AIN NEWS 1 मुंबई/गोवा। देशभर में साइबर ठगी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एक बड़े नेटवर्क की जांच के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मुंबई के एक वकील को गिरफ्तार किया है। आरोपी की पहचान रशेश भारतकुमार उपाध्याय उर्फ रशेश शाह के रूप में हुई है। जांच एजेंसी का आरोप है कि वह साइबर ठगी से जुड़े नेटवर्क के उन बैंक खातों को दोबारा चालू कराने में मदद करता था, जिन्हें शिकायतों और जांच के बाद फ्रीज कर दिया गया था।
ED के अनुसार, इस मामले में करीब 28,000 करोड़ रुपये के बैंकिंग लेनदेन की जानकारी सामने आई है। नेटवर्क से जुड़े मामलों का दायरा 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बताया गया है। जांच एजेंसी का दावा है कि इस नेटवर्क का संबंध 300 से अधिक पीड़ितों की शिकायतों और 160 से ज्यादा FIR से सामने आया है।
यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जांच केवल साइबर ठगी करने वालों तक सीमित नहीं है। एजेंसी कथित तौर पर ठगी की रकम को अलग-अलग बैंक खातों और कंपनियों के माध्यम से स्थानांतरित करने तथा फ्रीज खातों को दोबारा चालू कराने की प्रक्रिया की भी पड़ताल कर रही है।
मुंबई एयरपोर्ट से हुई गिरफ्तारी
ED के पणजी जोनल कार्यालय ने रशेश उपाध्याय को 24 अक्टूबर 2026 को मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर गिरफ्तार किया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वह मुंबई से दिल्ली जाने वाली कनेक्टिंग फ्लाइट से रवाना होने की कोशिश कर रहा था। इसी दौरान उसे बोर्डिंग गेट के पास रोक लिया गया।
इस कार्रवाई में मुंबई कस्टम्स और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) ने सहयोग किया। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को गोवा में धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) से संबंधित विशेष अदालत में पेश किया गया।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने आरोपी को 29 अक्टूबर 2026 तक ED की हिरासत में भेजा था। हिरासत के दौरान जांच एजेंसी को उससे कथित बैंकिंग लेनदेन, बिचौलियों और फ्रीज खातों को खुलवाने में निभाई गई भूमिका के संबंध में पूछताछ करनी थी।
यह इस मामले में सातवीं गिरफ्तारी बताई गई है।
क्या है 28,000 करोड़ रुपये के लेनदेन का मामला?
जांच में सामने आया कथित नेटवर्क कई स्तरों पर काम करता था। ED के मुताबिक, साइबर ठगी से हासिल रकम को अलग-अलग बैंक खातों के माध्यम से आगे भेजा जाता था। इसके लिए कथित तौर पर बड़ी संख्या में ऐसे बैंक खातों का इस्तेमाल किया गया, जिनका उपयोग वास्तविक लाभार्थियों की पहचान छिपाने के लिए किया जाता है।
ऐसे खातों को आम तौर पर म्यूल बैंक अकाउंट कहा जाता है। इनका इस्तेमाल ठगी से प्राप्त रकम को एक खाते से दूसरे खाते में स्थानांतरित करने और पैसों के वास्तविक स्रोत तक पहुंचना मुश्किल बनाने के लिए किया जा सकता है।
एजेंसी की जांच में 400 से अधिक म्यूल बैंक खातों के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया है। इसके बाद रकम के कमोडिटी, ट्रैवल और विदेशी मुद्रा कारोबार से जुड़ी कंपनियों तक पहुंचने की बात सामने आई है।
जांच एजेंसी के अनुसार, इन कंपनियों पर कथित तौर पर फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सय्यद का नियंत्रण था। आरोप है कि कंपनियों के संचालन में डमी निदेशकों का इस्तेमाल किया जाता था। इन सभी पहलुओं की जांच के जरिए एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि ठगी से हासिल रकम कहां से आई और किन-किन लोगों या संस्थाओं तक पहुंची।
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए: 28,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा कथित नेटवर्क के कुल बैंकिंग लेनदेन से संबंधित है। इसे सीधे तौर पर पीड़ितों से ठगी गई कुल रकम नहीं माना जाना चाहिए।
2.6 करोड़ रुपये की डिजिटल अरेस्ट ठगी से जुड़ा मामला
ED की जांच की शुरुआत गोवा पुलिस द्वारा दर्ज एक FIR से जुड़ी बताई गई है। मामला कथित डिजिटल अरेस्ट ठगी का है, जिसमें गोवा के एक दंपति को निशाना बनाया गया था।
आरोप है कि साइबर अपराधियों ने खुद को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का अधिकारी बताकर दंपति को डराया। उन्हें कथित तौर पर वीडियो निगरानी में रखा गया और सुप्रीम कोर्ट के एक फर्जी आदेश का इस्तेमाल करके दबाव बनाया गया।
इसके बाद दंपति से लगभग 2.6 करोड़ रुपये ऐसे बैंक खातों में स्थानांतरित कराए जाने का आरोप है, जिन्हें कथित तौर पर गोपनीय निगरानी से जुड़े खाते बताया गया था।
इस तरह के अपराध में ठग सरकारी जांच, गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर लोगों को मानसिक दबाव में लेते हैं। फिर उनसे पैसे ट्रांसफर करने को कहते हैं। हालांकि, इस मामले में सामने आए विशिष्ट आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
फ्रीज बैंक खातों को खुलवाने में क्या थी आरोपी की भूमिका?
इस मामले का एक अहम पहलू उन बैंक खातों को दोबारा चालू कराने का आरोप है, जिन्हें साइबर ठगी की शिकायतों के बाद फ्रीज किया गया था।
ED के मुताबिक, रशेश उपाध्याय कथित तौर पर बिचौलियों के जरिए संबंधित अधिकारियों तक नकद रिश्वत पहुंचाने की व्यवस्था करता था। जांच एजेंसी यह भी पता लगा रही है कि रिश्वत की रकम किससे जुटाई जाती थी, उसे किन माध्यमों से पहुंचाया जाता था और बैंक खातों को दोबारा चालू कराने में किन लोगों की भूमिका थी।
मीडिया रिपोर्ट में एजेंसी के हवाले से लगभग 100 बैंक खातों को अनफ्रीज कराने की व्यवस्था किए जाने का उल्लेख है। एक मामले में 60 लाख रुपये से अधिक के भुगतान का भी जिक्र किया गया है।
इन आरोपों की जांच में कथित बिचौलियों, धन के स्रोत और बैंक खातों को दोबारा चालू कराने की प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर खाते को खुलवाने में एक ही तरीका अपनाया गया था या सभी संबंधित व्यक्तियों की भूमिका समान थी।
20 राज्यों में 300 से अधिक शिकायतें
ED के अनुसार, जांच के दायरे में आए बैंक खातों का संबंध देश के 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज 300 से अधिक पीड़ितों की शिकायतों और 160 से अधिक FIR से मिला है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इन मामलों में 400 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान की सूचना है। यह आंकड़ा अलग-अलग शिकायतों और मामलों में बताए गए नुकसान से संबंधित है, जबकि 28,000 करोड़ रुपये कथित नेटवर्क के बैंकिंग लेनदेन का आंकड़ा है।
दोनों आंकड़ों का अंतर समझना जरूरी है। बैंक खातों के माध्यम से बड़ी रकम का बार-बार स्थानांतरण होने पर कुल लेनदेन का आंकड़ा वास्तविक ठगी की रकम से काफी अधिक हो सकता है। इसलिए कुल बैंकिंग कारोबार को सीधे पीड़ितों की आर्थिक क्षति बताना भ्रामक होगा।
आगे क्या करेगी ED?
जांच एजेंसी के सामने अब कई महत्वपूर्ण सवाल हैं। इनमें कथित रिश्वतखोरी में शामिल लोगों की पहचान करना, बैंक खातों को फ्रीज और अनफ्रीज करने की प्रक्रिया की जांच करना, संदिग्ध कंपनियों के वास्तविक लाभार्थियों का पता लगाना और ठगी से हासिल रकम के अंतिम गंतव्य का पता लगाना शामिल है।
एजेंसी यह भी जांच सकती है कि अलग-अलग राज्यों में दर्ज शिकायतों और FIR का इस नेटवर्क से किस प्रकार संबंध है। बैंकिंग रिकॉर्ड, कंपनियों के दस्तावेज, डिजिटल साक्ष्य और बिचौलियों से जुड़े वित्तीय लेनदेन इस जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
मामले में सात गिरफ्तारियों का उल्लेख सामने आया है, लेकिन उपलब्ध जानकारी से सभी आरोपियों की पूरी भूमिका या अंतिम कानूनी स्थिति का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
आम लोगों के लिए क्या है सबक?
यह मामला साइबर ठगी के बाद बैंक खातों और पैसों की आवाजाही पर समय रहते कार्रवाई करने के महत्व को भी सामने लाता है। यदि किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन ठगी होती है, तो उसे तुरंत अपने बैंक को सूचना देनी चाहिए और राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। शिकायत को आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in पर भी दर्ज किया जा सकता है।
किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर अपना बैंक खाता, ATM कार्ड, OTP या इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए। इसी तरह, यदि कोई व्यक्ति फ्रीज बैंक खाता खुलवाने या पुलिस कार्रवाई रुकवाने के नाम पर रिश्वत अथवा नकद भुगतान मांगता है, तो उसकी सूचना संबंधित बैंक और जांच एजेंसी को देना उचित है।
मुंबई के वकील रशेश भारतकुमार उपाध्याय की गिरफ्तारी और करीब 28,000 करोड़ रुपये के कथित बैंकिंग लेनदेन से जुड़े नेटवर्क की जांच की पुष्टि ED की आधिकारिक जानकारी से होती है। हालांकि, आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं। 28,000 करोड़ रुपये को सीधे ठगी की रकम बताना सही नहीं होगा। मामले में आगे की जांच से नेटवर्क की वास्तविक संरचना और इसमें शामिल लोगों की भूमिका स्पष्ट हो सकेगी।
The Enforcement Directorate (ED) has arrested Mumbai-based advocate Rashesh Bharatkumar Upadhyay, also known as Rashesh Shah, in an alleged cyber fraud and money laundering investigation. The case involves approximately ₹28,000 crore in banking transactions, more than 300 victim complaints and over 160 FIRs across 20 states and Union Territories. Investigators allege that the accused helped facilitate the unfreezing of around 100 bank accounts through intermediaries and alleged cash bribes. The investigation also examines mule bank accounts, suspicious companies and the movement of funds linked to cyber fraud.



















