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आरएसएस का उद्देश्य सत्ता नहीं, समाज निर्माण है: मोहन भागवत!

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AIN NEWS 1: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शुक्रवार को संघ की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आरएसएस को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) या विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) जैसे संगठनों के नजरिए से देखना पूरी तरह गलत है। संघ एक स्वतंत्र सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसका उद्देश्य सत्ता हासिल करना या राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना नहीं है।

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डॉ. भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि आरएसएस भाजपा को नियंत्रित करता है या राजनीतिक फैसलों में उसकी सीधी भूमिका होती है। सरसंघचालक ने इन धारणाओं को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि संघ, भाजपा और अन्य संगठनों के बीच वैचारिक समानता हो सकती है, लेकिन सभी अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम करते हैं।

“संघ सत्ता की राजनीति का मंच नहीं”

मोहन भागवत ने साफ शब्दों में कहा कि आरएसएस का लक्ष्य न तो सत्ता पाना है, न चुनाव जीतना और न ही किसी को टिकट दिलाना। संघ का मूल उद्देश्य समाज की गुणवत्ता को बेहतर बनाना, व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करना और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है।

उन्होंने कहा,

“संघ का काम व्यक्ति निर्माण है। अगर समाज का व्यक्ति मजबूत, चरित्रवान और जिम्मेदार होगा, तो अपने आप समाज और राष्ट्र मजबूत होंगे।”

उनके अनुसार, संघ का काम दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन से जुड़ा है, न कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ से।

भाजपा को लेकर संघ की स्थिति स्पष्ट

डॉ. भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि भाजपा को संघ ‘कंट्रोल’ नहीं करता। उन्होंने कहा कि भाजपा एक स्वतंत्र राजनीतिक दल है, जिसकी अपनी संगठनात्मक संरचना, निर्णय प्रक्रिया और नेतृत्व है। संघ का उससे कोई प्रशासनिक या राजनीतिक नियंत्रण संबंध नहीं है।

उन्होंने कहा कि यह मान लेना कि संघ भाजपा के फैसले तय करता है, संघ की कार्यशैली को न समझ पाने का परिणाम है। संघ न तो किसी पार्टी को निर्देश देता है और न ही चुनावी रणनीतियां तय करता है।

टिकट या पद की चाह रखने वालों को साफ संदेश

अपने संबोधन में सरसंघचालक ने उन लोगों को भी स्पष्ट संदेश दिया, जो राजनीतिक महत्वाकांक्षा के साथ संघ से जुड़ना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति भाजपा का टिकट पाने, पार्टी में पद हासिल करने या सत्ता के करीब पहुंचने के उद्देश्य से आरएसएस की शाखाओं में आता है, तो उसे संघ से दूरी बना लेनी चाहिए।

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उनके शब्दों में,

“संघ कोई सीढ़ी नहीं है, जिससे चढ़कर सत्ता तक पहुंचा जाए।”

उन्होंने कहा कि संघ में वही व्यक्ति टिक सकता है, जो सेवा, अनुशासन और समाजहित की भावना से जुड़ा हो।

संघ का मूल दर्शन: सेवा और संस्कार

मोहन भागवत ने संघ के मूल दर्शन पर बात करते हुए कहा कि शाखाओं में होने वाली गतिविधियों का उद्देश्य केवल शारीरिक व्यायाम या अनुशासन नहीं है, बल्कि व्यक्ति में राष्ट्रभाव, सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों का विकास करना है।

संघ का काम जाति, भाषा, क्षेत्र और राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर उठकर समाज को जोड़ने का है। संघ स्वयंसेवक को यह सिखाता है कि वह अपने कर्तव्यों को समझे और समाज के लिए बिना किसी अपेक्षा के काम करे।

राजनीति और समाज सेवा में अंतर

सरसंघचालक ने कहा कि राजनीति और समाज सेवा दोनों के उद्देश्य अलग-अलग हैं। राजनीति सत्ता और नीतियों से जुड़ी होती है, जबकि संघ समाज के चरित्र निर्माण पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि संघ राजनीति का विरोध नहीं करता, लेकिन राजनीति को ही सब कुछ मान लेना भी गलत है।

उनका मानना है कि यदि समाज मजबूत होगा, तो राजनीति अपने आप सही दिशा में चलेगी। इसलिए संघ राजनीति से पहले समाज पर ध्यान देता है।

संघ पर लगने वाले आरोपों का जवाब

आरएसएस पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह ‘पर्दे के पीछे’ से देश की राजनीति को नियंत्रित करता है। मोहन भागवत ने ऐसे आरोपों को “अधूरी समझ” का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि संघ के काम को समझने के लिए उसके रोजमर्रा के सामाजिक कार्यों, आपदा सेवा, शिक्षा और सामाजिक समरसता के प्रयासों को देखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संघ किसी भी दल या नेता के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए काम करता है।

स्पष्ट रेखा खींचता संघ

अपने वक्तव्य के जरिए मोहन भागवत ने एक बार फिर यह रेखा खींचने की कोशिश की कि संघ और राजनीति के बीच वैचारिक संवाद हो सकता है, लेकिन संगठनात्मक नियंत्रण नहीं। संघ का रास्ता सेवा और संस्कार का है, जबकि राजनीति का रास्ता सत्ता और प्रशासन का।

डॉ. मोहन भागवत का यह बयान न केवल आरएसएस की भूमिका को स्पष्ट करता है, बल्कि उन धारणाओं को भी चुनौती देता है, जिनमें संघ को राजनीतिक शक्ति केंद्र के रूप में देखा जाता है। उनका संदेश साफ है—संघ सत्ता का नहीं, समाज का संगठन है। जो लोग राजनीतिक फायदे की उम्मीद लेकर संघ से जुड़ते हैं, उन्हें अपने इरादों पर दोबारा विचार करना चाहिए।

Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) Chief Mohan Bhagwat clarified that RSS does not control the Bharatiya Janata Party (BJP) or political processes in India. He emphasized that RSS is a cultural and social organization focused on character building, social harmony, and nation-building rather than elections, political power, or party tickets. Mohan Bhagwat’s statement once again highlights the ideological independence between RSS and BJP while addressing common misconceptions about their relationship.

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