AIN NEWS 1: दुनिया तेजी से तकनीकी विकास की ओर बढ़ रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जहां चिकित्सा, शिक्षा, कारोबार और विज्ञान के क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा हुई हैं, वहीं इसके गलत इस्तेमाल को लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। अब दुनिया की प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट से जुड़ी एक नई रिपोर्ट ने मानवता के भविष्य को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, परमाणु युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल ऐसे खतरे हैं, जिनमें इस सदी के अंत तक मानव अस्तित्व को समाप्त करने की क्षमता हो सकती है।
10 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित The Lancet Commission on 21st Century Global Threats to Health ने वर्ष 2025 से 2100 के बीच मानव स्वास्थ्य और अस्तित्व को प्रभावित करने वाले 17 बड़े वैश्विक खतरों की पहचान की है। इस आकलन में तकनीक, युद्ध, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, संक्रामक बीमारियों और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से जुड़े जोखिमों का विश्लेषण किया गया है। हालांकि, विशेषज्ञों ने यह नहीं कहा है कि वर्ष 2100 तक इंसानों का विलुप्त होना निश्चित है। यह रिपोर्ट संभावित खतरों को समय रहते रोकने की जरूरत पर जोर देती है।
AI का गलत इस्तेमाल कैसे बन सकता है मानवता के लिए खतरा?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज कई कामों को पहले से अधिक तेज और आसान बना रही है। लेकिन जब इस तकनीक का इस्तेमाल अपराध, हिंसा या विनाशकारी गतिविधियों के लिए किया जाता है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
रिपोर्ट में AI के दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल को मानव अस्तित्व के लिए संभावित खतरे के रूप में पहचाना गया है। विशेषज्ञों की चिंता केवल इस बात को लेकर नहीं है कि भविष्य में मशीनें कितनी शक्तिशाली होंगी, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि इंसान इस तकनीक का इस्तेमाल किस उद्देश्य से करेंगे।
AI की मदद से जैविक हथियारों के विकास की प्रक्रिया आसान या तेज होने, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर साइबर हमलों और बड़े स्तर पर भ्रामक सूचनाएं फैलाने जैसे जोखिमों पर चिंता जताई गई है। यदि AI से जुड़े सिस्टम बिजली, संचार, स्वास्थ्य सेवाओं या अन्य जरूरी व्यवस्थाओं में गंभीर गड़बड़ी पैदा करते हैं, तो उसका असर बड़ी आबादी पर पड़ सकता है।
एक अन्य चिंता ऐसे स्वायत्त AI सिस्टम को लेकर है, जिनके निर्णयों पर इंसानों का नियंत्रण कमजोर पड़ जाए। हालांकि, इस तरह के संभावित संकटों की वास्तविक संभावना और उनके परिणामों को लेकर वैज्ञानिक अनिश्चितता बनी हुई है। इसलिए इसे निश्चित भविष्यवाणी के बजाय गंभीर जोखिम की चेतावनी के रूप में समझना चाहिए।
परमाणु युद्ध का खतरा केवल दो देशों तक सीमित नहीं
परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होने पर नुकसान केवल उन देशों तक सीमित नहीं रहेगा, जिनके बीच युद्ध हो रहा होगा। बड़े स्तर पर परमाणु संघर्ष का प्रभाव वैश्विक पर्यावरण, कृषि, खाद्य आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
परमाणु विस्फोटों से शहरों में भारी तबाही और बड़े पैमाने पर जनहानि हो सकती है। आग से निकलने वाला धुआं और कालिख वातावरण में पहुंचकर सूर्य के प्रकाश को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में तापमान, वर्षा और कृषि उत्पादन में बदलाव आने की आशंका रहती है।
यदि दुनिया के बड़े हिस्से में फसल उत्पादन घटता है, तो खाद्यान्न की भारी कमी पैदा हो सकती है। इससे उन देशों में भी भुखमरी का संकट बढ़ सकता है, जो सीधे युद्ध में शामिल नहीं हैं।
इसी वजह से परमाणु संघर्ष को केवल सैन्य या राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और वैश्विक अस्तित्व से जुड़ा जोखिम माना जाता है। रिपोर्ट का संदेश है कि ऐसे संकट की संभावना कम होने के बावजूद उसके संभावित परिणाम इतने गंभीर हैं कि उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट में बताए गए 17 बड़े वैश्विक खतरे कौन से हैं?
द लैंसेट आयोग ने सैकड़ों संभावित खतरों का आकलन करने के बाद 17 प्रमुख जोखिमों को अपनी सूची में शामिल किया है। इनमें दो खतरे ऐसे हैं, जिनमें मानवता के विलुप्त होने की क्षमता हो सकती है। बाकी खतरे मुख्य रूप से बड़े पैमाने पर बीमारी, समय से पहले मौत और स्वस्थ जीवन के वर्षों के नुकसान से संबंधित हैं।
रिपोर्ट में शामिल प्रमुख खतरे इस प्रकार हैं:
1. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल।
2. परमाणु संघर्ष।
3. वायु प्रदूषण।
4. एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी रोगाणुओं का दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बनना।
5. बच्चों में कुपोषण।
6. जलवायु परिवर्तन।
7. पारंपरिक युद्ध और सशस्त्र संघर्ष।
8. स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय विकास सहायता में गिरावट।
9. अत्यधिक शराब का सेवन।
10. उच्च रक्तचाप।
11. आय में असमानता।
12. शिक्षा का निम्न स्तर।
13. प्राकृतिक रूप से फैलने वाली महामारियां।
14. मोटापा।
15. खराब मानसिक स्वास्थ्य।
16. धूम्रपान।
17. अस्वस्थ उम्र बढ़ना।
इन खतरों की गंभीरता अलग-अलग है। कुछ का असर धीरे-धीरे लाखों लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है, जबकि कुछ बेहद कम समय में वैश्विक स्तर पर तबाही मचा सकते हैं। कई बार ये खतरे एक-दूसरे को और गंभीर बना देते हैं।
जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण भी बड़ी चुनौती
जलवायु परिवर्तन आज दुनिया के सामने मौजूद सबसे गंभीर स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी चुनौतियों में से एक है। तापमान बढ़ने से भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़ और कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इन परिस्थितियों का सीधा प्रभाव लोगों की सेहत, रोजगार और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।
वायु प्रदूषण भी बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करता है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से सांस और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है।
इसी तरह, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की समस्या भी चिंता का विषय है। जब बैक्टीरिया और अन्य रोगाणु दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, तो सामान्य संक्रमणों का इलाज भी कठिन हो सकता है। इससे अस्पतालों पर दबाव बढ़ता है और संक्रमण से होने वाली मौतों का जोखिम बढ़ सकता है।
रिपोर्ट इन समस्याओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक व्यापक वैश्विक चुनौती के रूप में समझने पर जोर देती है।
भारत जैसे देशों पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत में बड़ी आबादी, शहरीकरण, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुंच जैसी चुनौतियां पहले से मौजूद हैं। ऐसे में वैश्विक स्तर पर बढ़ने वाले खतरे देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।
भीषण गर्मी और अनियमित बारिश से किसानों की आय तथा खाद्य उत्पादन प्रभावित हो सकता है। प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ सकता है। यदि किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के कारण ईंधन, खाद्यान्न या जरूरी दवाओं की आपूर्ति बाधित होती है, तो उसका असर भारत सहित कई देशों पर पड़ सकता है।
AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ तकनीकी सुरक्षा भी महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकारों और संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि संवेदनशील प्रणालियों में AI का इस्तेमाल सुरक्षित तरीके से हो और तकनीक का दुरुपयोग रोकने के लिए प्रभावी निगरानी व्यवस्था मौजूद रहे।
मानवता को बचाने के लिए क्या कदम जरूरी हैं?
द लैंसेट आयोग का उद्देश्य केवल खतरों की सूची जारी करना नहीं, बल्कि सरकारों, उद्योगों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को समय रहते कार्रवाई के लिए प्रेरित करना भी है।
सबसे पहले, स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को मजबूत बनाने की जरूरत है, ताकि महामारियों और अन्य बड़े संकटों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। इसके साथ ही वैज्ञानिक अनुसंधान, सुरक्षित तकनीक और नई चिकित्सा सुविधाओं में निवेश बढ़ाना जरूरी है।
AI के मामले में तकनीकी कंपनियों और सरकारों को जोखिमों का आकलन करना चाहिए। खतरनाक इस्तेमाल को रोकने, महत्वपूर्ण प्रणालियों की सुरक्षा मजबूत करने और जिम्मेदार तकनीकी विकास को बढ़ावा देने के लिए स्पष्ट नियमों की जरूरत है।
परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को रोकने के लिए कूटनीतिक बातचीत, हथियार नियंत्रण और देशों के बीच विश्वास कायम करना भी महत्वपूर्ण है। वहीं, जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण और संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है।
आयोग ने उभरते खतरों की नियमित निगरानी और समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर भी जोर दिया है।
क्या 2100 तक इंसानों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा?
इस रिपोर्ट को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें मानवता के विलुप्त होने को निश्चित घटना नहीं बताया गया है। रिपोर्ट ने ऐसे खतरों की पहचान की है, जिनके गंभीर परिणाम हो सकते हैं, लेकिन उनका भविष्य इस बात पर भी निर्भर करेगा कि दुनिया के देश आज क्या कदम उठाते हैं।
परमाणु युद्ध और AI के दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल का जोखिम गंभीर है, लेकिन इसे कम करने के लिए नीतियां, सुरक्षा उपाय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग विकसित किए जा सकते हैं। इसी तरह, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को प्रभावी कदमों से कम किया जा सकता है।
द लैंसेट की रिपोर्ट मानवता के निश्चित अंत की घोषणा नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है। इसका स्पष्ट संदेश है कि तकनीकी विकास के साथ सुरक्षा, वैज्ञानिक जिम्मेदारी और वैश्विक सहयोग को भी प्राथमिकता देनी होगी। समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाएं, तो इन खतरों को कम करना और आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक सुरक्षित भविष्य तैयार करना संभव है।
स्रोत: The Lancet Commission on 21st Century Global Threats to Health, 10 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अध्ययन और उससे संबंधित रिपोर्टिंग।
The Lancet Commission on 21st Century Global Threats to Health, published on October 10, 2026, identifies 17 major global threats that could affect human health and survival by 2100. The report highlights the malicious use of artificial intelligence (AI) and nuclear conflict as potential existential risks, alongside climate change, air pollution, antimicrobial resistance, natural pandemics, childhood malnutrition and global health inequalities. It calls for stronger health systems, responsible AI governance, nuclear risk reduction, scientific innovation and international cooperation to prevent catastrophic outcomes and protect future generations.



















