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“हिंदी भाषी राज्य पिछड़े हैं, महाराष्ट्र में हिंदी नहीं चलने देंगे” — राज ठाकरे का विवादित बयान!

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Raj Thackeray Says No Hindi in Maharashtra, Calls Hindi-Speaking States Backward

राज ठाकरे का विवादित बयान: “हिंदी भाषी राज्य पिछड़े हैं, महाराष्ट्र में हिंदी नहीं चलने देंगे”

AIN NEWS 1 मुंबई: महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने एक बार फिर विवादित बयान देकर सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हिंदी भाषी राज्य पिछड़े हैं और महाराष्ट्र में हिंदी को स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह बयान न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक स्तर पर भी बहस का विषय बन गया है।

🔹 क्या कहा राज ठाकरे ने?

राज ठाकरे ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा,

 “हिंदी भाषी राज्य आज भी पिछड़े हुए हैं। उनके यहां विकास की गति धीमी है और सोच सीमित है। हम ऐसा महाराष्ट्र नहीं बनाना चाहते। इसलिए हमारी भाषा, हमारी संस्कृति सबसे ऊपर होनी चाहिए। हम महाराष्ट्र में हिंदी नहीं चलने देंगे।”

🔹 भाषा को लेकर क्यों भड़के ठाकरे?

राज ठाकरे का यह बयान ऐसे समय आया है जब महाराष्ट्र के कई इलाकों में गैर-मराठी लोगों की संख्या बढ़ रही है, खासकर उत्तर भारत से आए प्रवासियों की। ठाकरे पहले भी मुंबई और महाराष्ट्र में मराठी भाषा और संस्कृति को लेकर मुखर रहे हैं। उनका मानना है कि हिंदी का प्रसार मराठी पहचान को कमजोर कर रहा है।

🔹 राजनीतिक नफा या क्षेत्रीय भावनाएं?

विशेषज्ञों का मानना है कि ठाकरे का यह बयान आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता का मुद्दा हमेशा से वोट बैंक का बड़ा जरिया रहा है। इस तरह के बयानों से मनसे अपने कोर मराठी समर्थक वोटर को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रही है।

🔹 विरोध और प्रतिक्रियाएं

राज ठाकरे के बयान पर विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है।

कांग्रेस ने कहा कि देश की एकता भाषा से नहीं, भावनाओं से बनती है।

बीजेपी नेताओं ने इसे विभाजनकारी सोच करार दिया।

सपा और राजद जैसे उत्तर भारत के क्षेत्रीय दलों ने इसे हिंदी भाषी लोगों का अपमान बताया।

🔹 संविधान क्या कहता है भाषा पर?

भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं मान्यता प्राप्त हैं। हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है, जबकि अंग्रेजी सह-राजभाषा है। लेकिन किसी भी राज्य को अपनी क्षेत्रीय भाषा को बढ़ावा देने से रोका नहीं गया है। महाराष्ट्र में मराठी को प्राथमिक भाषा माना जाता है और राज्य सरकार इसे हर स्तर पर बढ़ावा देती रही है।

🔹 समाज का क्या पक्ष है?

मुंबई में रहने वाले कई प्रवासी उत्तर भारतीयों ने इस बयान को “भेदभावपूर्ण” बताया। उनका कहना है कि मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी है और यहां सभी भाषाओं और संस्कृतियों को समान सम्मान मिलना चाहिए।

वहीं, कुछ स्थानीय मराठी लोगों का मानना है कि भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए कठोर रुख अपनाना ज़रूरी है।

🔹 इतिहास में भी रहा है मनसे का ऐसा रुख

यह पहला मौका नहीं है जब ठाकरे ने इस तरह का बयान दिया है। इससे पहले भी वे उत्तर भारतीयों के खिलाफ बयानों और आंदोलनों के लिए जाने जाते रहे हैं। रेलवे परीक्षा में उत्तर भारतीयों की अधिक भागीदारी, ऑटो रिक्शा-टैक्सी परमिट को लेकर मराठी बनाम बाहरी मुद्दा और मराठी बोर्डिंग स्कूल का समर्थन — ये सभी मनसे की पहचान का हिस्सा रहे हैं

राज ठाकरे का बयान केवल एक भाषण नहीं बल्कि एक बार फिर भाषा और क्षेत्रीयता की बहस को हवा देने वाला मुद्दा बन गया है। एक तरफ जहां यह मराठी अस्मिता की रक्षा का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर हिंदी भाषियों को अलग-थलग करने का आरोप भी झेल रहा है। भारत जैसे बहुभाषी देश में इस तरह के बयानों से समाज में विभाजन की रेखाएं गहरी हो सकती हैं।

Raj Thackeray, the chief of Maharashtra Navnirman Sena (MNS), stirred controversy by declaring that Hindi-speaking states are backward and that Hindi will not be allowed to thrive in Maharashtra. His anti-Hindi statement has sparked a wave of political backlash and reignited debates over linguistic identity and regional pride in India. This controversy around language politics in Maharashtra once again highlights the ongoing friction between regional identity and national language integration.

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