AIN NEWS 1: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वाला देवी मंदिर, जिसे ज्वालामुखी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शामिल है। मंदिर से जुड़ी मान्यताएं सदियों पुरानी हैं और यहां जलती प्राकृतिक ज्वालाएं श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। खास बात यह है कि यहां देवी की पूजा किसी पारंपरिक मूर्ति के बजाय पवित्र ज्वाला के रूप में की जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब माता सती के शरीर के अंग भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से अलग होकर अलग-अलग स्थानों पर गिरे, तब ज्वालामुखी में उनकी जीभ गिरी थी। इसी वजह से इसे शक्तिपीठ के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है। हालांकि, यह विवरण धार्मिक और पौराणिक परंपरा का हिस्सा है, जिसे ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रमाणित नहीं किया जा सकता।

नौ ज्वालाओं को माना जाता है नौ देवियों का स्वरूप
ज्वाला देवी मंदिर की सबसे खास पहचान यहां दिखाई देने वाली प्राकृतिक ज्वालाएं हैं। मंदिर की परंपरा के अनुसार यहां नौ ज्वालाएं नौ अलग-अलग देवी स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इनमें महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजी देवी के नाम शामिल हैं।
इन ज्वालाओं को देखकर श्रद्धालुओं के मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि आखिर बिना किसी दिखाई देने वाले तेल, बाती या लकड़ी के ये आग की लपटें कैसे जलती रहती हैं?
यहीं से इस मंदिर की धार्मिक आस्था और भू-विज्ञान दोनों की चर्चा शुरू होती है।
प्राकृतिक गैस से जुड़ा है ज्वाला का वैज्ञानिक पहलू
मंदिर में ज्वाला को देवी का दिव्य स्वरूप माना जाता है। वहीं वैज्ञानिक और भूवैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस क्षेत्र में प्राकृतिक गैस के रिसाव का रिकॉर्ड मौजूद है।
भारत सरकार के Directorate General of Hydrocarbons (DGH) के रिकॉर्ड में ज्वालामुखी क्षेत्र में प्राकृतिक गैस के सतह तक पहुंचने का उल्लेख है। उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यहां निकलने वाली गैस में मीथेन की मात्रा काफी अधिक पाई गई है।
इसका मतलब यह है कि ज्वाला के पीछे प्राकृतिक गैस के रिसाव की एक वैज्ञानिक व्याख्या मौजूद है। इसलिए यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि वैज्ञानिकों को ज्वाला के जलने का कोई संभावित कारण पता ही नहीं है।
हालांकि श्रद्धालुओं के लिए इसका धार्मिक महत्व अपनी जगह है। आस्था में ये ज्वालाएं स्वयं मां ज्वाला का स्वरूप हैं, जबकि विज्ञान इन्हें प्राकृतिक गैस के सतही रिसाव और उसके दहन की प्रक्रिया से जोड़ता है।
गोरख डिब्बी भी है मंदिर का खास आकर्षण
ज्वाला देवी मंदिर परिसर में गोरख डिब्बी नाम का एक कुंड भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसका संबंध गुरु गोरखनाथ से है।
इस कुंड का पानी देखने में ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह उबल रहा हो। लेकिन मंदिर से जुड़े विवरणों के अनुसार पानी को छूने पर वह सामान्य या ठंडा महसूस होता है। यही वजह है कि इसे देखने वाले लोगों के मन में इसके पीछे की वजह जानने की उत्सुकता रहती है।
गोरख डिब्बी को लेकर कई धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें गुरु गोरखनाथ और माता ज्वाला से जुड़ी कहानी सबसे प्रसिद्ध है। इसलिए इस प्रसंग को भी धार्मिक मान्यता और लोकपरंपरा के रूप में समझना उचित है।
गोरखनाथ से जुड़ी है रोचक कथा
मंदिर की परंपरा में बताया जाता है कि गुरु गोरखनाथ माता ज्वाला के परम भक्त थे। एक कथा के अनुसार उन्होंने माता से भोजन की इच्छा जताई और खिचड़ी के लिए भिक्षा लेने चले गए।
मान्यता है कि माता ने उनके लौटने तक अग्नि जलाए रखी। इसी कथा को ज्वाला और गोरख डिब्बी से जोड़कर देखा जाता है।
यह कहानी श्रद्धालुओं के बीच लंबे समय से प्रचलित है, लेकिन इसे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना के बजाय धार्मिक कथा के रूप में ही प्रस्तुत करना चाहिए।
अकबर और ज्वाला देवी मंदिर की कहानी
ज्वाला देवी मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित ऐतिहासिक कथाओं में मुगल सम्राट अकबर का प्रसंग भी शामिल है।
मंदिर की परंपरा के अनुसार अकबर को जब यहां बिना किसी दिखाई देने वाले ईंधन के जलती ज्वालाओं के बारे में जानकारी मिली तो वह इस घटना को देखने के लिए उत्सुक हुआ। कथा में कहा जाता है कि ज्वाला को बुझाने के लिए पानी का इस्तेमाल किया गया। यहां तक कि पानी की धारा पहुंचाने की कोशिश भी की गई।
लेकिन मान्यता के अनुसार ज्वाला बुझी नहीं।
इसके बाद ज्वालाओं को लोहे के ढक्कन या बर्तनों से ढकने का प्रयास किए जाने की कहानी भी मिलती है। मंदिर से जुड़े विवरणों में यह कथा दर्ज है कि इन प्रयासों के बावजूद ज्वाला को पूरी तरह बुझाया नहीं जा सका।
हालांकि इस पूरे प्रसंग को लिखते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अकबर से जुड़ी कहानी मुख्य रूप से मंदिर की ऐतिहासिक-लोक परंपरा में मिलती है। इसके हर विवरण की स्वतंत्र समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेजों से पुष्टि नहीं होती।
सोने के छत्र वाली कहानी कितनी सच?
अकबर से जुड़ी कहानी का अगला हिस्सा और भी दिलचस्प है। मान्यता के अनुसार जब ज्वाला को बुझाने का प्रयास सफल नहीं हुआ तो अकबर ने देवी के प्रति सम्मान जताते हुए मंदिर में सोने का छत्र चढ़ाया।
कथा में कहा जाता है कि यह छत्र बाद में किसी दूसरी धातु जैसे पदार्थ में बदल गया। मंदिर से जुड़े आधिकारिक विवरणों में भी इस कथा का उल्लेख मिलता है।
लेकिन इस घटना को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध चमत्कार कहना उचित नहीं होगा। उपलब्ध जानकारी इसे धार्मिक परंपरा और मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक कथा के रूप में ही सामने रखती है।
इतिहास में भी मिलता है मंदिर का उल्लेख
ज्वालामुखी मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक महत्व भी रहा है। सरकारी मंदिर विवरणों में मध्यकालीन स्रोतों और कांगड़ा क्षेत्र के इतिहास में ज्वालामुखी का उल्लेख मिलता है।
मंदिर से जुड़ी जानकारी के अनुसार बाद के दौर में मुगल शासकों और कांगड़ा क्षेत्र के राजाओं के समय भी यह स्थान महत्वपूर्ण रहा। महाराजा रणजीत सिंह के समय भी ज्वालामुखी का विशेष महत्व था।
इससे यह स्पष्ट होता है कि ज्वाला देवी मंदिर लंबे समय से हिमाचल प्रदेश के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
आस्था और विज्ञान दोनों को समझना जरूरी
ज्वाला देवी मंदिर की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें धार्मिक आस्था, लोककथाएं, इतिहास और भू-विज्ञान एक साथ दिखाई देते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए नौ ज्वालाएं मां ज्वाला का स्वरूप हैं। पौराणिक परंपरा इन्हें माता सती से जोड़ती है। गोरख डिब्बी को गुरु गोरखनाथ की कथा से जोड़ा जाता है। वहीं वैज्ञानिक रिकॉर्ड क्षेत्र में प्राकृतिक गैस के रिसाव की मौजूदगी की ओर इशारा करता है।
इसलिए ज्वाला देवी मंदिर को लेकर सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि यहां की धार्मिक मान्यताओं का अपना आध्यात्मिक महत्व है, जबकि ज्वाला के प्राकृतिक स्वरूप को समझने के लिए भूवैज्ञानिक तथ्यों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
AIN NEWS 1 के पाठकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि ज्वाला देवी मंदिर से जुड़ी हर कहानी को एक ही श्रेणी में रखना सही नहीं है। सती की जीभ गिरने और गोरखनाथ की कथा धार्मिक मान्यताएं हैं, अकबर और सोने के छत्र वाली कहानी मंदिर की ऐतिहासिक-लोक परंपरा का हिस्सा है, जबकि प्राकृतिक गैस का रिसाव वैज्ञानिक और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तथ्य है।
इसी अंतर को समझकर ज्वाला देवी मंदिर की कहानी को देखा जाए तो यह स्थान आस्था, इतिहास और प्रकृति—तीनों का अनोखा संगम नजर आता है।
Jwala Devi Temple in Kangra, Himachal Pradesh, is one of the most famous Shakti Peeth temples in India and is renowned for its nine natural flames. The Jwala Ji Temple is associated with the belief that Goddess Sati’s tongue fell here. The temple also features the mysterious Gorakh Dibbi, while the traditional story of Mughal emperor Akbar is closely linked with the shrine. Government records indicate the presence of natural gas, including methane, in the Jwalamukhi region, providing an important scientific perspective on the natural flames. This unique combination of Hindu faith, mythology, history, natural gas and ancient temple traditions makes Jwala Devi Temple a major religious and cultural destination in Himachal Pradesh.



















