AIN NEWS 1: गाजियाबाद की गुलमोहर ग्रीन्स आवासीय सोसायटी में अवैध निर्माण के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने टावर नंबर 27 और 28 को पूरी तरह ध्वस्त करने तथा चार अन्य टावरों की नौवीं और दसवीं मंजिल हटाने का आदेश दिया है। इसके साथ ही बिल्डर पर ₹25 लाख का हर्जाना लगाया गया है। अदालत ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
27 अक्टूबर 2026 को सुनाए गए इस फैसले में अदालत ने अवैध निर्माण को मंजूरी देने की प्रक्रिया, साझा क्षेत्रों की बिक्री और जरूरी प्रमाणपत्रों के बिना फ्लैटों का कब्जा दिए जाने जैसे मुद्दों पर गंभीर टिप्पणियां कीं। फैसले का उद्देश्य केवल अवैध निर्माण पर कार्रवाई करना नहीं, बल्कि घर खरीदारों के हितों की रक्षा करना और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना भी है।
दो टावर पूरी तरह ध्वस्त होंगे, चार टावरों की मंजिलें भी हटेंगी
इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने गुलमोहर ग्रीन्स सोसायटी में निर्माण से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए टावर नंबर 27 और 28 को पूरी तरह गिराने का निर्देश दिया है।
इसके अलावा टावर नंबर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं तथा दसवीं मंजिल को भी ध्वस्त करना होगा। अदालत ने इन अतिरिक्त मंजिलों को हटाने के लिए दो महीने की समयसीमा निर्धारित की है।
टावर नंबर 27 और 28 में बेसमेंट, ग्राउंड फ्लोर और चार ऊपरी मंजिलें बताई गई हैं। अदालत के अनुसार, इन निर्माणों को तीसरी बार शमन यानी कंपाउंडिंग के जरिए नियमित करने की मंजूरी कानून के अनुरूप नहीं थी।
ध्वस्तीकरण की कार्रवाई गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को करनी होगी। इसके लिए आने वाला खर्च संबंधित प्रमोटर से भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूल किया जा सकेगा। अदालत ने प्रशासन और पुलिस को कार्रवाई के दौरान प्राधिकरण के अधिकारियों को आवश्यक सुरक्षा तथा सहयोग उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया है।
बिल्डर को एक महीने में जमा करने होंगे ₹25 लाख
हाईकोर्ट ने प्रमोटर पर ₹25 लाख का हर्जाना लगाया है। यह राशि गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को नहीं, बल्कि गुलमोहर ग्रीन्स रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (GGRWA) के खाते में जमा करनी होगी।
अदालत के निर्देश के अनुसार, यह भुगतान फैसले की तारीख से एक महीने के भीतर किया जाना है।
कोर्ट ने माना कि निर्माण से संबंधित तथ्यों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया और सोसायटी के साझा क्षेत्रों को बेचने से फ्लैट मालिकों के हित प्रभावित हुए। साझा क्षेत्र वे स्थान होते हैं जिनका उपयोग सोसायटी के निवासी सामूहिक रूप से करते हैं। इनमें परियोजना के स्वीकृत नक्शे और नियमों के अनुसार निर्धारित सुविधाएं तथा अन्य सामान्य उपयोग वाले हिस्से शामिल हो सकते हैं।
अदालत ने इस मामले में प्रमोटर के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए और संबंधित कानूनों के उल्लंघन की जांच कराने का निर्देश दिया।
85 खरीदारों को भी मिल सकती है बड़ी राहत
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू सोसायटी के साझा क्षेत्रों की बिक्री से जुड़ा है। अमर उजाला, रिपब्लिक वर्ल्ड और अन्य मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने साझा क्षेत्रों को खरीदने वाले 85 लोगों के मामले में भी राहत के निर्देश दिए हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, संबंधित खरीदारों से ली गई रकम वापस करने और उस पर 10 प्रतिशत ब्याज देने का निर्देश दिया गया है। साझा क्षेत्रों की पहचान करने के लिए GDA उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
समिति यह पता लगाएगी कि किन हिस्सों को नियमों के विपरीत बेचा गया और कहां अवैध निर्माण हुआ है। अवैध पाए जाने वाले निर्माण को हटाकर संबंधित साझा क्षेत्र सोसायटी को सौंपने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
रिपोर्टों के अनुसार, इस प्रक्रिया को छह महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, खरीदारों के लिए भुगतान, पात्रता और कार्यान्वयन की सटीक शर्तों को समझने के लिए न्यायालय के मूल फैसले का संबंधित हिस्सा देखना जरूरी है।
GDA अधिकारियों की भूमिका पर अदालत ने उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने मामले में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के अधिकारियों के कामकाज पर भी नाराजगी जताई। अदालत के अनुसार, अधिकारियों के लापरवाह रवैये के कारण याचिकाकर्ताओं और सोसायटी के निवासियों को परेशानी उठानी पड़ी तथा उन्हें अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
अदालत ने 11 याचिकाकर्ताओं में से प्रत्येक को ₹50,000 देने का निर्देश GDA को दिया है। इस तरह इस मद में कुल ₹5.50 लाख का भुगतान किया जाना है।
इसके अतिरिक्त, संबंधित तत्कालीन उपाध्यक्ष के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया गया है। मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि 2018 में दर्ज एक मामले की जांच में कथित लापरवाही को लेकर जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह के निलंबन और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
इन निर्देशों का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि निर्माण को मंजूरी देने और शिकायतों पर कार्रवाई करने की प्रक्रिया में किन अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है।
प्रमोटर के खिलाफ दो सप्ताह में FIR दर्ज करने का आदेश
अदालत ने संबंधित पुलिस थाने को प्रमोटर के खिलाफ दो सप्ताह के भीतर प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया है। मामला कथित धोखाधड़ी, गलत तथ्य प्रस्तुत करने और संबंधित कानूनों के उल्लंघन से जुड़ा है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि जांच अतिरिक्त पुलिस आयुक्त, गाजियाबाद के स्तर से नीचे के अधिकारी को नहीं सौंपी जानी चाहिए।
यह निर्देश मामले की गंभीरता और पहले की जांच प्रक्रिया पर उठे सवालों को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। FIR दर्ज होने का अर्थ आरोपों का अंतिम रूप से साबित होना नहीं है। आरोपों की पुष्टि जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगी।
क्या है गुलमोहर ग्रीन्स सोसायटी का पूरा विवाद?
मामले की शुरुआत परियोजना के मूल नक्शे से जुड़ी है। वर्ष 2006 में गुलमोहर ग्रीन्स परियोजना में 34 टावर और 904 आवासीय इकाइयां बनाने के लिए नक्शा स्वीकृत किया गया था।
निर्माण के दौरान हिंडन एयरफोर्स स्टेशन के अधिकारियों ने जमीन के एक हिस्से को लेकर आपत्ति जताई। आरोप था कि परियोजना में शामिल भूमि के कुछ हिस्सों का अधिग्रहण भारत सरकार पहले ही कर चुकी थी। इसके बाद 3 जुलाई 2010 को मूल नक्शा रद्द कर दिया गया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नक्शा रद्द होने तक प्रमोटर 904 स्वीकृत इकाइयों में से लगभग 720 का निर्माण कर चुका था। बाद में वर्ष 2011 में कंपाउंडिंग के माध्यम से एक संशोधित योजना को मंजूरी मिली, जिसमें इकाइयों की संख्या बढ़ाकर 1,094 कर दी गई।
इसके बाद वर्ष 2015 में एक और कंपाउंडिंग योजना के तहत टावर नंबर 33, 34 और 35 में अतिरिक्त मंजिलों के निर्माण की मंजूरी दी गई। आगे चलकर टावर नंबर 16 से 19 में अतिरिक्त मंजिलों और टावर नंबर 27 तथा 28 से संबंधित निर्माण को नियमित करने के लिए तीसरी कंपाउंडिंग योजना प्रस्तुत की गई।
18 दिसंबर 2024 को इस तीसरी योजना को मंजूरी दिए जाने को निवासियों ने अदालत में चुनौती दी।
तीसरी कंपाउंडिंग मंजूरी को क्यों माना गया अवैध?
हाईकोर्ट ने पाया कि विवादित निर्माणों को नियमित करने की प्रक्रिया में कानूनी नियमों का पालन नहीं किया गया था। अदालत के सामने यह सवाल भी था कि क्या पहले से किए गए निर्माण में बार-बार बदलाव करके उन्हें कंपाउंडिंग के जरिए वैध बनाया जा सकता है।
अदालत ने परियोजना के क्षेत्रफल और फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की गणना से संबंधित पहलुओं की भी जांच की। FAR यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होता है कि किसी भूखंड पर नियमों के अनुसार कितना निर्माण किया जा सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 4,560 वर्ग मीटर वायुसेना की भूमि को परियोजना के कुल क्षेत्रफल की गणना में शामिल किए जाने का मुद्दा भी सामने आया। अदालत ने माना कि इस भूमि को गणना से हटाने पर तीसरी कंपाउंडिंग योजना के लिए आवश्यक FAR का आधार प्रभावित होता था।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि संबंधित निर्माणों के लिए आवश्यक संशोधित स्वीकृतियां और प्रमाणपत्र उपलब्ध होने के संबंध में पर्याप्त आधार नहीं था। टावर नंबर 16, 17, 18 और 19 के फ्लैटों के लिए पूर्णता प्रमाणपत्र नहीं होने का मुद्दा भी फैसले में महत्वपूर्ण रहा।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने तीसरी कंपाउंडिंग मंजूरी को अवैध माना और संबंधित निर्माणों को हटाने का आदेश दिया।
घर खरीदारों के लिए क्या है इस फैसले का महत्व?
यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो आवासीय परियोजनाओं में फ्लैट खरीदते हैं या पहले से किसी सोसायटी में रह रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि किसी निर्माण को नियमित करने की प्रशासनिक मंजूरी भी न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है।
घर खरीदते समय स्वीकृत नक्शे, पूर्णता प्रमाणपत्र, कब्जा प्रमाणपत्र जहां लागू हो, साझा क्षेत्रों के अधिकार और परियोजना की वैधानिक स्थिति की जांच करना जरूरी है। केवल बिल्डर के दावे या प्राधिकरण की मंजूरी का उल्लेख ही सभी कानूनी पहलुओं की पुष्टि नहीं करता।
गुलमोहर ग्रीन्स मामले में अदालत ने निर्माण से जुड़े नियमों के साथ-साथ निवासियों के अधिकारों और अधिकारियों की जवाबदेही पर भी जोर दिया है।
गाजियाबाद की गुलमोहर ग्रीन्स सोसायटी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला अवैध निर्माण और आवासीय परियोजनाओं में नियमों के पालन को लेकर महत्वपूर्ण है। दो टावरों को पूरी तरह गिराने, चार टावरों की अतिरिक्त मंजिलें हटाने, बिल्डर पर ₹25 लाख का हर्जाना लगाने और प्रमोटर के खिलाफ FIR दर्ज कराने के निर्देश इस फैसले के प्रमुख हिस्से हैं।
इसके साथ ही 11 याचिकाकर्ताओं को ₹50,000 प्रति व्यक्ति देने, संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और साझा क्षेत्रों से जुड़े खरीदारों को राहत देने के निर्देश भी सामने आए हैं।
अब इस मामले में महत्वपूर्ण यह होगा कि GDA, पुलिस और प्रशासन अदालत के निर्देशों को किस समयसीमा में लागू करते हैं। आदेश जारी होना और जमीन पर कार्रवाई पूरी होना अलग-अलग चरण हैं। इसलिए ध्वस्तीकरण, रकम की वापसी और विभागीय जांच की वास्तविक प्रगति पर आगे भी नजर रखना जरूरी होगा।
स्रोत-आधारित तथ्य-जांच: यह रिपोर्ट 28 अक्टूबर 2026 को उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है। जहां खरीदारों को राहत और विभागीय कार्रवाई का उल्लेख है, वहां कार्यान्वयन की स्थिति को अंतिम रूप से पूरा हुआ नहीं माना जाना चाहिए।
The Allahabad High Court has ordered the demolition of Towers 27 and 28 at Gulmohar Greens Society in Ghaziabad and directed the removal of the ninth and tenth floors of Towers 16, 17, 18 and 19. The court imposed ₹25 lakh in costs on the promoter, ordered an FIR over alleged irregularities, and directed action concerning Ghaziabad Development Authority officials. The judgment also addresses compensation for petitioners and relief for buyers affected by the alleged sale of common areas. This case highlights illegal construction, building approval compliance, real estate regulations and homebuyer rights in Ghaziabad, Uttar Pradesh.



















