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संभल में चकबंदी विभाग का बड़ा घोटाला: फर्जी नामों पर बांटी गई करोड़ों की सरकारी जमीन, चार कर्मचारी गिरफ्तार!

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AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश के संभल जिले में सरकारी जमीन से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसमें चकबंदी विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने करोड़ों रुपये की जमीन को फर्जी नामों पर आवंटित कर दिया। इस जमीन की फाइलें भी गायब कर दी गईं। मामले में चार विभागीय कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि एक अन्य कर्मचारी फरार है।

यह घोटाला संभल जिले के गुन्नौर थाना क्षेत्र के सुखैला गांव में हुआ। यह गांव सरकारी रिकॉर्ड में “निर्जन” यानी बिना आबादी वाला घोषित था, जिसका फायदा उठाकर चकबंदी विभाग के कर्मचारियों ने पूरे षड्यंत्र को अंजाम दिया।

कैसे हुआ घोटाला?

साल 2018 में इस घोटाले की पहली जानकारी मिली थी, जब लेखपाल कुलदीप सिंह ने शिकायत दर्ज करवाई। जांच में पता चला कि चकबंदी विभाग के कर्मचारियों ने 58 फर्जी नामों पर कुल 326 बीघा सरकारी जमीन आवंटित कर दी। हैरानी की बात यह है कि इन 58 लोगों का कोई वास्तविक अस्तित्व ही नहीं है। उनके नाम, पते और दस्तावेज सब फर्जी पाए गए हैं।

इस योजना का उद्देश्य यह था कि फर्जी नामों पर जमीन को आवंटित किया जाए, फिर बाद में उसे बेचकर या अपने नाम करा कर हड़प लिया जाए। इससे सरकारी जमीन पर निजी कब्जा जमाने का रास्ता साफ हो जाता।

अब तक की कार्रवाई

संभल के पुलिस अधीक्षक (एसपी) कृष्ण कुमार ने बताया कि इस घोटाले की जांच के दौरान अब तक चकबंदी विभाग के चार कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार हुए लोगों में काली चरण, राम अवतार, मोर ध्वज और राम निवास शामिल हैं। एक और आरोपी कर्मचारी सुरेंद्र कुमार अभी फरार है।

एसपी के अनुसार, इस घोटाले में शामिल चकबंदी विभाग के अन्य चार कर्मचारियों की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। कुल मिलाकर 67 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है, जिनमें से 58 वे लोग हैं जिनके नाम पर जमीन आवंटित की गई थी और बाकी 9 विभागीय कर्मचारी हैं।

जमीन की हेराफेरी कैसे हुई?

चकबंदी विभाग की यह योजना बेहद सोची-समझी थी। पहले ऐसे लोगों के नाम चिन्हित किए गए जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। फिर उनके नाम पर जमीन आवंटित की गई और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर इसे वैध दिखाने की कोशिश की गई।

जब जमीन की फाइलें गायब कर दी गईं, तो कोई सबूत भी नहीं बचा। लेकिन लेखपाल की सतर्कता और बाद की जांच में पूरा मामला उजागर हो गया।

सात साल बाद हुआ खुलासा

हालांकि इस घोटाले की शुरुआत 2018 में हुई थी, लेकिन इसकी परतें अब खुलनी शुरू हुई हैं। सात साल की लंबी जांच के बाद अब जाकर स्पष्ट रूप से सामने आया है कि यह पूरा मामला विभागीय मिलीभगत का है।

पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के बाद इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान की।

अभी भी जारी है जांच

एसपी कृष्ण कुमार ने बताया कि मामले की जांच अभी भी जारी है। फरार कर्मचारी सुरेंद्र कुमार की तलाश की जा रही है। इसके अलावा यह भी जांच की जा रही है कि कहीं और भी इसी तरह की जमीनों की हेराफेरी तो नहीं की गई।

पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि इस घोटाले में किसी बाहरी व्यक्ति या दलाल की भूमिका रही है या नहीं। साथ ही, यह जानने की भी कोशिश की जा रही है कि क्या यह एक अकेला मामला था या ऐसी योजनाएं अन्य गांवों में भी लागू की गई थीं।

जनता में रोष और सवाल

इस घोटाले के सामने आने के बाद जनता में गहरा आक्रोश है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर एक निर्जन गांव की इतनी जमीन फर्जी तरीके से बेची जा सकती है, तो पूरे राज्य में कितनी सरकारी जमीनें इस तरह हड़पी जा सकती हैं?

यह मामला उत्तर प्रदेश के सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही को उजागर करता है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस मामले में कितनी सख्त कार्रवाई करती है और कितनी पारदर्शिता से अन्य ऐसे मामलों की जांच कराती है।

A major land scam in Sambhal, Uttar Pradesh has exposed massive corruption within the Chakbandi department, where officials illegally allotted 326 bighas of government land to 58 fake beneficiaries using forged documents. The Sambhal police have arrested four departmental employees while one is absconding. This fraudulent land allotment case reveals deep-rooted corruption and misuse of government property. As the investigation continues, the Uttar Pradesh land scam has raised serious questions about administrative integrity and government land protection.

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