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भारत ने सिंधु जल संधि निलंबित कर शुरू की 12 GW की जलविद्युत परियोजनाएं, जम्मू-कश्मीर में तेजी से हो रहा निर्माण!

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AIN NEWS 1: भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से निलंबित करने के बाद अब इस नदी प्रणाली पर बड़े पैमाने पर जलविद्युत परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाने की योजना शुरू कर दी है। केंद्र सरकार ने यह फैसला जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद लिया, जिसमें कई जवान शहीद हो गए थे। यह कदम न केवल पाकिस्तान को कड़ा संदेश देने के लिए है, बल्कि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक रणनीतिक पहल मानी जा रही है।

12 GW की जलविद्युत क्षमता का लक्ष्य

भारत का लक्ष्य सिंधु नदी प्रणाली पर 12 गीगावॉट (GW) अतिरिक्त बिजली उत्पादन करना है। जल शक्ति मंत्रालय और राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) इन परियोजनाओं को जमीन पर उतारने की दिशा में तेजी से कार्य कर रहे हैं। इसके लिए तकनीकी व व्यवहार्यता अध्ययन भी शुरू हो चुके हैं।

वर्तमान में सिंधु नदी प्रणाली पर कई परियोजनाएं पहले से चल रही हैं, जिनसे 2.5 GW तक की बिजली उत्पादन क्षमता जुड़ने की उम्मीद है। लेकिन इनकी गति पहले धीमी थी, जिसका मुख्य कारण सिंधु जल संधि की शर्तें और पाकिस्तान की आपत्तियां थीं। अब जबकि संधि को निलंबित किया गया है, तो इन परियोजनाओं को नई रफ्तार मिलने की संभावना है।

प्रमुख प्रस्तावित परियोजनाएं

नई जलविद्युत परियोजनाएं मुख्यतः जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित हैं:

सावलकोट परियोजना – 1,856 मेगावाट (चिनाब नदी पर, रामबन और उधमपुर जिलों में)

पाकल दुल – 1,000 मेगावाट

रतले – 850 मेगावाट

बर्सर – 800 मेगावाट

किरू – 624 मेगावाट

किर्थाई-I और II – कुल 1,320 मेगावाट

इन सभी परियोजनाओं को राष्ट्रीय पावर ग्रिड से जोड़ा जाएगा ताकि जम्मू-कश्मीर समेत देश के अन्य राज्यों को स्थायी ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

पाकिस्तान की आपत्तियां और अंतरराष्ट्रीय विवाद

पाकिस्तान ने इन परियोजनाओं पर पहले भी कई बार आपत्ति जताई है, विशेषकर किशनगंगा और रतले डैम को लेकर। उसका आरोप है कि भारत इनसे सिंधु जल संधि का उल्लंघन कर रहा है। 2011 में किशनगंगा परियोजना को इसी कारण अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के चलते रोकना पड़ा था। हालांकि भारत ने हमेशा पाकिस्तान के आरोपों को खारिज किया है।

कानूनी और रणनीतिक पहलू

जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने 30 अप्रैल को गृह मंत्री अमित शाह से दूसरी बार मुलाकात की और उन्हें डैमों की स्थिति, जलाशयों और संधि निलंबन से जुड़े कानूनी पहलुओं पर जानकारी दी। इससे पहले 25 अप्रैल को एक उच्चस्तरीय बैठक में इन परियोजनाओं को प्राथमिकता देने का फैसला लिया गया था।

जल प्रवाह में प्राकृतिक गिरावट

भारत का यह भी कहना है कि बीते वर्षों में कश्मीर से गुजरने वाली नदियों में प्राकृतिक रूप से जल प्रवाह में कमी आई है। अमेरिकी थिंक टैंक CSIS की रिपोर्ट के अनुसार, सिंधु नदी बेसिन में मीठे पानी का बहाव घटा है, जिससे इन परियोजनाओं की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता और हरित ऊर्जा की ओर कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये सभी परियोजनाएं समय पर पूरी हो जाती हैं, तो भारत की ग्रीन एनर्जी क्षमता में बड़ा इजाफा होगा। साथ ही जम्मू-कश्मीर के आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी। भारत का यह कदम पाकिस्तान को एक स्पष्ट संदेश देने के साथ-साथ दीर्घकालिक रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।

Following the suspension of the Indus Water Treaty, India has begun accelerating work on several hydropower projects with a total potential of around 12 GW, including major developments like the Sawalkot Dam, Pakal Dul, and Ratle Project in Jammu and Kashmir. The government, through the Ministry of Jal Shakti and NHPC, is working towards greater energy independence, especially in light of ongoing India-Pakistan tensions and cross-border terrorism concerns. These moves mark a significant shift in India’s strategic and renewable energy policy.

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