AIN NEWS 1 लखनऊ : उत्तर प्रदेश में जमीन और राजस्व से जुड़े मामलों को लेकर योगी सरकार ने अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया तेज कर दी है। दाखिल-खारिज, वरासत, पैमाइश और राजस्व अदालतों में लंबित मामलों के निस्तारण में लापरवाही को सरकार गंभीरता से ले रही है। तहसील स्तर पर कार्रवाई के बाद अब सात उपजिलाधिकारी यानी SDM भी शासन की निगरानी के दायरे में आ गए हैं।
राजस्व परिषद की समीक्षा में कुछ SDM न्यायालयों में मामलों के निस्तारण की स्थिति अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिली। इसके बाद संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा गया है। अधिकारियों के जवाब मिलने के बाद आगे की कार्रवाई पर निर्णय लिया जाएगा।
मुख्यमंत्री योगी ने दिए जवाबदेही तय करने के निर्देश
प्रदेश में आम लोगों से सीधे जुड़े राजस्व मामलों की स्थिति की उच्चस्तरीय समीक्षा की जा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि राजस्व अदालतों में लंबित मामलों को अनावश्यक रूप से लंबा न खींचा जाए और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उनका समय पर निस्तारण सुनिश्चित किया जाए।

सरकार का मानना है कि जमीन से जुड़े विवाद और नामांतरण जैसे मामले आम लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। किसी जमीन के दाखिल-खारिज, वरासत या पैमाइश का मामला लंबे समय तक लंबित रहने से लोगों को तहसील और राजस्व कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
इसी वजह से अब अधिकारियों के कामकाज का आंकड़ों के आधार पर मूल्यांकन किया जा रहा है।
RCCMS के आंकड़ों से सामने आई अधिकारियों की स्थिति
राजस्व विभाग की समीक्षा में RCCMS यानी Revenue Court Computerized Management System में उपलब्ध आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। इसी व्यवस्था के माध्यम से राजस्व न्यायालयों में दर्ज मामलों और उनके निस्तारण की स्थिति पर नजर रखी जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, समीक्षा के दौरान सात SDM न्यायालयों में मामलों के निस्तारण की स्थिति कमजोर पाई गई। इसके बाद संबंधित अधिकारियों से लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सभी सात SDM को अभी निलंबित नहीं किया गया है। फिलहाल उनसे जवाब मांगा गया है। जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाने पर विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की जा सकती है।
सरोजनीनगर के SDM न्यायालय में बेहद कम निस्तारण
समीक्षा में लखनऊ की सरोजनीनगर तहसील के SDM न्यायिक न्यायालय का आंकड़ा विशेष रूप से चर्चा में है।
उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक 22 दिसंबर 2025 से 31 मई 2026 के बीच इस न्यायालय में कुल 221 मामले दर्ज हुए, लेकिन इनमें से सिर्फ 9 मामलों का निस्तारण किया गया। इस तरह निस्तारण की दर करीब 4.07 प्रतिशत रही।
सरकार की नजर में इस तरह की स्थिति गंभीर मानी जा रही है, क्योंकि राजस्व मामलों में लगातार लंबित मामलों की संख्या बढ़ने से लोगों को समय पर राहत नहीं मिल पाती।
लखनऊ सदर में 1,000 मामलों में 403 का निस्तारण
इसी अवधि में लखनऊ सदर तहसील के SDM न्यायालय की स्थिति अलग रही। वहां कुल 1,000 मामले दर्ज हुए और 403 मामलों का निस्तारण किया गया।
इस हिसाब से निस्तारण दर करीब 40.30 प्रतिशत रही। हालांकि अलग-अलग न्यायालयों में मामलों की प्रकृति, पुराने लंबित मामलों और कार्यभार में अंतर हो सकता है, लेकिन शासन अब अधिकारियों के प्रदर्शन को आंकड़ों के आधार पर देख रहा है।
दूसरे जिलों के SDM भी समीक्षा के घेरे में
समीक्षा में केवल लखनऊ के अधिकारी ही नहीं, बल्कि प्रदेश के दूसरे जिलों के SDM न्यायालय भी शामिल रहे।
रिपोर्ट के अनुसार मधुबन, मऊ के एक SDM न्यायालय में 276 मामलों में से 55 का निस्तारण हुआ। वहीं कुंडा, प्रतापगढ़ में 297 मामलों में से 80 मामलों का निस्तारण किया गया।
रानीगंज, प्रतापगढ़ से जुड़े आंकड़ों में भी निस्तारण की स्थिति पर सवाल उठे। एक न्यायालय में 418 मामलों में से 133 का निस्तारण हुआ, जबकि दूसरे आंकड़े में 558 में से 183 मामलों का निस्तारण बताया गया है।
कुंडा के SDM न्यायालय से संबंधित एक अन्य आंकड़े में 1,247 मामलों में 511 मामलों के निस्तारण की जानकारी सामने आई है।
इन आंकड़ों के आधार पर संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया है।
तहसीलदारों पर भी हो चुकी है कार्रवाई
SDM से स्पष्टीकरण मांगने से पहले राजस्व विभाग ने तहसीलदार और नायब तहसीलदार स्तर पर भी कार्रवाई की है।
रिपोर्टों के अनुसार राजस्व मामलों के निस्तारण में लापरवाही पाए जाने पर कई अधिकारियों को निलंबित किया गया, जबकि कुछ अन्य अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं।
9 सितंबर 2026 को सामने आई जानकारी के मुताबिक पांच और अधिकारियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई। इनमें संडीला, हरदोई के तहसीलदार अमित यादव, देवरिया के तहसीलदार कृष्ण कुमार मिश्रा, जौनपुर के तहसीलदार सौरभ कुमार, गाजीपुर में तैनात तहसीलदार रंजन वर्मा और प्रतापगढ़ के तहसीलदार अलख शुक्ला के नाम शामिल हैं।
इससे पहले भी चार तहसीलदार और एक नायब तहसीलदार को निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
दाखिल-खारिज और वरासत के मामलों पर भी नजर
सरकार की कार्रवाई का एक बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 34 के तहत आने वाले नामांतरण यानी दाखिल-खारिज के मामलों से जुड़ा है।
जमीन खरीदने या विरासत में जमीन मिलने के बाद राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज कराना आम नागरिक के लिए जरूरी प्रक्रिया है। इसी तरह वरासत के मामलों में भी समय पर रिकॉर्ड अपडेट होना महत्वपूर्ण है।
यदि आवेदन लंबे समय तक लंबित रहता है तो जमीन के रिकॉर्ड को लेकर आगे विवाद पैदा हो सकता है। यही वजह है कि शासन अब ऐसे मामलों के निस्तारण की गति पर विशेष निगरानी कर रहा है।
23 सितंबर तक मांगी गई रिपोर्ट
रिपोर्ट के अनुसार संबंधित अधिकारियों के स्पष्टीकरण लेकर जिलाधिकारियों के माध्यम से राजस्व परिषद को रिपोर्ट भेजी जानी है। 23 सितंबर 2026 तक पूरी रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजे जाने की बात सामने आई है।
इसके बाद अधिकारियों के जवाब और उनके कामकाज की वास्तविक स्थिति के आधार पर आगे की कार्रवाई तय हो सकती है।
अभी कार्रवाई का अगला चरण बाकी
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सात SDM के नाम सामने आने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें निलंबित कर दिया गया है। फिलहाल उन्हें खराब निस्तारण के आधार पर चिन्हित करते हुए स्पष्टीकरण मांगा गया है।
अब संबंधित अधिकारियों के जवाब का इंतजार है। यदि जवाब में दिए गए कारण शासन को संतोषजनक नहीं लगे तो विभागीय कार्रवाई आगे बढ़ सकती है।
सरकार की इस कार्रवाई से यह संकेत साफ है कि उत्तर प्रदेश में राजस्व मामलों के निस्तारण को लेकर अब अधिकारियों पर लगातार निगरानी बढ़ाई जा रही है। खासकर जमीन से जुड़े मामलों में देरी और शिकायतों को नजरअंदाज करना अधिकारियों के लिए भारी पड़ सकता है।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
सरकार की इस सख्ती का सीधा असर उन लोगों पर पड़ सकता है जिनके जमीन से जुड़े मामले तहसील या SDM न्यायालय में लंबे समय से लंबित हैं। दाखिल-खारिज, वरासत, पैमाइश और अन्य राजस्व मामलों में अब अधिकारियों के प्रदर्शन की नियमित समीक्षा होने की उम्मीद है।
हालांकि किसी मामले के निस्तारण में केवल अधिकारी की भूमिका ही नहीं होती। मामले की प्रकृति, दस्तावेजों की स्थिति, पक्षकारों की मौजूदगी और न्यायिक प्रक्रिया जैसे कई कारण भी समय को प्रभावित करते हैं। इसलिए किसी अधिकारी के खिलाफ अंतिम कार्रवाई से पहले उसका स्पष्टीकरण और संबंधित मामले की पूरी स्थिति देखना जरूरी होगा।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि योगी सरकार ने राजस्व अदालतों और जमीन से जुड़े मामलों में लंबित मामलों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। तहसीलदारों के बाद अब सात SDM की कार्यप्रणाली भी जांच के दायरे में है। आने वाले दिनों में इन अधिकारियों के जवाब के आधार पर कार्रवाई की तस्वीर और साफ हो सकती है।
The Uttar Pradesh government has intensified monitoring of land revenue cases, including land mutation, inheritance, measurement and pending revenue court matters. Seven SDMs have been identified for poor case disposal and asked to submit explanations. The review is based on RCCMS data, with the Yogi Adityanath government focusing on accountability and timely disposal of revenue cases across Uttar Pradesh.



















