नई दिल्ली | AIN NEWS 1
भारत के डिजिटल प्राइवेसी कानून को लेकर मीडिया जगत और केंद्र सरकार के बीच कानूनी विवाद तेज हो गया है। मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के मीडिया समूहों समेत 21 प्रमुख न्यूज पब्लिशर्स ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून (Digital Personal Data Protection Act, 2023) के कुछ प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता, प्रेस की स्वतंत्रता और गोपनीय समाचार स्रोतों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों को नोटिस जारी किया। हालांकि, अदालत ने फिलहाल विवादित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया और सरकार का पक्ष सुने बिना राहत देने से परहेज किया। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होगी।
किन मीडिया संस्थानों ने दाखिल की याचिका?
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने 6 अक्टूबर 2026 को यह याचिका दाखिल की थी। संगठन 21 प्रमुख समाचार प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करता है। इनमें नेटवर्क18, NDTV, द इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स इंटरनेट, द हिंदू, इंडिया टुडे, जी मीडिया, एबीपी और अन्य प्रमुख मीडिया संस्थानों के नाम शामिल हैं।
इनमें नेटवर्क18 का संबंध मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह से है, जबकि NDTV अडानी समूह का हिस्सा है। इस कारण मामले ने मीडिया उद्योग के साथ-साथ प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों की निजता से जुड़ी बहस को भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दी है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
27 अक्टूबर को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर सुनवाई की।
DNPA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने दलील दी कि यदि पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में खबर प्रकाशित करने से पहले उसी व्यक्ति से अनुमति या सहमति लेनी पड़े, तो भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जाँच प्रभावित हो सकती है।
याचिकाकर्ताओं ने कानून के उन प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं, जिनके तहत व्यक्तिगत डेटा के उपयोग, सहमति वापस लेने और डेटा मिटाने की माँग से संबंधित दायित्व उत्पन्न हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तत्काल अंतरिम रोक नहीं लगाई। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि नागरिकों की निजता की रक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच उचित संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
अब केंद्र सरकार को याचिका में उठाए गए सवालों पर अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा।
पत्रकारिता के लिए छूट की माँग क्यों?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और इससे संबंधित नियमों का उद्देश्य लोगों के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करना है। सामान्य तौर पर यह व्यवस्था व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल में पारदर्शिता, निर्धारित शर्तों के पालन और लोगों के अधिकारों पर जोर देती है।
लेकिन DNPA की मुख्य आपत्ति यह है कि कानून में जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता के लिए पर्याप्त और स्पष्ट छूट नहीं दी गई है।
समाचार संस्थानों का तर्क है कि पत्रकारिता में कई बार ऐसे लोगों से संबंधित जानकारी की जाँच करनी पड़ती है, जिन पर भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता, पद के दुरुपयोग या अन्य गंभीर आरोपों की पड़ताल की जा रही होती है।
यदि पत्रकार को जाँच के दौरान ही संबंधित व्यक्ति को सूचना देनी पड़े या उससे सहमति माँगनी पड़े, तो आरोपों की पुष्टि के लिए जरूरी दस्तावेज नष्ट किए जाने, गवाहों पर दबाव डाले जाने या जाँच को प्रभावित किए जाने का खतरा पैदा हो सकता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसी स्थिति खोजी पत्रकारिता को कमजोर कर सकती है और सार्वजनिक हित के मामलों को सामने लाने में बाधा बन सकती है।
प्रकाशित खबर हटाने का भी जताया डर
याचिका में व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल की सहमति वापस लेने और डेटा मिटाने से जुड़े प्रावधानों पर भी चिंता जताई गई है।
DNPA के अनुसार, यदि किसी समाचार में किसी व्यक्ति से संबंधित डिजिटल व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल हुआ है, तो संबंधित व्यक्ति सहमति वापस लेने या डेटा हटाने के अधिकार का हवाला देकर कार्रवाई की माँग कर सकता है।
प्रकाशकों को आशंका है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट अपवाद नहीं होने पर ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल जनहित में प्रकाशित खबरों को हटवाने या उनमें से महत्वपूर्ण तथ्यों को हटाने के लिए किया जा सकता है।
हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कानून के तहत हर प्रकाशित खबर अपने आप हटानी होगी। किसी विशेष मामले में क्या दायित्व लागू होगा, यह कानून के संबंधित प्रावधानों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसी कानूनी दायरे और पत्रकारिता पर उसके प्रभाव को लेकर विवाद है।
पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान का सवाल
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा है।
खोजी पत्रकारिता में कई बार सरकारी विभागों, कंपनियों या संस्थानों से जुड़े लोग अनियमितताओं की जानकारी पत्रकारों को देते हैं। कुछ मामलों में वे अपनी पहचान सार्वजनिक होने के डर से गोपनीयता की शर्त पर जानकारी साझा करते हैं।
DNPA ने कानून के तहत सरकार को जानकारी माँगने की मिलने वाली शक्तियों और उनसे जुड़े सुरक्षा उपायों पर सवाल उठाए हैं। संगठन की आशंका है कि पर्याप्त कानूनी सुरक्षा और निगरानी के अभाव में ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल समाचार संस्थानों के पास मौजूद जानकारी तक पहुँचने के लिए हो सकता है। इससे पत्रकारों और उनके सूत्रों की पहचान उजागर होने का जोखिम पैदा हो सकता है।
प्रकाशकों का तर्क है कि यदि सूचना देने वालों को अपनी पहचान उजागर होने का डर रहेगा, तो वे भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से जुड़ी जानकारी साझा करने से पीछे हट सकते हैं।
यह फिलहाल याचिकाकर्ताओं की कानूनी दलील और आशंका है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस विषय पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
RTI कानून में संशोधन भी चुनौती के दायरे में
याचिका में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 से जुड़े संशोधन पर भी सवाल उठाए गए हैं। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम की धारा 44(3) के माध्यम से RTI कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया गया था।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण से संबंधित पुराने प्रावधानों में निजता की सुरक्षा के साथ व्यापक जनहित को ध्यान में रखने की व्यवस्था थी। उनके अनुसार, संशोधित व्यवस्था से ऐसी जानकारी हासिल करना कठिन हो सकता है, जिसका सार्वजनिक महत्व हो।
इस मुद्दे का संबंध केवल पत्रकारों से नहीं, बल्कि उन नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी है जो सरकारी कामकाज में पारदर्शिता के लिए RTI का इस्तेमाल करते हैं।
अदालत को यह देखना होगा कि व्यक्तिगत निजता की रक्षा और सार्वजनिक हित में सूचना प्राप्त करने के अधिकार के बीच संवैधानिक संतुलन किस प्रकार बनाए रखा जा सकता है।
कानून कब लागू होगा?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के तहत व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। संबंधित नियम 2025 में अधिसूचित किए गए थे। प्रमुख अनुपालन प्रावधानों का एक बड़ा हिस्सा मई 2027 से प्रभावी होने की निर्धारित समय-सीमा से जुड़ा है।
इसी वजह से मीडिया संस्थान चाहते हैं कि कानून के विवादित प्रावधानों पर लागू होने से पहले स्पष्टता दी जाए और पत्रकारिता के लिए आवश्यक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
प्रकाशकों ने अदालत से संबंधित प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने और अंतरिम राहत देने की माँग की है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का पक्ष सुनने के बाद ही अदालत इस विवाद में आगे की दिशा तय करेगी।
आगे क्या होगा?
17 नवंबर 2026 को प्रस्तावित अगली सुनवाई में केंद्र सरकार के जवाब और याचिका में उठाए गए संवैधानिक सवालों पर आगे विचार होने की संभावना है।
इस मामले में मुख्य प्रश्न यह है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून को किस तरह लागू किया जाए, ताकि नागरिकों की निजता भी सुरक्षित रहे और स्वतंत्र पत्रकारिता तथा जनहित में जानकारी प्रकाशित करने का अधिकार भी प्रभावित न हो।
अभी सुप्रीम कोर्ट ने कानून को रद्द नहीं किया है और न ही विवादित प्रावधानों पर रोक लगाई है। इसलिए फिलहाल इसे कानून के खिलाफ अंतिम न्यायिक फैसला नहीं, बल्कि संवैधानिक चुनौती पर चल रही सुनवाई के रूप में देखा जाना चाहिए। डिजिटल प्राइवेसी कानून पर 21 न्यूज पब्लिशर्स की याचिका भारत में निजता, प्रेस की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला है। अब सबकी नजर 17 नवंबर की सुनवाई पर है, जहाँ केंद्र सरकार के जवाब के बाद मामले की आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।
India’s Supreme Court has issued a notice to the Centre on a petition filed by the Digital News Publishers Association (DNPA), representing 21 major news publishers, challenging provisions of the Digital Personal Data Protection Act, 2023. Media organisations, including Network18 and NDTV, have raised concerns about press freedom, investigative journalism, journalistic source confidentiality, data consent requirements and the right to information. The Supreme Court has not granted an interim stay, and the next hearing is scheduled for November 17, 2026.



















