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स्कूल में हिजाब पहनने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, यूनिफॉर्म को लेकर क्या कहा अदालत ने?

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AIN NEWS 1 प्रयागराज: स्कूल में हिजाब या हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की एक नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज करते हुए स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म नीति को बरकरार रखा। कोर्ट ने माना कि यदि किसी निजी स्कूल का ड्रेस कोड सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू है और उसके पीछे अनुशासन व संस्थागत एकरूपता बनाए रखने का उद्देश्य है, तो किसी एक छात्र को अपनी पसंद से यूनिफॉर्म में अतिरिक्त वस्त्र जोड़ने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

यह फैसला 21 अगस्त 2026 को जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने सुनाया। मामला टैगोर पब्लिक स्कूल, अतरसुइया, प्रयागराज की छात्रा सुकैना रिजवी से जुड़ा था। छात्रा ने कक्षा 11 में दाखिले के लिए स्कूल से यह अनुमति मांगी थी कि वह निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहन सके। स्कूल की ओर से इस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

कक्षा 11 में दाखिले के दौरान सामने आया विवाद

सुकैना रिजवी ने टैगोर पब्लिक स्कूल में कक्षा 6 से कक्षा 10 तक पढ़ाई की थी। छात्रा का कहना था कि वह इस दौरान स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनती रही और स्कूल प्रबंधन ने पहले कभी इस पर आपत्ति नहीं जताई।

दसवीं कक्षा पास करने के बाद जब उसने उसी स्कूल में कक्षा 11 में दाखिले की कोशिश की तो विवाद खड़ा हो गया। छात्रा चाहती थी कि उसे स्कूल की निर्धारित ड्रेस के साथ हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति भी दी जाए। स्कूल ने इसे अपनी यूनिफॉर्म नीति के विपरीत बताया।

मामला बढ़ने के बाद छात्रा की ओर से जिलाधिकारी के समक्ष भी शिकायत की गई। प्रशासनिक स्तर पर दोनों पक्षों की बात सुनी गई। स्कूल प्रबंधन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि यह एक सहशिक्षा वाला निजी स्कूल है और यहां अलग-अलग समुदायों के विद्यार्थी पढ़ते हैं। इसलिए सभी छात्रों के लिए एक समान ड्रेस कोड निर्धारित किया गया है।

छात्रा ने मौलिक अधिकारों का दिया हवाला

हाईकोर्ट में छात्रा की ओर से दलील दी गई कि वह स्कूल की यूनिफॉर्म बदलने की मांग नहीं कर रही है, बल्कि उसके साथ सिर पर स्कार्फ पहनना चाहती है। उसकी ओर से इसे धार्मिक आचरण, व्यक्तिगत गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(ए) समेत अन्य मौलिक अधिकारों का हवाला दिया गया।

छात्रा का यह भी पक्ष था कि वह कई वर्षों से स्कूल में इसी तरह पढ़ती आई है। इसलिए अचानक कक्षा 11 में पहुंचने पर उसे स्कार्फ छोड़ने के लिए कहना उचित नहीं है।

दूसरी ओर स्कूल और सरकार की ओर से कहा गया कि संस्थान निजी और गैर-सहायता प्राप्त है तथा उसकी निर्धारित यूनिफॉर्म नीति सभी छात्रों के लिए समान है। स्कूल के अनुसार ड्रेस कोड का उद्देश्य किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के बीच एकरूपता, अनुशासन और संस्थान की पहचान बनाए रखना है।

पहले रोक नहीं लगाई तो हमेशा की अनुमति नहीं

इस मामले में हाईकोर्ट की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी यह रही कि यदि स्कूल ने पहले किसी छात्रा के हेडस्कार्फ पहनने पर आपत्ति नहीं की, तो इससे उसे भविष्य के लिए स्थायी या कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।

अदालत ने कहा कि पिछली कक्षाओं में स्कूल की ओर से आपत्ति नहीं जताने के कई कारण हो सकते हैं। यह स्कूल की ओर से नीति लागू करने में ढिलाई, निष्क्रियता, इच्छाशक्ति की कमी, शिष्टाचार या किसी अन्य कारण से हो सकता है। लेकिन इससे स्कूल की यूनिफॉर्म नीति समाप्त नहीं हो जाती।

यानी कोर्ट ने साफ किया कि लंबे समय तक किसी नियम को लागू न करने का मतलब यह नहीं है कि संस्था भविष्य में भी उस नियम को लागू नहीं कर सकती।

कोर्ट ने हिजाब को लेकर क्या कहा?

फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अदालत के सामने छात्रा यह पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं कर सकी कि स्कूल में हेडस्कार्फ पहनना इस्लाम की ऐसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, जिसके बिना उसके धार्मिक विश्वास पर मूलभूत असर पड़ेगा।

अदालत ने इस संदर्भ में कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें स्कूल यूनिफॉर्म और हिजाब के विवाद पर ड्रेस कोड को महत्व दिया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस निर्णय को प्रभावशाली न्यायिक दृष्टांत माना। साथ ही अदालत ने यह भी नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट में हिजाब से संबंधित कर्नाटक मामले पर फैसला विभाजित रहा था और इस मुद्दे पर कोई अंतिम सर्वमान्य निर्णय सामने नहीं आया है।

इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने सामने मौजूद तथ्यों और लागू कानूनी सिद्धांतों के आधार पर स्कूल की यूनिफॉर्म नीति में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

स्कूल की एकरूपता को क्यों माना गया महत्वपूर्ण?

अदालत ने माना कि स्कूल केवल पढ़ाई कराने वाली जगह नहीं है, बल्कि वहां अनुशासन और संस्थागत व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी संस्थान ने सभी विद्यार्थियों के लिए एक समान ड्रेस कोड बनाया है और वह नीति भेदभावपूर्ण नहीं है, तो सामान्य तौर पर उसका पालन सभी विद्यार्थियों से कराया जा सकता है।

फैसले में यह भी कहा गया कि छात्र के व्यक्तिगत पहनावे के अधिकार और संस्था के अपने प्रशासनिक एवं प्रबंधन संबंधी अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है। जब दोनों के बीच टकराव हो, तो मामले के तथ्यों के आधार पर संस्था के व्यापक हित को भी ध्यान में रखना होगा।

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क्या इसका मतलब हर स्कूल में हिजाब पर पूर्ण प्रतिबंध है?

इस फैसले को यह कहकर समझना सही नहीं होगा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश के सभी स्कूलों में हिजाब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। अदालत का फैसला सामने आए विशेष मामले और संबंधित निजी स्कूल की यूनिफॉर्म नीति से जुड़ा है।

कोर्ट ने मूल रूप से यह देखा कि संबंधित स्कूल का ड्रेस कोड सभी विद्यार्थियों के लिए समान था, स्कूल निजी और गैर-सहायता प्राप्त था तथा छात्रा निर्धारित यूनिफॉर्म के अतिरिक्त हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति मांग रही थी। इसलिए अदालत ने उस स्कूल की नीति में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

याचिका खारिज, स्कूल की नीति बरकरार

सभी दलीलों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने छात्रा की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म नीति को लागू करने की अनुमति दी और यह माना कि पहले हेडस्कार्फ पहनने पर आपत्ति न किया जाना छात्रा को भविष्य में यूनिफॉर्म नीति से अलग व्यवस्था की मांग करने का स्वतः अधिकार नहीं देता।

इस फैसले के बाद स्कूलों में ड्रेस कोड, धार्मिक पहनावे और विद्यार्थियों के व्यक्तिगत अधिकारों को लेकर बहस एक बार फिर चर्चा में आ गई है। हालांकि, किसी भी समान मामले में अंतिम कानूनी स्थिति उसके अपने तथ्यों, स्कूल की मान्यता, ड्रेस कोड की प्रकृति और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर तय होगी।

नोट: यह खबर उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड और प्रकाशित कानूनी रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है। अदालत के फैसले को किसी समुदाय के खिलाफ सामान्य आदेश के रूप में नहीं समझना चाहिए। इस मामले में फैसला विशेष स्कूल की यूनिफॉर्म नीति और याचिका में प्रस्तुत तथ्यों पर आधारित है।

The Allahabad High Court Hijab Verdict 2026 concerns a student of Tagore Public School in Prayagraj who sought permission to wear a hijab or headscarf with the prescribed school uniform. The court upheld the school’s uniform policy and dismissed the petition, observing that a private unaided school can enforce a uniform dress code when it is uniform, bona fide and intended to maintain discipline and institutional identity. The Sukaina Rizvi hijab case has renewed discussion about school uniform rules, religious attire, fundamental rights and hijab in schools in India.

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