AIN NEWS 1 रामपुर: समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आजम खान की मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी एक बार फिर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के केंद्र में है। उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित इस विश्वविद्यालय के निर्माण में कथित वित्तीय अनियमितताओं, सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल और ट्रस्ट को मिले चंदे के स्रोतों की जांच की जा रही है। अक्टूबर 2026 में इस मामले में एक नया घटनाक्रम सामने आया, जब ईडी की शिकायत के आधार पर आजम खान, मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और अन्य संबंधित पक्षों के खिलाफ नई प्राथमिकी दर्ज की गई।
जांच एजेंसी का मुख्य सवाल यह है कि विश्वविद्यालय के भवनों के निर्माण पर जितना खर्च होने का अनुमान लगाया गया है, उसके मुकाबले ट्रस्ट ने अपने आयकर रिटर्न में बहुत कम पूंजीगत खर्च क्यों दिखाया। ईडी को संदेह है कि निर्माण कार्य में इस्तेमाल हुई कुछ रकम और संसाधनों का पूरा हिसाब उपलब्ध नहीं है। हालांकि, ये आरोप जांच का हिस्सा हैं और इन्हें अदालत में अंतिम रूप से साबित होना अभी बाकी है।
1. जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण खर्च में ₹416.14 करोड़ का अंतर
ईडी की जांच में सामने आए प्रमुख तथ्यों में विश्वविद्यालय के निर्माण खर्च और ट्रस्ट की ओर से घोषित पूंजीगत व्यय के बीच का अंतर शामिल है।
रिपोर्टों के मुताबिक, नवंबर 2023 की आयकर विभाग की मूल्यांकन रिपोर्ट में विश्वविद्यालय परिसर की इमारतों की निर्माण लागत लगभग ₹494.46 करोड़ आंकी गई थी। दूसरी ओर, वित्त वर्ष 2013-14 से 2024-25 तक के ट्रस्ट के आयकर रिटर्न में करीब ₹78.32 करोड़ का पूंजीगत खर्च दिखाए जाने की बात सामने आई है।
इन दोनों आंकड़ों के बीच लगभग ₹416.14 करोड़ का अंतर है। ईडी यह पता लगाने में जुटी है कि निर्माण कार्य पर खर्च हुई शेष रकम कहां से आई, उसका इस्तेमाल किस प्रकार किया गया और संबंधित वित्तीय लेन-देन का पूरा विवरण क्यों उपलब्ध नहीं है।
यह अंतर अपने आप में किसी व्यक्ति के दोषी होने का अंतिम प्रमाण नहीं है। जांच में यह स्पष्ट करना होगा कि वास्तविक खर्च कितना था, उसमें किन स्रोतों से धन आया और क्या किसी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधि से प्राप्त रकम का इस्तेमाल हुआ।
2. सरकारी धन और निर्माण सामग्री के इस्तेमाल पर सवाल
ईडी ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय के निजी परिसर में कुछ ऐसे निर्माण कार्य कराए गए, जिनके लिए सरकारी धन या सरकारी परियोजनाओं से जुड़े संसाधनों का इस्तेमाल हुआ।
जांच एजेंसी के मुताबिक, रामपुर में सरकारी ठेके हासिल करने वाली कुछ कंपनियों और ठेकेदारों के वित्तीय लेन-देन की भी पड़ताल की जा रही है। संदेह है कि सरकारी परियोजनाओं के लिए खरीदी गई निर्माण सामग्री का कुछ हिस्सा विश्वविद्यालय के निर्माण में लगाया गया।
मीडिया रिपोर्टों में एक ठेकेदार से जुड़े बयान का उल्लेख है। इसके अनुसार, वर्ष 2013-14 से 2016-17 के बीच संबंधित कंपनी को लगभग ₹186 करोड़ के सरकारी कार्य मिले थे। ईडी ने आरोप लगाया कि इन ठेकों से संबंधित रकम का एक हिस्सा विश्वविद्यालय के निर्माण में इस्तेमाल किया गया। एजेंसी के अनुमान के अनुसार, इस माध्यम से कम से कम ₹55.8 करोड़ की सामग्री या संसाधनों का इस्तेमाल होने की आशंका है।
इसके अलावा, विश्वविद्यालय परिसर में पंडाल, छात्रावास और अस्पताल से जुड़े कार्यों पर सरकारी धन खर्च किए जाने का भी मामला जांच के दायरे में है। इन परियोजनाओं के लिए करीब ₹23.41 करोड़ की मंजूरी का उल्लेख किया गया है।
ईडी ने विभिन्न मदों को मिलाकर लगभग ₹85.81 करोड़ के सरकारी धन या संसाधनों के कथित इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। अब जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि इन परियोजनाओं का वास्तविक लाभ किसे मिला और सरकारी धन के इस्तेमाल के लिए निर्धारित नियमों का पालन हुआ या नहीं।
3. जमीन के विवाद और पुराने मुकदमों की जांच
जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विवाद केवल वित्तीय लेन-देन तक सीमित नहीं रहे हैं। रामपुर में विश्वविद्यालय की जमीन और उसके आसपास की संपत्तियों को लेकर भी लंबे समय से विवाद सामने आते रहे हैं।
आरोपों में किसानों की जमीन पर कथित कब्जा, ग्राम समाज की जमीन से जुड़े विवाद और शत्रु संपत्ति के कथित अवैध इस्तेमाल जैसे मामले शामिल हैं। शत्रु संपत्ति उन संपत्तियों को कहा जाता है, जिन पर कानून के तहत केंद्र सरकार के अभिरक्षक का अधिकार होता है और जिनका प्रबंधन निर्धारित कानूनी प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, ईडी ने रामपुर में दर्ज कई प्राथमिकी और उनसे जुड़े मामलों को अपने मनी लॉन्ड्रिंग संबंधी परीक्षण का आधार बनाया है। इनमें अजीमनगर थाने में दर्ज मामले प्रमुख हैं।
हालांकि, जमीन से जुड़े प्रत्येक मामले की कानूनी स्थिति अलग हो सकती है। किसी जमीन को लेकर शिकायत दर्ज होना, उस पर प्रशासनिक कार्रवाई होना और अदालत द्वारा आरोप साबित किया जाना तीन अलग-अलग स्थितियां हैं। इसलिए सभी विवादों को एक ही निष्कर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
4. ट्रस्ट को मिले चंदे के स्रोत भी जांच के दायरे में
मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट विश्वविद्यालय का संचालन करता है। आजम खान इस ट्रस्ट के संस्थापक और प्रमुख ट्रस्टी के रूप में जुड़े रहे हैं। ईडी अब ट्रस्ट को मिले चंदे, दानदाताओं की पहचान और बैंक खातों में हुए लेन-देन की भी जांच कर रही है।
जांच एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि विश्वविद्यालय के निर्माण और दूसरे कार्यों के लिए जुटाई गई रकम किन स्रोतों से आई थी। यह भी जांचा जा रहा है कि क्या सरकारी ठेके हासिल करने वाली कुछ कंपनियों ने ट्रस्ट को दान दिया और यदि ऐसा हुआ, तो इन लेन-देन के पीछे कोई अनुचित वित्तीय संबंध था या नहीं।
मीडिया रिपोर्टों में ट्रस्ट के रिकॉर्ड में दर्ज दान और कुछ दानदाताओं से जुड़े वित्तीय लेन-देन पर सवाल उठाए जाने का उल्लेख है। ईडी यह भी देख रही है कि दान के रूप में दिखाई गई रकम वास्तविक थी या उसके स्रोत और उपयोग को लेकर कोई अनियमितता हुई।
इस मामले में आयकर विभाग की कार्रवाई और ट्रस्ट के कर संबंधी रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, चंदे की किसी रकम को फर्जी या अवैध बताने के लिए संबंधित दस्तावेजों और जांच के निष्कर्षों का परीक्षण आवश्यक है।
5. गरीब परिवारों के मकानों और मलबे से जुड़े आरोप
जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े पुराने विवादों में रामपुर के कुछ परिवारों के मकानों को गिराए जाने और निर्माण सामग्री के इस्तेमाल के आरोप भी सामने आए थे। उपलब्ध विवरणों में दावा किया गया है कि वर्ष 2016 में कुछ गरीब परिवारों के मकान तोड़े गए और उनसे निकले मलबे का उपयोग विश्वविद्यालय परिसर के निर्माण में किया गया।
इन आरोपों को भी अन्य जमीन और निर्माण संबंधी विवादों के संदर्भ में देखा जाता रहा है। लेकिन किसी विशेष कार्रवाई में किसकी भूमिका थी, किस आदेश के तहत मकान तोड़े गए और मलबे का इस्तेमाल कहां हुआ, इसका निर्धारण संबंधित रिकॉर्ड और न्यायिक निष्कर्षों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
जौहर यूनिवर्सिटी का विवाद कैसे बढ़ा?
मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना का विचार वर्ष 2004 के आसपास सामने आया था। इसके बाद ट्रस्ट का गठन हुआ और विश्वविद्यालय की स्थापना तथा उसे निजी विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। वर्ष 2006 में विश्वविद्यालय की स्थापना से जुड़ा काम शुरू हुआ।
वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद विश्वविद्यालय से संबंधित गतिविधियों और विकास कार्यों को गति मिली। आजम खान उस समय राज्य सरकार में मंत्री थे और विश्वविद्यालय के संचालन से जुड़े ट्रस्ट में उनकी प्रमुख भूमिका थी।
वर्ष 2017 में राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद जमीन और निर्माण से संबंधित शिकायतों की जांच तेज हुई। किसानों की जमीन, सरकारी भूमि और अन्य संपत्तियों को लेकर कई मुकदमे दर्ज हुए। वर्ष 2019 के दौरान भी विश्वविद्यालय और ट्रस्ट से संबंधित विवादों ने कानूनी तथा राजनीतिक स्तर पर ध्यान आकर्षित किया।
इसके बाद विभिन्न प्रशासनिक कार्रवाइयों, भूमि संबंधी मुकदमों और न्यायालयों में चली कार्यवाही के कारण विश्वविद्यालय लगातार चर्चा में बना रहा। अब वर्ष 2026 में निर्माण लागत और घोषित खर्च के बीच कथित बड़े अंतर को लेकर ईडी की जांच ने मामले को एक नया आयाम दे दिया है।
ED की जांच में आगे क्या होगा?
अक्टूबर 2026 में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, ईडी ने आजम खान से रामपुर जेल में पूछताछ की और वित्तीय लेन-देन तथा चंदे के स्रोतों से जुड़े सवाल किए। इसके बाद निर्माण खर्च में कथित अंतर और सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर नई प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी सामने आई।
अब जांच एजेंसी को संबंधित बैंक खातों, आयकर रिटर्न, ठेकेदारों के रिकॉर्ड, भुगतान के दस्तावेजों और निर्माण कार्यों से जुड़े साक्ष्यों का मिलान करना होगा। इसके आधार पर यह तय करने की कोशिश की जाएगी कि रकम का वास्तविक स्रोत क्या था और क्या धनशोधन रोकथाम कानून के तहत कार्रवाई के लिए आवश्यक साक्ष्य मौजूद हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी संपत्ति को कुर्क करना, उसका भौतिक कब्जा लेना और किसी मामले में प्राथमिकी दर्ज करना अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। उपलब्ध रिपोर्टों से नई एफआईआर और जांच की पुष्टि होती है, लेकिन ₹426.46 करोड़ की संपत्ति पर कब्जे तथा ₹1,170 करोड़ के बाजार मूल्य के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी का मामला अब जमीन संबंधी पुराने विवादों के साथ-साथ वित्तीय लेन-देन और निर्माण लागत की जांच के कारण भी महत्वपूर्ण हो गया है। ईडी का आरोप है कि विश्वविद्यालय के निर्माण में इस्तेमाल हुई रकम का पूरा हिसाब घोषित खर्च से मेल नहीं खाता और सरकारी धन या संसाधनों के इस्तेमाल की भी जांच जरूरी है।
आने वाले समय में जांच एजेंसी की रिपोर्ट, दस्तावेजी साक्ष्य और अदालतों में होने वाली कार्यवाही से मामले की वास्तविक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल, आरोपों और सिद्ध तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। आजम खान, ट्रस्ट और अन्य संबंधित पक्षों के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निकाला जा सकता है।
The Enforcement Directorate (ED) is investigating alleged financial irregularities involving Mohammad Ali Jauhar University in Rampur, Uttar Pradesh, and the Maulana Mohammad Ali Jauhar Trust associated with Samajwadi Party leader Azam Khan. The investigation focuses on an alleged ₹416.14 crore gap between the assessed construction cost of the university buildings and the capital expenditure reported in the trust’s income tax returns. Investigators are also examining suspected diversion of government resources, contractor payments, land-related cases and donations received by the trust. The latest developments include a fresh FIR in October 2026. The allegations remain subject to investigation and judicial proceedings.



















