं जिनमें अधिकतम सजा सात वर्ष या उससे कम है और जो अन्य निर्धारित श्रेणियों में नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों में यह भी बताया गया कि इस व्यवस्था का लाभ लेने के लिए कुछ आवश्यक परिस्थितियां मौजूद होनी चाहिए। इनमें आरोपी का जांच के दौरान गिरफ्तार न होना और जांच में सहयोग करना शामिल है।
फैसले में Category-A मामलों के लिए चार्जशीट दाखिल होने और अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद पहले सामान्य समन जारी करने की प्रक्रिया बताई गई। कुछ परिस्थितियों में वकील के माध्यम से पेश होने की अनुमति भी दी जा सकती है।
यदि आरोपी समन मिलने के बावजूद उपस्थित नहीं होता है, तो उसके खिलाफ बailable warrant और उसके बाद परिस्थितियों के अनुसार non-bailable warrant की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि कुछ परिस्थितियों में आरोपी के उपस्थित होने पर उसकी जमानत अर्जी पर उसे पहले शारीरिक हिरासत में लिए बिना फैसला किया जा सकता है या जमानत आवेदन के निर्णय तक अंतरिम जमानत दी जा सकती है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर आरोपी को स्वतः जमानत मिलेगी
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। सात वर्ष या उससे कम सजा वाले अपराध में आरोपी होने मात्र से स्वतः जमानत मिलने का अधिकार नहीं बन जाता।
Satender Kumar Antil फैसले में जिन परिस्थितियों और प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है, उनका पालन संबंधित मामले के तथ्यों, अपराध की प्रकृति, आरोपी के आचरण और लागू कानून के अनुसार किया जाता है। Category-A में भी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ आवश्यक शर्तों का उल्लेख किया है।
इसके अलावा, विशेष कानूनों के तहत आने वाले अपराधों और आर्थिक अपराधों के लिए अलग श्रेणियां निर्धारित की गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Category-B, Category-C और Category-D के लिए अलग प्रक्रिया बताई है। इसलिए केवल अधिकतम सजा सात वर्ष या उससे कम होने के आधार पर सभी मामलों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
उत्तर प्रदेश में पहले भी सामने आ चुका है इसका असर
सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा-निर्देशों का उल्लेख उत्तर प्रदेश के मामलों में भी हुआ है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के विभिन्न आदेशों में Satender Kumar Antil के फैसले को उद्धृत करते हुए Category-A मामलों में आरोपी की जमानत प्रक्रिया पर चर्चा की गई है। एक मामले में हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताई गई आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तो संबंधित प्रक्रिया के तहत आरोपी को जमानत आवेदन पर विचार के लिए अनिवार्य रूप से न्यायिक हिरासत में भेजना आवश्यक नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद की कार्यवाहियों में भी इस फैसले के अनुपालन और उससे संबंधित आंकड़ों पर निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया है। वर्ष 2023 की एक कार्यवाही में अदालत ने जिला एवं न्यायालय स्तर के आंकड़ों से संबंधित कई पहलुओं की जानकारी मांगी थी।
हाईकोर्ट की मौजूदा कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण है?
हाईकोर्ट की ओर से जिला अदालतों से डेटा मांगे जाने का प्रमुख उद्देश्य संबंधित मामलों की स्थिति को आंकड़ों के आधार पर समझना है। इससे यह जानकारी सामने आ सकती है कि सात वर्ष या उससे कम सजा वाले अपराधों में कितने आरोपी जेल में हैं, उनके मामलों की स्थिति क्या है और जमानत संबंधी प्रक्रिया किस चरण में है।
लेकिन उपलब्ध पत्र से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि हाईकोर्ट ने सभी ऐसे आरोपियों को रिहा करने का आदेश दे दिया है। यह पत्र प्रशासनिक तौर पर जानकारी/डेटा एकत्र करने के निर्देश से संबंधित है। किसी व्यक्ति की जमानत उसके अपने मामले में सक्षम अदालत द्वारा लागू कानून और परिस्थितियों के आधार पर तय होगी।
पत्र पर जिला अदालत की ओर से क्या आदेश दर्ज है?
दस्तावेज के निचले हिस्से में हस्तलिखित टिप्पणी भी दिखाई दे रही है—“Seen, Statement Clerk to Comply”। इसके नीचे District Judge की ओर से दिनांक 21.09.2026 अंकित है।
इससे संकेत मिलता है कि पत्र को जिला न्यायालय स्तर पर देखा गया और संबंधित स्टेटमेंट/जानकारी तैयार कर अनुपालन करने के लिए निर्देशित किया गया।
आगे क्या होगा?
अब संबंधित जिला न्यायालयों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर हाईकोर्ट के स्तर पर स्थिति का आकलन किया जा सकता है। यदि किसी विशेष मामले में आरोपी को लगता है कि उसके मामले पर सुप्रीम कोर्ट के Satender Kumar Antil दिशा-निर्देश लागू होते हैं, तो वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से संबंधित अदालत के समक्ष उचित कानूनी राहत मांग सकता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि किसी आरोपी की जमानत का अंतिम फैसला उसके व्यक्तिगत केस रिकॉर्ड और लागू कानून के आधार पर संबंधित अदालत ही करेगी।
The Allahabad High Court has sought district-wise data on accused languishing in jail for offences punishable with imprisonment of seven years or less. The communication refers to the Supreme Court judgment in Satender Kumar Antil vs CBI, which laid down bail guidelines for Category-A offences subject to specified conditions. District courts in Uttar Pradesh were asked to provide the required information through the DISHA portal, helping the High Court monitor compliance with the applicable bail procedure.



















