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वाराणसी में वकील-पुलिस विवाद गहराया: एडीसीपी, एसीपी समेत 100 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा, अगली सुनवाई 29 सितंबर को

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AIN NEWS 1 | वाराणसी में वकीलों और पुलिस के बीच छिड़ा विवाद अब अदालत की चौखट तक पहुँच गया है। बनारस बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता राघवेंद्र नारायण दुबे ने इस मामले में अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल किया। उनका आरोप है कि पुलिस अधिकारियों ने न केवल अधिवक्ताओं बल्कि न्यायिक अधिकारियों के साथ भी अभद्र व्यवहार किया। अदालत ने मामले को प्रकीर्ण वाद के रूप में दर्ज कर लिया है और 29 सितंबर 2025 को अगली सुनवाई की तारीख तय की है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

इस पूरे मामले की जड़ 16 सितंबर 2025 की एक घटना है। कचहरी परिसर में एक दारोगा और कुछ वकीलों के बीच मामूली कहासुनी हुई थी। देखते ही देखते यह तकरार बढ़ती चली गई और गंभीर विवाद में बदल गई।

आरोप है कि घटना के बाद कैंट इंस्पेक्टर शिवाकांत मिश्र और कचहरी चौकी इंचार्ज ने गेट नंबर 2 पर ताला लगा दिया। इतना ही नहीं, वकीलों का कहना है कि उन पर पुलिस की ओर से पथराव भी किया गया।

जब स्थिति को संभालने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर पहुँचे, तो उनसे विवाद शांत करने की उम्मीद थी। लेकिन वकीलों का आरोप है कि उन अधिकारियों ने भी अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया और न्यायिक अधिकारियों तक को अनादरपूर्ण शब्द कहे। इसी के बाद मामला गरमाया और वकीलों ने इसे न्यायपालिका की गरिमा पर हमला करार दिया।

किन पुलिस अधिकारियों पर लगे आरोप?

वरिष्ठ अधिवक्ता राघवेंद्र नारायण दुबे ने अदालत में दिए अपने प्रार्थना पत्र में कई अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के नाम शामिल किए। इनमें प्रमुख हैं:

  • एडीसीपी नीतू

  • एसीपी नितिन तनेजा

  • एसीपी विदुष सक्सेना

  • कैंट इंस्पेक्टर शिवाकांत मिश्र

  • लगभग 50 दारोगा

  • करीब 50 सिपाही

कुल मिलाकर 100 से अधिक पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग की गई है।

अदालत की प्रतिक्रिया

अदालत ने इस मामले को गंभीर मानते हुए इसे प्रकीर्ण वाद के रूप में दर्ज किया है। प्रभारी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने कहा कि सभी पक्षों को सुनने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 29 सितंबर 2025 की तारीख तय की है।

वकीलों का पक्ष

वकीलों का मानना है कि यह केवल अधिवक्ता समुदाय का अपमान नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली घटना है।
राघवेंद्र नारायण दुबे का कहना है, “न्यायिक अधिकारियों और अधिवक्ताओं का अपमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यदि इस बार सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो ऐसी घटनाएँ बार-बार होंगी।”

वाराणसी बार एसोसिएशन के सदस्य भी इस मुद्दे पर एकजुट दिख रहे हैं और लगातार पुलिस के खिलाफ विरोध दर्ज कर रहे हैं।

पुलिस की चुप्पी

अब तक पुलिस प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अदालत में मामला दर्ज होने और वकीलों के आरोपों के बावजूद, पुलिस अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई न होने से अधिवक्ताओं में आक्रोश और बढ़ गया है।

बढ़ता तनाव

इस विवाद ने कचहरी परिसर का माहौल भी प्रभावित कर दिया है। वकील लगातार मीटिंग और रणनीति बनाकर आगे की राह तय कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि न्याय नहीं मिला, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने से पीछे नहीं हटेंगे।

दूसरी ओर, पुलिस की चुप्पी से यह विवाद और गहराता जा रहा है।

आगे का रास्ता

सभी की निगाहें अब 29 सितंबर 2025 की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगी और इसके बाद तय होगा कि पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज किया जाएगा या नहीं।

यह मामला केवल एक टकराव नहीं है, बल्कि वकीलों और पुलिस के रिश्तों की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। अगर अदालत इस पर सख्त रुख अपनाती है, तो भविष्य में ऐसे विवादों पर रोक लगाने का रास्ता साफ हो सकता है।

वाराणसी का यह विवाद बताता है कि जब कानून लागू करने वाले और कानून की पैरवी करने वाले आपस में भिड़ जाते हैं, तो परिणाम कितना गंभीर हो सकता है। अधिवक्ता और न्यायपालिका समाज के लिए न्याय और भरोसे का प्रतीक हैं, वहीं पुलिस कानून-व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। ऐसे में दोनों का आपसी सम्मान और सहयोग आवश्यक है। अब देखना यह होगा कि अदालत किस दिशा में कदम बढ़ाती है और पुलिस अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होती है।

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