AIN NEWS 1 प्रयागराज: आशुतोष ब्रह्मचारी से जुड़े पॉक्सो मामले में अब जांच का दायरा और बढ़ गया है। विशेष पॉक्सो अदालत ने पहले से दर्ज FIR संख्या 58/2026 की जांच को व्यापक तरीके से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। अदालत के आदेश के बाद मामले में उपलब्ध दस्तावेजों, डिजिटल रिकॉर्ड और ऑडियो-विजुअल सामग्री को जांच का हिस्सा बनाए जाने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
इस मामले में मुकुंदानंद गिरि को निर्देश दिया गया है कि उनके पास मौजूद मामले से संबंधित दस्तावेजी, डिजिटल और ऑडियो-विजुअल साक्ष्य पुलिस को उपलब्ध कराए जाएं। अदालत के निर्देश का उद्देश्य जांच एजेंसी को मामले से जुड़े सभी संभावित साक्ष्यों तक पहुंच उपलब्ध कराना है, ताकि आरोपों और घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति की जांच की जा सके।
जनवरी 2026 में सामने आया था मामला
मामले की शुरुआत जनवरी 2026 में नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़े आरोपों के सामने आने के बाद हुई। आशुतोष ब्रह्मचारी की ओर से लगाए गए आरोपों के आधार पर मामले को अदालत के समक्ष रखा गया था। बाद में इस मामले में पुलिस जांच और अदालत की कार्यवाही शुरू हुई।
फरवरी 2026 में प्रयागराज की विशेष पॉक्सो अदालत ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य दंडी स्वामी प्रत्यक्त चैतन्य मुकुंदानंद गिरि के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और मामले की विस्तृत जांच के निर्देश दिए थे। उस समय अदालत के सामने पुलिस की ओर से प्रस्तुत जांच रिपोर्ट और कथित पीड़ितों के ऑडियो-वीडियो बयान भी चर्चा में रहे थे।
हालांकि, इस मामले में लगाए गए आरोपों को अदालत द्वारा दोष सिद्ध किया जाना नहीं माना जा सकता। आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
अब FIR 58/2026 में क्या हुआ?
ताजा घटनाक्रम में अदालत ने पहले से दर्ज FIR 58/2026 के दायरे को बढ़ाते हुए जांच को व्यापक बनाने का निर्देश दिया है। इसका मतलब यह है कि जांच केवल पहले से उपलब्ध सामग्री तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि मामले से संबंधित अन्य दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी जांच के दायरे में आ सकते हैं।
अदालत ने मुकुंदानंद गिरि से कहा है कि उनके पास उपलब्ध संबंधित सामग्री पुलिस को सौंपी जाए। इसमें दस्तावेजों के साथ-साथ डिजिटल फाइलें और ऑडियो-विजुअल रिकॉर्ड भी शामिल हैं।
आज के दौर में मोबाइल फोन, वीडियो रिकॉर्डिंग, ऑडियो क्लिप, सोशल मीडिया सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड किसी आपराधिक मामले की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में अदालत के इस निर्देश को जांच को अधिक व्यापक और तथ्यात्मक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पहले भी कोर्ट ने दिए थे विस्तृत जांच के निर्देश
फरवरी में मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया था। रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने माना था कि मामले की प्रकृति ऐसी है जिसमें पुलिस की विशेषज्ञ जांच आवश्यक है। कथित पीड़ितों के बयान भी न्यायिक प्रक्रिया के तहत दर्ज किए गए थे।
आशुतोष ब्रह्मचारी ने उस समय अदालत के आदेश पर संतोष जताया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा है और वह मामले में निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद करते हैं। दूसरी तरफ, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से आरोपों को खारिज करते हुए इन्हें साजिश बताया गया था।
मुकुंदानंद गिरि की भूमिका भी जांच के दायरे में
ताजा आदेश के बाद मुकुंदानंद गिरि से संबंधित उपलब्ध साक्ष्यों की भी जांच महत्वपूर्ण हो गई है। अदालत ने उन्हें संबंधित दस्तावेज और डिजिटल तथा ऑडियो-विजुअल सामग्री पुलिस को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
जांच एजेंसी अब इन सामग्रियों की सत्यता, स्रोत, समय और मामले से संबंध की जांच कर सकती है। इसके अलावा पुलिस जरूरत के अनुसार संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज कर सकती है और उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का परीक्षण कर सकती है।
यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी आपराधिक मामले में केवल आरोप या किसी एक पक्ष का बयान अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता। जांच के दौरान सामने आने वाले दस्तावेज, बयान, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और अन्य परिस्थितिजन्य तथ्य पूरे मामले की दिशा तय करते हैं।
विवाद अब और गहराया
मामला सामने आने के बाद से ही धार्मिक और सामाजिक हलकों में इसको लेकर चर्चा होती रही है। एक तरफ आशुतोष ब्रह्मचारी की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जबकि दूसरी तरफ आरोपों को लेकर संबंधित पक्ष ने अलग रुख अपनाया है।
इस विवाद के बीच अदालत का ताजा आदेश जांच के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब पुलिस को उपलब्ध कराए जाने वाले दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य जांच में नए तथ्य सामने ला सकते हैं।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि एफआईआर दर्ज होना या जांच का आदेश मिलना किसी व्यक्ति को अपराध का दोषी साबित नहीं करता। भारतीय कानून में किसी भी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जाता, जब तक अदालत में आरोप प्रमाणित न हो जाएं।
आगे क्या होगा?
अब पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ गई है। अदालत के निर्देश के अनुसार संबंधित दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और ऑडियो-विजुअल सामग्री जुटाकर उनका परीक्षण किया जा सकता है। जांच के दौरान पुलिस जरूरत के मुताबिक नए बयान दर्ज कर सकती है और उपलब्ध साक्ष्यों की तकनीकी जांच भी करा सकती है।
इसके बाद जांच से सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई करेगी। मामले में अदालत के सामने पेश होने वाली जांच रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल FIR 58/2026 में जांच का दायरा बढ़ने से यह मामला एक बार फिर चर्चा में है। आने वाले समय में पुलिस जांच से सामने आने वाले तथ्य यह स्पष्ट करेंगे कि आरोपों के समर्थन में कितने ठोस साक्ष्य मौजूद हैं और मामले में आगे किस दिशा में कार्रवाई होती है।
नोट: नाबालिगों से जुड़े यौन अपराध के मामलों में पीड़ितों की पहचान उजागर करना कानूनन प्रतिबंधित है। इसलिए इस खबर में किसी कथित पीड़ित की पहचान या ऐसी जानकारी प्रकाशित नहीं की गई है जिससे उसकी पहचान सामने आ सके।
The latest Ashutosh Brahmachari case update concerns FIR 58/2026, in which the POCSO Court has ordered a wider investigation. The court has directed Mukundanand Giri to provide relevant documentary, digital and audio-visual evidence to the police. The case relates to allegations involving minors reported in January 2026, and the investigation will now examine a broader range of evidence before further legal action is taken.



















