AIN NEWS 1 | गाज़ियाबाद में संपत्ति कर बढ़ोतरी को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद अब न्यायिक स्तर पर समाप्त हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाज़ियाबाद नगर निगम द्वारा लागू की गई नई संपत्ति कर व्यवस्था को वैध करार देते हुए उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है, जिसमें कर वृद्धि को मनमाना और नियमों के विरुद्ध बताया गया था।
यह याचिका नगर निगम के वर्तमान और पूर्व पार्षदों की ओर से दाखिल की गई थी। मामले में उत्तर प्रदेश सरकार, गाज़ियाबाद नगर निगम और संबंधित प्रशासनिक अधिकारी प्रतिवादी पक्ष के रूप में शामिल थे।
अदालत के इस फैसले के बाद शहर में लागू नई संपत्ति कर दरें यथावत बनी रहेंगी।
क्या था पूरा मामला?
गाज़ियाबाद नगर निगम ने 9 जनवरी 2024 को जारी अधिसूचना और उसके बाद मार्च से मई 2025 के बीच पारित आदेशों के माध्यम से संपत्तियों के मूल्यांकन का नया आधार तय किया था। इसके तहत Minimum Monthly Rate of Rent (MMRR) निर्धारित किया गया, जिसके आधार पर संपत्ति कर की गणना की जाने लगी।
नई प्रणाली लागू होने के बाद कई क्षेत्रों में संपत्ति कर में भारी वृद्धि देखने को मिली। कुछ मामलों में कर वृद्धि लगभग 300 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिसके बाद इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह वृद्धि आम नागरिकों पर आर्थिक बोझ डालने वाली है और प्रक्रिया में कई कानूनी खामियां हैं।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्तियां
जनहित याचिका में नगर निगम की नीति पर कई सवाल उठाए गए। प्रमुख तर्क इस प्रकार थे—
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संपत्ति कर में असामान्य और अत्यधिक वृद्धि
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दो वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले MMRR संशोधन
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सड़क चौड़ाई निर्धारण में पार्किंग और ग्रीन बेल्ट को शामिल करना
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कर छूट (Rebate) में कमी
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नियमों के अनुरूप प्रक्रिया न अपनाना
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इन बदलावों से कर निर्धारण पारदर्शी और न्यायसंगत नहीं रह गया।
हाईकोर्ट ने कैसे किया मूल्यांकन?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद नगर निगम की प्रक्रिया और कानूनी ढांचे का परीक्षण किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति कर निर्धारण का मूल आधार “वार्षिक मूल्य” (Annual Value) होता है।
कोर्ट के अनुसार वार्षिक मूल्य की गणना का सूत्र है:
Annual Value = Carpet Area × MMRR × 12
अदालत ने माना कि Minimum Monthly Rate of Rent निर्धारित करना नगर आयुक्त का वैधानिक अधिकार है और यह अधिकार कानून द्वारा प्रदान किया गया है।
प्रक्रिया को अदालत ने क्यों माना सही?
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि नगर निगम ने कर निर्धारण से पहले व्यापक सर्वेक्षण कराया था। रिकॉर्ड के अनुसार—
✔ वार्ड स्तर पर सर्वेक्षण किया गया
✔ कुल 318 आपत्तियां आमंत्रित की गईं
✔ सभी आपत्तियों पर विचार कर उनका निस्तारण किया गया
✔ सड़क की चौड़ाई के आधार पर संपत्तियों को 9 श्रेणियों में विभाजित किया गया
✔ अंतिम अधिसूचना विधिवत प्रकाशित की गई
इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने कहा कि केवल कर की राशि अधिक होना प्रशासनिक निर्णय को अवैध साबित नहीं करता, जब तक पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार अपनाई गई हो।
सड़क चौड़ाई आधारित वर्गीकरण पर बड़ा फैसला
याचिका में यह भी कहा गया था कि “road” शब्द की स्पष्ट परिभाषा नहीं होने के कारण सड़क चौड़ाई के आधार पर कर निर्धारण गलत है।
इस पर अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि संबंधित अधिनियम में “street” की परिभाषा दी गई है, जिसमें सड़क शामिल मानी जाएगी। इसलिए सड़क चौड़ाई के आधार पर संपत्ति वर्गीकरण पूरी तरह वैध है।
इस निर्णय से नगर निगमों द्वारा अपनाई जाने वाली शहरी कर नीति को कानूनी मजबूती मिली है।
दो वर्ष नियम पर कोर्ट की स्पष्ट राय
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि MMRR में संशोधन दो वर्ष से पहले नहीं किया जा सकता। हालांकि अदालत ने रिकॉर्ड का अध्ययन करते हुए पाया कि वर्ष 2001 के बाद विधिवत नया MMRR निर्धारण ही नहीं हुआ था।
इसलिए 2024 में किया गया निर्धारण संशोधन नहीं बल्कि नया वैधानिक निर्धारण माना जाएगा। इस आधार पर अदालत ने दो वर्ष नियम लागू होने की दलील को अस्वीकार कर दिया।
PIL की मंशा पर अदालत की टिप्पणी
फैसले के दौरान अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता स्वयं नगर निगम के पार्षद हैं और बोर्ड के निर्णय के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल करना राजनीतिक विवाद जैसा प्रतीत होता है।
हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय केवल कानूनी तथ्यों और मेरिट के आधार पर दिया गया है।
फैसले का शहर पर क्या असर पड़ेगा?
हाईकोर्ट के निर्णय के बाद गाज़ियाबाद में लागू नई संपत्ति कर व्यवस्था जारी रहेगी। इसके प्रमुख प्रभाव इस प्रकार होंगे—
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संशोधित संपत्ति कर दरें लागू रहेंगी
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नगर आयुक्त की कर निर्धारण शक्तियों को न्यायिक समर्थन मिला
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भविष्य में कर नीति पर अदालत के सीमित हस्तक्षेप सिद्धांत को मजबूती
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला राज्य के अन्य नगर निगमों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।
तथ्य एक नज़र में
| मुद्दा | अदालत का निर्णय |
|---|---|
| MMRR निर्धारण | वैध |
| 300% तक कर वृद्धि | हस्तक्षेप से इनकार |
| सड़क चौड़ाई वर्गीकरण | विधिसम्मत |
| रिबेट विवाद | प्रशासनिक विषय |
| PIL | खारिज |
गाज़ियाबाद संपत्ति कर विवाद पर आए इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि प्रशासनिक निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया हो, तो केवल आर्थिक प्रभाव के आधार पर न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा। अदालत ने नगर निगम की प्रक्रिया को पारदर्शी और वैधानिक मानते हुए कर नीति को बरकरार रखा है।
अब शहर के संपत्ति स्वामियों के लिए नई कर संरचना को स्वीकार करना अनिवार्य होगा, जबकि नगर निगम के लिए यह फैसला प्रशासनिक अधिकारों की पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है।


















