AIN NEWS 1 लखनऊ: सरकारी स्कूल में व्याप्त कथित अव्यवस्थाओं और विद्यार्थियों की समस्याओं को अपनी रिपोर्ट के जरिए सामने लाने वाले पत्रकार अमित यादव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अहम आदेश दिया है। स्कूल की स्थिति को लेकर रिपोर्टिंग करने के कुछ ही दिनों बाद पत्रकार के खिलाफ दर्ज FIR पर अदालत ने फिलहाल आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया इस बात पर गंभीर टिप्पणी की कि यदि किसी सरकारी संस्थान की कमियां पत्रकारिता के माध्यम से सामने आती हैं तो उन कमियों को दूर करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी देखा कि रिपोर्टिंग के कुछ दिनों बाद ही पत्रकार के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया। इस परिस्थितियों को अदालत ने प्रथम दृष्टया प्रतिशोधात्मक कार्रवाई जैसा बताया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला लखनऊ के गोसाईंगंज क्षेत्र स्थित बेगरिया मऊ के सरकारी विद्यालय से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पत्रकार अमित यादव 20 अगस्त 2026 को पत्रकारिता के सिलसिले में स्कूल पहुंचे थे।
पत्रकार की ओर से अदालत में दाखिल याचिका में बताया गया कि स्कूल में विद्यार्थियों से जुड़ी कुछ बुनियादी सुविधाओं की स्थिति खराब थी। इनमें शौचालयों की खराब हालत और बच्चों के लिए पेयजल की समस्या प्रमुख रूप से सामने आई।
पत्रकार ने स्कूल की स्थिति को लेकर रिपोर्ट तैयार की और वहां मौजूद शिक्षकों से भी बातचीत की। इस रिपोर्ट के माध्यम से सरकारी स्कूल में विद्यार्थियों को मिल रही सुविधाओं और व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए गए।
रिपोर्टिंग के करीब चार दिन बाद, 24 अगस्त 2026 को पत्रकार अमित यादव के खिलाफ गोसाईंगंज थाने में FIR दर्ज की गई।
यही घटनाक्रम बाद में हाईकोर्ट के सामने पहुंचा।
पत्रकार के खिलाफ FIR में क्या आरोप लगाए गए?
पत्रकार की ओर से अदालत में FIR को चुनौती दी गई। दूसरी ओर, FIR में पत्रकार पर कुछ गंभीर आरोप लगाए गए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार शिकायत में आरोप लगाया गया कि पत्रकार बिना अनुमति स्कूल परिसर में दाखिल हुए और वहां की कक्षाओं में व्यवधान पैदा किया।
इसके अलावा FIR में यह भी आरोप लगाया गया कि पत्रकार ने दो महिला शिक्षकों पर स्कूल की स्थिति के संबंध में बोलने के लिए दबाव बनाया।
रिपोर्टों के अनुसार FIR में पत्रकार की रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक पूर्वाग्रह से जुड़े आरोप भी लगाए गए हैं।
हालांकि, इन आरोपों का अंतिम रूप से सही या गलत होना अभी अदालत द्वारा तय नहीं किया गया है। पत्रकार की ओर से इन आरोपों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया गया था।
हाईकोर्ट में क्या हुआ?
मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में हुई। न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ के समक्ष पत्रकार की याचिका पर सुनवाई हुई।
याचिका में पत्रकार की ओर से यह दलील दी गई कि उन्होंने केवल एक सरकारी स्कूल की स्थिति को लेकर पत्रकारिता की थी। रिपोर्ट में स्कूल में मौजूद कथित समस्याओं को सामने रखा गया था और रिपोर्टिंग के कुछ समय बाद उनके खिलाफ FIR दर्ज कर दी गई।
अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए प्रथम दृष्टया कार्रवाई को प्रतिशोधात्मक प्रकृति का माना।
कोर्ट की टिप्पणी का सार यह था कि अगर पत्रकार किसी सरकारी स्कूल में मौजूद कमियों को सामने लाता है तो प्रशासन का पहला दायित्व उन कमियों को ठीक करना होना चाहिए। समस्या को उजागर करने वाले पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई करना प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए।
‘Killing the messenger’ पर कोर्ट की टिप्पणी
इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “killing the messenger” है।
इसका सामान्य अर्थ है कि किसी समस्या की सूचना देने या समस्या को सामने लाने वाले व्यक्ति को ही निशाना बनाया जाए, जबकि मूल समस्या पर ध्यान न दिया जाए।
अदालत ने प्रथम दृष्टया इसी तरह की स्थिति की ओर संकेत किया। कोर्ट का नजरिया यह रहा कि यदि सरकारी स्कूल की सुविधाओं में कमी है और कोई पत्रकार उस कमी को सामने लाता है तो प्रशासन को यह देखना चाहिए कि समस्या वास्तव में मौजूद है या नहीं और अगर मौजूद है तो उसे कैसे दूर किया जाए।
इस टिप्पणी ने मामले को इसलिए भी महत्वपूर्ण बना दिया है क्योंकि यह पत्रकारिता और सरकारी संस्थानों की जवाबदेही से जुड़े सवालों से संबंधित है।
स्कूल की वर्तमान स्थिति पर भी कोर्ट ने मांगी रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने केवल FIR पर ही विचार नहीं किया, बल्कि उस सरकारी स्कूल की मौजूदा स्थिति को भी महत्वपूर्ण माना है।
अदालत ने बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने को कहा है। इसमें स्कूल की वर्तमान स्थिति की जानकारी देने के साथ-साथ स्कूल की तस्वीरें भी दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि अदालत स्कूल में बताई गई कमियों की वास्तविक स्थिति को भी रिकॉर्ड पर देखना चाहती है।
यानी मामला अब केवल यह सवाल नहीं रह गया है कि पत्रकार के खिलाफ FIR सही तरीके से दर्ज हुई या नहीं। अदालत के सामने स्कूल की वास्तविक स्थिति और वहां विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जा रही बुनियादी सुविधाओं का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है।
FIR रद्द नहीं हुई, कार्रवाई पर लगी रोक
इस मामले में एक कानूनी बात को समझना बेहद जरूरी है। हाईकोर्ट ने फिलहाल FIR को पूरी तरह रद्द नहीं किया है।
अदालत ने FIR के आधार पर पत्रकार के खिलाफ आगे की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल उस FIR के आधार पर पत्रकार के खिलाफ आगे कार्रवाई करने पर रोक रहेगी, जबकि मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे जारी रहेगी।
इसलिए इसे सीधे तौर पर “FIR रद्द” कहना सही नहीं होगा। सही बात यह है कि हाईकोर्ट ने FIR के आधार पर आगे की कार्रवाई पर रोक लगाई है।
पत्रकारिता और सरकारी जवाबदेही से जुड़ा अहम मामला
यह मामला केवल एक पत्रकार के खिलाफ FIR तक सीमित नहीं है। इसके जरिए यह बड़ा सवाल भी सामने आता है कि सरकारी स्कूलों और दूसरे सार्वजनिक संस्थानों की कमियों को उजागर करने वाली पत्रकारिता पर प्रशासन का रवैया कैसा होना चाहिए।
सरकारी स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा के साथ साफ-सफाई, शौचालय और सुरक्षित पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलना जरूरी है। यदि किसी स्कूल में इन सुविधाओं की कमी सामने आती है तो उसका समाधान किया जाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक मुद्दे की ओर संकेत करती है।
हालांकि, पत्रकारों को भी रिपोर्टिंग के दौरान संस्थानों में प्रवेश, रिकॉर्डिंग, शिक्षकों से बातचीत और अन्य कानूनी नियमों का ध्यान रखना होता है। इस मामले में पत्रकार के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम कानूनी स्थिति अदालत की आगे की सुनवाई में स्पष्ट होगी।
आगे क्या होगा?
अब बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव की ओर से स्कूल की वर्तमान स्थिति और तस्वीरों सहित हलफनामा दाखिल किया जाना महत्वपूर्ण होगा। इसके बाद अदालत मामले के तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर आगे की दिशा तय कर सकती है।
फिलहाल पत्रकार अमित यादव के खिलाफ दर्ज FIR के आधार पर आगे की कार्रवाई पर हाईकोर्ट की रोक इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण अंतरिम घटनाक्रम है।
लखनऊ के बेगरिया मऊ सरकारी स्कूल की कथित बदहाली को लेकर की गई पत्रकारिता के बाद पत्रकार अमित यादव के खिलाफ FIR दर्ज होने और फिर हाईकोर्ट द्वारा उस FIR के आधार पर आगे की कार्रवाई रोकने का मामला चर्चा में है।
अदालत ने प्रथम दृष्टया कार्रवाई को प्रतिशोधात्मक बताते हुए यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि सरकारी संस्थान की कमियों को उजागर करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन कमियों को दूर करने पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया।
अब स्कूल की मौजूदा स्थिति को लेकर विभाग की रिपोर्ट और तस्वीरें अदालत के सामने आने के बाद मामले की अगली दिशा और स्पष्ट होगी।
The Allahabad High Court Lucknow Bench has stayed further proceedings on an FIR registered against journalist Amit Yadav after his report highlighted alleged poor conditions at a government school in Begariya Mau, Gosainganj, Lucknow. The case involves allegations concerning damaged toilets, drinking water facilities and the manner of the journalist’s reporting. The court observed that the action appeared prima facie retaliatory and directed the Additional Chief Secretary of the Basic Education Department to submit a personal affidavit along with photographs showing the current condition of the school. The case has attracted attention because of the court’s “killing the messenger” observation concerning action against a journalist who reported alleged deficiencies in a government institution.



















