साइबर ठगों पर सरकार की बड़ी कार्रवाई, 11,158 करोड़ रुपये बचाए; 15.75 लाख SIM और 5.77 लाख IMEI ब्लॉक
AIN NEWS 1 नई दिल्ली। देश में बढ़ते ऑनलाइन फ्रॉड, डिजिटल ठगी और साइबर अपराध के बीच केंद्र सरकार ने साइबर अपराधियों पर कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ाया है। गृह मंत्रालय के अधीन काम कर रहे इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) के जरिए वित्तीय धोखाधड़ी को रोकने, संदिग्ध मोबाइल नंबरों और डिवाइस की पहचान करने तथा साइबर अपराध से जुड़े नेटवर्क पर कार्रवाई के लिए कई स्तरों पर व्यवस्था तैयार की गई है।
सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 30 जून 2026 तक Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System (CFCFRMS) के जरिए 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम को साइबर ठगों के हाथों जाने से बचाया गया। यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साइबर फ्रॉड में शुरुआती कुछ मिनट और घंटे बेहद अहम होते हैं। समय पर शिकायत मिलने पर संबंधित बैंक और वित्तीय संस्थानों के साथ समन्वय करके रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की कोशिश की जाती है।

1930 हेल्पलाइन बनी महत्वपूर्ण हथियार
साइबर ठगी का शिकार होने वाले लोगों के लिए सरकार ने 1930 हेल्पलाइन शुरू की है। इसके जरिए पीड़ित वित्तीय साइबर फ्रॉड की सूचना दे सकते हैं। इसके साथ ही National Cyber Crime Reporting Portal पर भी शिकायत दर्ज की जा सकती है।
I4C के तहत चल रहा CFCFRMS वर्ष 2021 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य साइबर ठगी की सूचना मिलने के बाद तेजी से संबंधित संस्थाओं तक जानकारी पहुंचाना और ठगी की रकम को आगे जाने से रोकना है। सरकार के अनुसार, जून 2026 तक इस व्यवस्था के जरिए 11,158 करोड़ रुपये से अधिक बचाए जा चुके हैं।
यानी अगर किसी व्यक्ति के खाते से धोखाधड़ी के जरिए पैसा निकाला जाता है और पीड़ित तुरंत शिकायत करता है, तो संबंधित सिस्टम के जरिए रकम को रोकने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में पूरी रकम स्वतः वापस मिल जाती है। रकम की वापसी संबंधित जांच, बैंकिंग प्रक्रिया और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
25,698 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन रोके गए
सरकार ने साइबर अपराधियों के बैंकिंग नेटवर्क पर भी निगरानी बढ़ाई है। I4C ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों के सहयोग से Suspect Registry तैयार की है। इसमें साइबर अपराध से जुड़े संदिग्ध पहचान संबंधी डेटा को साझा किया जाता है।
30 जून 2026 तक बैंकों से प्राप्त 30.48 लाख से अधिक संदिग्ध identifier data और 32.08 लाख Layer-1 mule accounts से संबंधित जानकारी भागीदार संस्थाओं के साथ साझा की गई। इसके परिणामस्वरूप 25,698 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन को decline किया गया।
‘Mule account’ ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल अपराधी ठगी की रकम को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए कर सकते हैं। साइबर ठग अक्सर कई खातों की परत बनाकर रकम को तेजी से इधर-उधर करते हैं, जिससे उसकी वास्तविक मंजिल तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। संदिग्ध खातों की पहचान और लेनदेन रोकने की व्यवस्था इस नेटवर्क को तोड़ने में मदद करती है।
15.75 लाख SIM और 5.77 लाख IMEI ब्लॉक
साइबर अपराध के लिए मोबाइल नंबर और मोबाइल डिवाइस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने को देखते हुए दूरसंचार स्तर पर भी कार्रवाई की जा रही है।
गृह मंत्रालय के अनुसार, 30 जून 2026 तक पुलिस अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर 15.75 लाख से अधिक SIM कार्ड और 5.77 लाख IMEI नंबर ब्लॉक किए गए।
IMEI मोबाइल डिवाइस की पहचान से जुड़ा एक विशिष्ट नंबर होता है। किसी डिवाइस के साइबर अपराध में इस्तेमाल होने की जानकारी मिलने पर उसके IMEI को ब्लॉक करने से उस डिवाइस के नेटवर्क पर इस्तेमाल को रोकने में मदद मिल सकती है।
साइबर अपराधियों पर अंतरराज्यीय कार्रवाई
साइबर ठगी का नेटवर्क अक्सर एक राज्य तक सीमित नहीं रहता। अपराधी एक राज्य में बैठकर दूसरे राज्य के लोगों को निशाना बना सकते हैं और पैसा तीसरे राज्य के बैंक खातों में भेजा जा सकता है। इसी वजह से राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
I4C ने साइबर अपराध के हॉटस्पॉट और बहु-क्षेत्राधिकार वाले मामलों के लिए Joint Cyber Coordination Teams (JCCTs) बनाई हैं। ये टीमें मेवात, जामताड़ा, अहमदाबाद, हैदराबाद, चंडीगढ़, विशाखापत्तनम और गुवाहाटी जैसे क्षेत्रों में राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत करने के लिए काम कर रही हैं।
इसके अलावा I4C के Samanvaya प्लेटफॉर्म के जरिए साइबर अपराध से संबंधित डेटा और अपराधियों के बीच संभावित अंतरराज्यीय संबंधों का विश्लेषण किया जाता है। इसके ‘Pratibimb’ मॉड्यूल के जरिए अपराधियों और साइबर अपराध के बुनियादी ढांचे की लोकेशन संबंधी जानकारी को मैप करने में भी मदद मिलती है।
सरकार के अनुसार, इस व्यवस्था के जरिए 29,837 से अधिक आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है और 2.33 लाख से ज्यादा साइबर जांच सहायता अनुरोधों पर कार्रवाई की गई है।
फर्जी लोन ऐप और डिजिटल ठगी पर नजर
ऑनलाइन ठगी के तरीकों में फर्जी लोन ऐप, निवेश के नाम पर धोखाधड़ी, फर्जी कस्टमर केयर, डिजिटल अरेस्ट, OTP फ्रॉड, सोशल मीडिया स्कैम और फिशिंग लिंक जैसे मामले लगातार सामने आते रहे हैं।
फर्जी लोन ऐप के जरिए कई बार लोगों को आसान और तत्काल कर्ज देने का लालच दिया जाता है। इसके बाद उनसे अत्यधिक ब्याज, अतिरिक्त शुल्क या व्यक्तिगत जानकारी हासिल करने की कोशिश की जा सकती है। ऐसे मामलों में केवल ऐप को हटाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उससे जुड़े मोबाइल नंबर, बैंक खाते, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरे लिंक की भी जांच जरूरी होती है।
नोट: उपलब्ध ताजा गृह मंत्रालय/PIB अपडेट में 30 जून 2026 तक 11,158 करोड़ रुपये बचाने, 25,698 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन रोकने तथा 15.75 लाख SIM और 5.77 लाख IMEI ब्लॉक करने के आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि है। आपके दिए गए 3,718 मोबाइल ऐप ब्लॉक वाले आंकड़े की मुझे ताजा आधिकारिक PIB रिलीज में स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली, इसलिए उसे निश्चित सरकारी आंकड़े के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
अप्रैल 2026 से रकम वापस करने की प्रक्रिया को भी मजबूत किया गया
सरकार ने साइबर फ्रॉड के मामलों में केवल रकम रोकने तक सीमित रहने के बजाय शिकायतों के निस्तारण और पीड़ितों को रकम वापस दिलाने की प्रक्रिया को भी मजबूत किया है।
अप्रैल 2026 से Money Restoration Module और Grievance Redressal Module को सक्रिय किया गया है। इनका उद्देश्य साइबर फ्रॉड के बाद रोकी गई रकम को सही दावेदार तक जल्द पहुंचाने और बैंक खातों पर लगाए गए lien या freeze से जुड़ी शिकायतों के निस्तारण में तेजी लाना है।
राज्यों की भूमिका भी अहम
गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य के विषय हैं। साइबर अपराध की रोकथाम, जांच, FIR, गिरफ्तारी और चार्जशीट जैसी कार्रवाई मुख्य रूप से संबंधित राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की कानून प्रवर्तन एजेंसियां करती हैं। केंद्र सरकार I4C, तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण, साइबर फोरेंसिक सुविधाओं और समन्वय के जरिए राज्यों की मदद करती है।
सरकार ने साइबर अपराध की जांच क्षमता बढ़ाने के लिए साइबर फोरेंसिक प्रयोगशालाओं और प्रशिक्षण पर भी निवेश किया है। 33 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में साइबर फोरेंसिक-कम-ट्रेनिंग लैबोरेटरी स्थापित की जा चुकी हैं और 24,600 से ज्यादा कानून प्रवर्तन अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों तथा अभियोजकों को साइबर अपराध से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया है।
आम लोगों के लिए सबसे जरूरी बात
साइबर फ्रॉड होने के बाद सबसे बड़ी गलती देर करना होती है। अगर खाते से पैसा निकल गया है तो पीड़ित को तुरंत 1930 पर कॉल करना चाहिए और National Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। बैंक को भी तत्काल जानकारी देना जरूरी है।
किसी अनजान लिंक पर क्लिक करने, OTP या PIN साझा करने, स्क्रीन शेयरिंग ऐप इंस्टॉल करने या सोशल मीडिया पर मिले किसी संदिग्ध निवेश/लोन ऑफर पर भरोसा करने से बचना चाहिए। खासकर ऐसे मामलों में जहां सामने वाला व्यक्ति तुरंत भुगतान करने या निजी जानकारी साझा करने का दबाव बनाए, सावधानी बेहद जरूरी है।
कुल मिलाकर, सरकार की ताजा कार्रवाई यह दिखाती है कि साइबर अपराध से लड़ाई अब केवल पुलिस शिकायत तक सीमित नहीं रह गई है। बैंक, टेलीकॉम कंपनियां, वित्तीय संस्थान, डिजिटल प्लेटफॉर्म और राज्य पुलिस को एक साझा व्यवस्था में जोड़कर ठगी की रकम, मोबाइल नंबर, डिवाइस और साइबर अपराधियों के नेटवर्क पर एक साथ कार्रवाई करने की कोशिश की जा रही है। 30 जून 2026 तक 11,158 करोड़ रुपये से अधिक की रकम को बचाया जाना और 25,698 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन को रोका जाना इसी व्यापक साइबर सुरक्षा अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
India has intensified its fight against cyber crime through the Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) under the Ministry of Home Affairs. Through the CFCFRMS system, more than Rs 11,158 crore has been saved from cyber fraud across over 32.80 lakh complaints till June 30, 2026. The government has also blocked more than 15.75 lakh SIM cards and 5.77 lakh IMEIs linked to cybercrime, while transactions worth Rs 25,698 crore were declined through the suspect registry mechanism. The 1930 cyber fraud helpline and National Cyber Crime Reporting Portal are playing an important role in preventing online financial fraud.



















