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UGC कानून पर बवाल: 10% EWS आरक्षण पर चुप्पी थी, अब विरोध क्यों? बोले योगी सरकार के मंत्री संजय निषाद!

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AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जुड़े नए कानून और नियमों को लेकर चल रहे विरोध के बीच योगी सरकार के मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद का बयान सामने आया है। उन्होंने इस पूरे विवाद पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब केंद्र सरकार ने जनरल कैटेगरी को 10 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) का आरक्षण दिया था, तब देश में कहीं भी इस तरह का बड़ा विरोध देखने को नहीं मिला, लेकिन अब जब सामाजिक भेदभाव को रोकने के लिए कानून लाया गया है, तो हंगामा क्यों मचाया जा रहा है।

संजय निषाद का यह बयान ऐसे समय आया है, जब देश के कई हिस्सों में UGC के नए नियमों को लेकर शिक्षकों, छात्रों और कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा आपत्ति जताई जा रही है। खासतौर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि नए नियम शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।

( देखें विडियो)“मेरी औकात कहां आपको गिरफ्तार करने की…” धरने पर बैठे सांसद के पैर छूते दिखे दारोगा, गाजीपुर का वीडियो वायरल!

🔹 EWS आरक्षण का उदाहरण देकर उठाए सवाल

संजय निषाद ने मीडिया से बातचीत में कहा कि संविधान के तहत जब जनरल कैटेगरी के लिए 10 प्रतिशत EWS आरक्षण लागू किया गया, तब यह भी एक बड़ा फैसला था। यह फैसला संसद से पारित हुआ और पूरे देश में लागू किया गया, लेकिन उस समय न तो सड़कों पर आंदोलन हुए और न ही इसे समाज तोड़ने वाला बताया गया।

उन्होंने सवाल किया,

“अगर उस समय आरक्षण को लेकर किसी ने देश को बांटने की बात नहीं की, तो आज जब सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के उद्देश्य से कानून बनाया जा रहा है, तब विरोध क्यों हो रहा है?”

🔹 “कानून पहले लागू हो, खामियां बाद में सुधारी जा सकती हैं”

UGC कानून को लेकर उठ रही आपत्तियों पर संजय निषाद ने स्पष्ट कहा कि संसद से बना कोई भी कानून पहले लागू होना चाहिए। अगर उसके लागू होने के बाद उसमें कोई कमी या व्यावहारिक समस्या सामने आती है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत उसमें संशोधन किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि हर कानून पर पहले दिन से ही विरोध करना सही नहीं है।

“कानून किताबों में बंद रह जाए, यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। उसे ज़मीन पर लागू होना चाहिए, तभी उसकी अच्छाइयों और कमियों का सही आकलन हो सकता है।”

🔹 UGC नियमों को लेकर क्यों हो रहा है विरोध?

UGC के नए नियमों को लेकर कुछ वर्गों का कहना है कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, नियुक्ति प्रक्रिया और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। वहीं सरकार और समर्थक वर्ग का तर्क है कि यह बदलाव शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए किए गए हैं।

संजय निषाद ने कहा कि सरकार का उद्देश्य किसी भी वर्ग के अधिकारों को छीनना नहीं, बल्कि सभी को समान अवसर देना है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सामाजिक न्याय के बिना न तो शिक्षा व्यवस्था मजबूत हो सकती है और न ही देश आगे बढ़ सकता है।

🔹 “हर सुधार का विरोध करना देशहित में नहीं”

मंत्री संजय निषाद ने कहा कि भारत जैसे बड़े और विविधता वाले देश में सुधारों का विरोध स्वाभाविक है, लेकिन हर बदलाव को साजिश के नजरिए से देखना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार को काम करने का अवसर दिया जाना चाहिए।

उनके मुताबिक,

“जो लोग आज UGC कानून का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि वे किस सामाजिक भेदभाव को बनाए रखना चाहते हैं। अगर कोई नियम समाज को बराबरी की ओर ले जाता है, तो उस पर खुले मन से चर्चा होनी चाहिए, न कि केवल विरोध।”

🔹 राजनीतिक और सामाजिक संदेश

संजय निषाद का यह बयान सिर्फ UGC कानून तक सीमित नहीं माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बयान सामाजिक न्याय, आरक्षण और समानता जैसे मुद्दों पर एक बड़ा संदेश देता है। खासतौर पर तब, जब आने वाले समय में शिक्षा और आरक्षण से जुड़े फैसले राजनीति के केंद्र में रहने वाले हैं।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सरकार सभी वर्गों की बात सुनने को तैयार है, लेकिन निर्णय संसद और संविधान के दायरे में ही लिए जाएंगे।

UGC कानून और EWS आरक्षण की तुलना करते हुए संजय निषाद ने एक अहम सवाल खड़ा किया है—क्या विरोध सिर्फ चयनित मुद्दों पर ही होना चाहिए, या हर सामाजिक सुधार को उसी नजर से देखा जाना चाहिए? उनका कहना है कि जब जनरल कैटेगरी को 10% EWS आरक्षण मिला, तब इसे स्वीकार किया गया, तो अब सामाजिक भेदभाव खत्म करने वाले कानूनों पर इतना शोर क्यों?

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि UGC नियमों को लेकर सरकार और विरोध करने वाले पक्षों के बीच किस तरह की सहमति या टकराव देखने को मिलता है।

The statement by Uttar Pradesh minister Sanjay Nishad on the UGC law has added a new dimension to the ongoing debate over education reforms in India. By comparing the current protests with the silent acceptance of the 10% EWS reservation for the General Category, Nishad questioned selective opposition to social justice laws. The controversy around UGC rules, EWS reservation, and general category policies highlights the broader discussion on equality, reservation, and higher education governance in India.

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