AIN NEWS 1 | उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर सियासी खींचतान तेज हो गई है। बीजेपी अपने पुराने और मजबूत माने जाने वाले ब्राह्मण समर्थन को बनाए रखने की कोशिश में है तो समाजवादी पार्टी उसी वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए लगातार ब्राह्मण नेताओं को आगे कर रही है।
अयोध्या से लेकर लखनऊ और कानपुर तक सपा के कार्यक्रमों में ब्राह्मण चेहरों की मौजूदगी बढ़ी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने तो अपने चर्चित PDA फॉर्मूले के ‘P’ को ‘पंडित’ से जोड़कर नया राजनीतिक संदेश देने की कोशिश भी की है।
वहीं बीजेपी की ओर से डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक समेत कई ब्राह्मण चेहरे लगातार सक्रिय हैं।
ऐसे में सवाल है कि उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में करीब 10% हिस्सेदारी रखने वाला ब्राह्मण समुदाय चुनावी राजनीति में इतना महत्वपूर्ण क्यों है? क्या अखिलेश यादव बीजेपी के मजबूत ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं? और क्या 2007 में मायावती का सफल रहा ‘ब्राह्मण-दलित’ सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला 2027 में किसी नए रूप में लौट सकता है?
आइए पूरा चुनावी गणित समझते हैं।
UP में ब्राह्मण कितने और राजनीति में इतने महत्वपूर्ण क्यों?
उत्तर प्रदेश में जातियों की आबादी को लेकर हालिया आधिकारिक जातिगत जनगणना उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक आकलनों में राज्य में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी करीब 9 से 10 प्रतिशत मानी जाती है।
सिर्फ आबादी के प्रतिशत से इस समुदाय की राजनीतिक ताकत का पूरा अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
ब्राह्मण मतदाता राज्य की किसी एक भौगोलिक पट्टी तक सीमित नहीं हैं। पूर्वांचल और अवध से लेकर मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक कई विधानसभा क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी है।
राजनीतिक आकलनों में 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाताओं को प्रभावशाली माना जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि इन सीटों पर अकेले ब्राह्मण मतदाता नतीजा तय करते हैं, बल्कि करीबी मुकाबले में उनका वोट निर्णायक साबित हो सकता है।
बलरामपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, वाराणसी, चंदौली, कानपुर और प्रयागराज जैसे जिलों के कई क्षेत्रों में ब्राह्मण मतदाताओं की महत्वपूर्ण मौजूदगी मानी जाती है।
403 सीटें और 52 ब्राह्मण विधायक
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद सदन की सामाजिक संरचना भी ब्राह्मण समुदाय की राजनीतिक अहमियत दिखाती है।
403 सदस्यीय विधानसभा में करीब 52 ब्राह्मण विधायक चुनकर आए थे।
पार्टी के लिहाज से देखें तो इनमें सबसे बड़ा हिस्सा बीजेपी के पास था।
- बीजेपी – 46
- समाजवादी पार्टी – 5
- कांग्रेस – 1
इसी चुनाव में करीब 49 ठाकुर विधायक भी चुने गए थे, जिनमें से 43 बीजेपी से थे।
यानी 2022 में उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख सवर्ण जातियों-ब्राह्मण और ठाकुर-के निर्वाचित विधायकों में बीजेपी का दबदबा स्पष्ट दिखाई दिया।
यही कारण है कि समाजवादी पार्टी अगर 2027 में बीजेपी को चुनौती देना चाहती है तो उसके लिए बीजेपी के इस मजबूत सामाजिक आधार में सेंध लगाना महत्वपूर्ण हो जाता है।
BJP के साथ ब्राह्मण वोट कब और कैसे मजबूत हुआ?
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता हमेशा बीजेपी के साथ ही रहे हों, ऐसा नहीं है।
कांग्रेस के प्रभुत्व वाले दौर में ब्राह्मण उसके सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आधारों में शामिल थे। बाद में राम मंदिर आंदोलन और बीजेपी के विस्तार के साथ इस समुदाय का बड़ा हिस्सा बीजेपी की ओर गया।
2007 में इस समीकरण में बड़ा बदलाव देखने को मिला।
मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मणों को अपनी सोशल इंजीनियरिंग का अहम हिस्सा बनाया और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।
लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी के उभार के साथ ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा फिर बीजेपी के साथ मजबूती से जुड़ गया।
इसके बाद 2017 और 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी को इस समुदाय का मजबूत समर्थन मिला।
2022 में BJP को मिला था कितना ब्राह्मण वोट?
लोकनीति-CSDS के 2022 विधानसभा चुनाव के पोस्ट-पोल सर्वे के मुताबिक बीजेपी और उसके सहयोगियों को ब्राह्मण मतदाताओं का बहुत बड़ा हिस्सा मिला था।
सर्वे के अनुसार करीब 89% ब्राह्मण मतदाताओं ने BJP+ को वोट दिया, जबकि सपा गठबंधन को इस समुदाय का करीब 6% समर्थन मिला।
इसी तरह ठाकुर मतदाताओं के बीच भी बीजेपी गठबंधन का समर्थन बेहद मजबूत था।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत आधार मुस्लिम और यादव मतदाता रहे।
सर्वे के अनुसार सपा गठबंधन को करीब 79% मुस्लिम और 83% यादव वोट मिले थे।
यही 89% बनाम 6% का अंतर अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा अवसर दोनों है।
सपा को ब्राह्मण वोट का बहुमत हासिल करना जरूरी नहीं है। अगर वह बीजेपी के इस मजबूत समर्थन में सीमित लेकिन महत्वपूर्ण सेंध भी लगाती है तो करीबी मुकाबले वाली कई सीटों का गणित प्रभावित हो सकता है।
2007: जब मायावती ने बदल दिया था पूरा चुनावी गणित
ब्राह्मण वोट की ताकत समझने के लिए 2007 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सबसे चर्चित उदाहरणों में से एक है।
मायावती ने अपने परंपरागत दलित आधार के साथ ब्राह्मणों और अन्य सामाजिक समूहों को जोड़ने की रणनीति अपनाई।
तब बसपा के मंचों से नारे सुनाई दिए-
‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है’
और
‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जाएगा।’
बसपा ने उस चुनाव में बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे। पार्टी ने करीब 30% वोट हासिल करते हुए 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।
यूपी की राजनीति में इसे मायावती की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के सबसे सफल प्रयोग के रूप में देखा जाता है।
हालांकि यह जीत सिर्फ ब्राह्मण वोटों की वजह से नहीं थी। इसमें बसपा के दलित कोर वोट के साथ ब्राह्मण, मुस्लिम और दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़ने की रणनीति ने भूमिका निभाई थी।
अब वही प्रयोग करना चाहते हैं अखिलेश?
2027 से पहले समाजवादी पार्टी की रणनीति में भी कुछ इसी तरह के सामाजिक विस्तार की झलक दिखाई देती है।
अखिलेश यादव पिछले कुछ वर्षों से PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक को अपनी राजनीति का केंद्रीय फॉर्मूला बताते रहे हैं।
लेकिन 2026 में ब्राह्मणों को लेकर सपा की सक्रियता बढ़ी है।
अखिलेश ने अब PDA के ‘P’ को ‘पंडित’ से जोड़कर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
उनका बयान था-
“लोग PDA की नई-नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं, लेकिन वे भूल गए हैं कि PDA में ‘P’ तो ‘पंडित’ का ही शॉर्ट फॉर्म है। जितनी पीड़ा बढ़ाओगे, PDA उतना ही मजबूत होगा।”
इस बयान का राजनीतिक संदेश साफ है-सपा अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार और PDA की पिछड़ा-दलित राजनीति से बाहर निकलकर ब्राह्मण मतदाताओं के बीच भी जगह बनाने की कोशिश कर रही है।
2026 में कैसे आगे बढ़ी सपा की ‘ब्राह्मण रणनीति’?
2026 में सपा ने कई ऐसे कदम उठाए, जिन्हें ब्राह्मण मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
17 जून 2026: लखनऊ स्थित सपा कार्यालय में ब्राह्मण नेताओं, विधायकों, पूर्व विधायकों, सांसदों और पूर्व सांसदों की बैठक हुई। अखिलेश यादव ने खुद इसमें हिस्सा लिया और बलिया सांसद सनातन पांडे को अभियान में अहम जिम्मेदारी दी गई।
इसमें माता प्रसाद पांडे, अमिताभ बाजपेई, विनय तिवारी समेत कई ब्राह्मण नेताओं की मौजूदगी रही।
6 जुलाई 2026: कानपुर में सपा ने बड़ा ब्राह्मण सम्मेलन किया। कार्यक्रम में लगाए गए ‘ब्राह्मण चला अखिलेश के संग’ जैसे संदेशों से पार्टी की रणनीति और स्पष्ट हुई।
सम्मेलन में ब्राह्मण समाज के कथित उत्पीड़न और मुकदमों का मुद्दा उठाया गया और सपा ने सत्ता में आने पर सम्मान और सुरक्षा देने की बात कही।
5 अगस्त 2026: जनेश्वर मिश्र की जयंती पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने PDA के ‘P’ को ‘पंडित’ से जोड़ दिया।
इसी कार्यक्रम में अयोध्या से पवन पांडे को लेकर दिया गया उनका राजनीतिक संदेश भी चर्चा में आया।
अयोध्या और पवन पांडे इतने महत्वपूर्ण क्यों?
अयोध्या का चुनावी महत्व सिर्फ एक लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
राम मंदिर के कारण अयोध्या बीजेपी की हिंदुत्व राजनीति के सबसे बड़े प्रतीकों में शामिल है।
ऐसे में सपा अगर यहां ब्राह्मण चेहरे पवन पांडे पर दांव लगाती है तो इसके जरिए वह एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर सकती है।
एक तरफ ब्राह्मण मतदाताओं को प्रतिनिधित्व का संदेश और दूसरी तरफ बीजेपी के सबसे मजबूत वैचारिक क्षेत्र में सीधी चुनौती।
यही वजह है कि पवन पांडे को लेकर अखिलेश यादव के संकेत को सिर्फ एक सीट की चुनावी रणनीति के बजाय सपा की व्यापक सोशल इंजीनियरिंग से जोड़कर देखा जा रहा है।
ब्राह्मणों के साथ ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की तरफ भी अखिलेश?
सपा की रणनीति सिर्फ ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित करने तक सीमित नहीं दिखाई देती।
हाल के वर्षों में अखिलेश यादव और उनके परिवार की ओर से हिंदू धार्मिक प्रतीकों और आयोजनों में सार्वजनिक भागीदारी भी बढ़ी है।
फरवरी 2023 में अखिलेश यादव ने भगवान राम से जुड़ा पोस्ट किया। जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण मिलने पर उन्होंने आभार जताया और दर्शन की बात कही।
2026 में बड़े मंगल के अवसर पर हनुमान जी से जुड़े पोस्ट और कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी भी देखने को मिली।
लखनऊ में भंडारे में शामिल होने से लेकर इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर में पूजा-अर्चना तक कई घटनाओं को सपा की बदलती राजनीतिक प्रस्तुति से जोड़कर देखा गया।
30 जून 2026 को अखिलेश की पत्नी और मैनपुरी सांसद डिंपल यादव भी बच्चों के साथ वाराणसी में धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल हुईं।
इसे सपा की ऐसी रणनीति के तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें पार्टी बीजेपी को यह राजनीतिक स्पेस नहीं देना चाहती कि हिंदू धार्मिक पहचान और प्रतीकों पर केवल उसका दावा दिखाई दे।
BJP भी क्यों हुई सक्रिय?
सपा अकेली पार्टी नहीं है जो ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर सक्रिय है।
बीजेपी भी अपने इस परंपरागत और मजबूत वोट बैंक को साथ बनाए रखने की कोशिश कर रही है।
28 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के एक कार्यक्रम में शामिल हुए।
बीजेपी के पास ब्रजेश पाठक समेत कई प्रमुख ब्राह्मण चेहरे हैं और संगठन से लेकर सरकार तक समुदाय को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति पार्टी के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है।
सपा की बढ़ती सक्रियता के बीच बीजेपी की चुनौती अपने मौजूदा समर्थन को बनाए रखने की है।
उत्तर प्रदेश को मिले हैं कई ब्राह्मण मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों का प्रभाव नया नहीं है।
राज्य को अलग-अलग दौर में कई ब्राह्मण मुख्यमंत्री मिले हैं। इनमें गोविंद बल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी जैसे नाम शामिल हैं।
एनडी तिवारी के बाद लंबे समय से उत्तर प्रदेश में कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना है।
इस ऐतिहासिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व के कारण भी ब्राह्मण समुदाय को उत्तर प्रदेश की सत्ता की राजनीति में महत्वपूर्ण सामाजिक समूह माना जाता रहा है।
क्या BJP से नाराज हैं यूपी के ब्राह्मण?
2027 से पहले यह सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन रहा है, लेकिन इसका सीधा जवाब अभी उपलब्ध चुनावी आंकड़ों से नहीं दिया जा सकता।
अलग-अलग राजनीतिक दल ब्राह्मणों की नाराजगी या उपेक्षा का मुद्दा उठा रहे हैं, लेकिन पूरे समुदाय के राजनीतिक रुख को एक जैसा मानना सही नहीं होगा।
2022 के उपलब्ध पोस्ट-पोल सर्वे में ब्राह्मण मतदाताओं के बीच बीजेपी की स्थिति बेहद मजबूत थी।
इसलिए 2027 का असली सवाल यह नहीं है कि पूरा ब्राह्मण वोट बीजेपी छोड़कर सपा के पास जाएगा या नहीं।
असल सवाल है- क्या सपा बीजेपी की भारी बढ़त को कुछ प्रतिशत कम कर सकती है?
सिर्फ 5-10% वोट खिसका तो क्यों बदल सकता है खेल?
उत्तर प्रदेश में चुनाव सीट-दर-सीट लड़ा जाता है। कई विधानसभा क्षेत्रों में जीत-हार का अंतर कुछ हजार वोटों तक सीमित रहता है।
ऐसे में किसी प्रभावशाली सामाजिक समूह के वोट में छोटा बदलाव भी करीबी सीटों पर महत्वपूर्ण हो सकता है।
सपा के पास पहले से मजबूत मुस्लिम-यादव आधार है। इसके साथ पार्टी गैर-यादव OBC, दलित और अब ब्राह्मण मतदाताओं के एक हिस्से को जोड़ने की कोशिश कर रही है।
दूसरी तरफ बीजेपी का प्रयास अपने सवर्ण आधार के साथ गैर-यादव OBC, गैर-जाटव दलित, महिला और लाभार्थी मतदाताओं के गठजोड़ को बनाए रखने का है।
यही कारण है कि ब्राह्मण वोट का मुकाबला सिर्फ ‘ब्राह्मण बनाम ब्राह्मण’ की लड़ाई नहीं है। यह दोनों पार्टियों के बड़े सामाजिक गठबंधन की लड़ाई का हिस्सा है।
2024 के नतीजों ने BJP की चिंता क्यों बढ़ाई?
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ा झटका लगा था। पार्टी राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 33 पर सिमट गई थी, जबकि समाजवादी पार्टी 37 सीटें जीतकर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
इसके बाद से 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी और सपा दोनों ने अपने-अपने सामाजिक समीकरणों पर नए सिरे से काम शुरू किया है।
सपा की कोशिश 2024 में मिले राजनीतिक मोमेंटम को विधानसभा चुनाव तक ले जाने की है, जबकि बीजेपी लोकसभा चुनाव में हुए नुकसान की भरपाई कर अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को मजबूत करना चाहती है।
ब्राह्मण मतदाता इसी मुकाबले की महत्वपूर्ण कड़ी बन गए हैं।
2027 में ‘पंडित’ किसके साथ?
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की अनुमानित आबादी भले करीब 10% हो, लेकिन उनका भौगोलिक फैलाव, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कई सीटों पर प्रभाव उन्हें महत्वपूर्ण चुनावी समूह बनाता है।
बीजेपी के सामने चुनौती उस समुदाय पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने की है, जिसने 2014 के बाद कई चुनावों में उसका बड़े पैमाने पर समर्थन किया है।
अखिलेश यादव के सामने चुनौती इससे कहीं बड़ी है। उन्हें उस वोट बैंक में जगह बनानी है जहां 2022 के CSDS सर्वे के मुताबिक सपा गठबंधन को सिर्फ करीब 6% समर्थन मिला था।
इसीलिए ब्राह्मण सम्मेलन, सनातन पांडे जैसे नेताओं की सक्रियता, पवन पांडे पर फोकस और PDA के ‘P’ को ‘पंडित’ बताने जैसे संदेश एक ही बड़ी रणनीति का हिस्सा दिखाई देते हैं।
लेकिन 2007 की मायावती वाली सोशल इंजीनियरिंग को दोहराना आसान नहीं है। बीजेपी का ब्राह्मण आधार मजबूत रहा है और उसके पास संगठन, नेतृत्व तथा सत्ता में प्रतिनिधित्व का अपना तर्क है।
इसलिए 2027 की लड़ाई इस बात की नहीं होगी कि पूरा ब्राह्मण वोट किसे मिलता है, बल्कि इस बात की होगी कि बीजेपी अपनी पुरानी बढ़त कितनी बचा पाती है और सपा उसमें कितनी सेंध लगा पाती है।
यूपी जैसे राज्य में कुछ प्रतिशत वोटों का यही बदलाव दर्जनों करीबी सीटों का नतीजा प्रभावित कर सकता है।
खबर के मुख्य बिंदु:
- यूपी में ब्राह्मणों की आबादी अलग-अलग अनुमानों में करीब 9-10% मानी जाती है और कई विधानसभा क्षेत्रों में उनका महत्वपूर्ण प्रभाव है।
- CSDS के 2022 पोस्ट-पोल सर्वे में BJP+ को करीब 89% ब्राह्मण वोट मिलने का अनुमान था, जबकि सपा गठबंधन को करीब 6% समर्थन मिला था।
- अखिलेश यादव ब्राह्मण सम्मेलनों, पार्टी के ब्राह्मण चेहरों और PDA के ‘P’ को ‘पंडित’ से जोड़कर बीजेपी के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं।
- बीजेपी की चुनौती 2027 में अपने सवर्ण आधार, खासकर ब्राह्मण मतदाताओं पर मजबूत पकड़ बनाए रखने की है।



















