AIN NEWS 1 प्रयागराज: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत पीड़ितों को दी जाने वाली आर्थिक राहत राशि के इस्तेमाल और उसके वितरण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा है कि सरकार की यह योजना वास्तविक पीड़ितों को समय पर राहत देने के लिए है, लेकिन यदि कहीं इसका दुरुपयोग हो रहा है तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने झांसी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित अधिकारियों को मामले की निष्पक्ष जांच करने के निर्देश दिए। साथ ही पूरे उत्तर प्रदेश में SC/ST एक्ट के तहत दी जाने वाली राहत राशि के दावों और भुगतान की निगरानी के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है।
हालांकि, इस आदेश को लेकर एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। अदालत ने पूरे उत्तर प्रदेश की जांच तीन महीने में पूरी करने का आदेश नहीं दिया है। तीन महीने की समयसीमा झांसी से जुड़े विशेष मामले की जांच के लिए तय की गई है। पूरे प्रदेश के संबंध में अदालत ने व्यापक जांच और बेहतर निगरानी व्यवस्था के निर्देश दिए हैं।

झांसी के मामले से शुरू हुआ मामला
इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने यह मामला Arvind Kumar and 2 Others vs State of U.P. and 2 Others तथा संबंधित अपील Santosh Kumar Dohrey vs State of U.P. के रूप में आया था। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने की।
अदालत के सामने रखे गए तथ्यों के अनुसार, संतोष कुमार दोहरे और उनके परिवार के सदस्यों को अलग-अलग आपराधिक मामलों के संबंध में SC/ST नियमों के तहत आर्थिक राहत मिल चुकी थी। कुल राहत राशि करीब 23.36 लाख रुपये बताई गई।
इसके अलावा कई अन्य मामले भी ऐसे बताए गए जिनमें राहत राशि के लिए दावे किए गए थे या मामले जिला स्तरीय समिति के सामने लंबित थे।
राहत राशि से जुड़े इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने मामले की विस्तृत जांच की आवश्यकता महसूस की। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल बार-बार राहत राशि मिलना अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करता। इसी कारण मामले की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी मानी गई।
2 लाख रुपये की राहत पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान राहत राशि निर्धारित करने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल सामने आए। जांच अधिकारियों की ओर से संबंधित मामलों में प्रत्येक पीड़ित के लिए 2 लाख रुपये राहत की सिफारिश किए जाने की बात अदालत के सामने रखी गई।
SC/ST (Prevention of Atrocities) Rules के तहत कई मामलों में राहत राशि अलग-अलग चरणों में दिए जाने का प्रावधान है। सामान्य तौर पर राहत का एक हिस्सा FIR दर्ज होने के समय, दूसरा हिस्सा चार्जशीट दाखिल होने के बाद और शेष हिस्सा मामले में दोषसिद्धि होने के बाद दिया जाता है।
मामले में यह भी सामने आया कि जिला स्तर पर प्रत्येक पीड़ित को 75 हजार रुपये का भुगतान किया गया था। हाईकोर्ट ने राहत राशि के निर्धारण और भुगतान की प्रक्रिया पर कानूनी प्रावधानों के अनुसार विचार करने की बात कही।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि राहत का उद्देश्य पीड़ित को मुश्किल समय में आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। इसलिए पात्र व्यक्ति को नियमों के अनुसार राहत मिलने में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए।
झांसी के DM और SSP को जांच के निर्देश
हाईकोर्ट ने झांसी के जिलाधिकारी (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को आपसी समन्वय के साथ जांच करने का निर्देश दिया है।
जांच में यह देखा जाना है कि संबंधित व्यक्ति और उनके परिवार के सदस्यों की ओर से दर्ज कराए गए मामलों की वास्तविक स्थिति क्या थी, किन मामलों में राहत राशि दी गई, कितनी राशि जारी हुई और किन मामलों में राहत के लिए दावे किए गए।
अदालत ने इस जांच को हाईकोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से तीन महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया है।
इसका मकसद यह पता लगाना है कि राहत राशि नियमों के मुताबिक दी गई या नहीं और कहीं सरकारी धन के इस्तेमाल में अनियमितता तो नहीं हुई।
पूरे उत्तर प्रदेश में भी होगी व्यापक जांच
इस आदेश का सबसे अहम पहलू पूरे उत्तर प्रदेश से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को SC/ST एक्ट के तहत मिलने वाली राहत राशि की व्यवस्था पर व्यापक नजर रखने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक जिले में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे राहत राशि के दावों और उनके भुगतान की प्रभावी निगरानी हो सके।
खास तौर पर उन मामलों पर नजर रखने की जरूरत बताई गई है, जहां एक ही व्यक्ति या परिवार की ओर से बार-बार अलग-अलग मामलों में राहत राशि का दावा किया जा रहा हो।
इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे हर व्यक्ति को गलत या फर्जी मान लिया जाए। अदालत का जोर इस बात पर है कि सरकारी धन जारी करने से पहले नियमों के अनुसार उचित सत्यापन हो और वास्तविक पात्र व्यक्ति को ही योजना का लाभ मिले।
वास्तविक पीड़ितों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राहत योजना के मूल उद्देश्य को भी महत्वपूर्ण माना है। SC/ST अत्याचार निवारण कानून के तहत आर्थिक सहायता का प्रावधान पीड़ितों को तत्काल मदद देने के लिए बनाया गया है।
इसलिए जांच या निगरानी के नाम पर वास्तविक पीड़ितों को मिलने वाली वैधानिक राहत में बाधा नहीं आनी चाहिए।
अदालत का रुख मूल रूप से दो बातों के बीच संतुलन बनाने का है—एक तरफ वास्तविक पीड़ितों को समय पर सहायता मिले और दूसरी तरफ सरकारी खजाने का गलत इस्तेमाल न हो।
अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
अगर जांच के दौरान यह सामने आता है कि किसी मामले में गलत तरीके से राहत राशि जारी की गई या नियमों का पालन नहीं किया गया, तो जिम्मेदारी केवल लाभ लेने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगी।
राहत राशि स्वीकृत करने और जारी करने की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों या संबंधित प्राधिकरण की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। अनियमितता पाए जाने पर कानून और नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
यही वजह है कि हाईकोर्ट ने राहत राशि के दावों की जांच और भुगतान प्रक्रिया की निगरानी को गंभीरता से लेने की बात कही है।
तीन महीने वाली बात को ऐसे समझें
इस पूरे मामले में सोशल मीडिया या कुछ रिपोर्टों में यह बात सामने आ सकती है कि हाईकोर्ट ने “पूरे यूपी में तीन महीने के भीतर जांच” के आदेश दिए हैं। यह प्रस्तुति पूरी तरह सटीक नहीं है।
सही स्थिति यह है कि तीन महीने की समयसीमा झांसी के विशेष मामले की जांच के लिए है। वहीं पूरे उत्तर प्रदेश के लिए अदालत ने व्यापक जांच और प्रभावी निगरानी एवं नियमन व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया है।
इसलिए खबर का सही सार यह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SC/ST राहत राशि के संभावित दुरुपयोग को गंभीरता से लिया है और सरकारी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता तथा सत्यापन सुनिश्चित करने के लिए राज्य स्तर पर व्यापक कदम उठाने को कहा है।
सरकार और प्रशासन के लिए संदेश साफ
हाईकोर्ट के आदेश से यह संदेश स्पष्ट है कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र लोगों तक पहुंचना चाहिए। किसी भी योजना में यदि फर्जी दावा, गलत भुगतान या नियमों की अनदेखी सामने आती है तो उसकी जांच जरूरी है।
SC/ST राहत योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से और सामाजिक रूप से कठिन स्थिति से गुजर रहे पीड़ितों की मदद करना है। ऐसे में व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें जरूरतमंद व्यक्ति को राहत पाने में परेशानी न हो, लेकिन सरकारी धन के दुरुपयोग की गुंजाइश भी कम से कम रहे।
झांसी मामले की जांच अब यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि संबंधित मामलों में राहत राशि किस आधार पर दी गई और पूरी प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ या नहीं। वहीं राज्य स्तर पर निगरानी व्यवस्था मजबूत होने से भविष्य में ऐसे मामलों की पहचान और जांच पहले से बेहतर तरीके से की जा सकती है।
निष्कर्ष: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत मिलने वाली राहत राशि के संभावित दुरुपयोग को लेकर सख्त रुख अपनाया है। झांसी के मामले में DM और SSP को तीन महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया है, जबकि पूरे उत्तर प्रदेश में राहत राशि के दावों और भुगतान की व्यापक जांच तथा प्रभावी निगरानी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया गया है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि वास्तविक पीड़ितों को उनका अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन सरकारी खजाने के दुरुपयोग को किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
The Allahabad High Court has taken a strict view of the alleged misuse of financial relief provided under the SC/ST Act in Uttar Pradesh. The court directed the Jhansi District Magistrate and Senior Superintendent of Police to conduct an impartial inquiry into the specific case and complete it within three months. The court also emphasized the need for a stronger monitoring and regulatory mechanism across Uttar Pradesh to verify SC/ST relief claims and prevent misuse of government funds while ensuring that genuine victims continue to receive timely financial assistance.



















