AIN NEWS 1 नई दिल्ली: जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कथित ‘बर्न्ट कैश’ विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने और कोर्ट की निगरानी में विशेष जांच दल (SIT) से जांच कराने की मांग की गई थी। अदालत ने याचिका को “Publicity Interest Litigation” बताया। इस मामले की सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की पीठ ने की।
हालांकि, इस फैसले को लेकर एक बात साफ समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा को ‘बर्न्ट कैश’ विवाद में क्लीन चिट नहीं दी है। अदालत के सामने इस बार सवाल मुख्य रूप से FIR और SIT जांच की मांग वाली याचिका का था। इसलिए इस आदेश को पूरे मामले के आरोपों पर अंतिम फैसला मानना सही नहीं होगा।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला?
7 अगस्त 2026 को अधिवक्ता घनश्याम दयालु उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर मिले जले और अधजले नोटों के मामले में FIR दर्ज कराई जाए और जांच के लिए कोर्ट की निगरानी में SIT गठित की जाए।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि जस्टिस वर्मा ने अप्रैल 2026 में इस्तीफा दे दिया है, इसलिए उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई को लेकर पहले जैसी न्यायिक सुरक्षा का सवाल नहीं रहना चाहिए। याचिका में कथित नकदी की स्वतंत्र आपराधिक जांच की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इस मांग पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि इसी विवाद से संबंधित आपराधिक कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाएं पहले भी उसके सामने आ चुकी हैं। इसी पृष्ठभूमि में मौजूदा याचिका को अदालत ने “Publicity Interest Litigation” कहा और खारिज कर दिया।
मार्च 2025 में कैसे शुरू हुआ था विवाद?
जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा यह विवाद 14 मार्च 2025 की रात शुरू हुआ था। उस समय वह दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे। उनके सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान आवास से जुड़े एक स्टोर या आउटहाउस में कथित तौर पर बड़ी संख्या में जले और अधजले नोट मिलने की बात सामने आई।
घटना के बाद इस मामले ने तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा पकड़ ली। नकदी के स्रोत और उसके आवास तक पहुंचने को लेकर सवाल उठे। जस्टिस वर्मा ने किसी भी तरह की गलत भूमिका से इनकार किया और कहा कि उन्हें कथित नकदी के बारे में जानकारी नहीं थी।
घटना की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन CJI संजय खन्ना ने 22 मार्च 2025 को तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच समिति गठित की। समिति को मामले के तथ्यों की जांच करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके बाद जस्टिस वर्मा का दिल्ली हाई कोर्ट से उनके मूल हाई कोर्ट यानी इलाहाबाद हाई कोर्ट में तबादला कर दिया गया और उन्हें न्यायिक काम से अलग रखा गया।
इन-हाउस कमेटी ने क्या कहा था?
इस मामले में गठित इन-हाउस समिति ने बाद में अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा और उनके परिवार के कथित तौर पर उस स्टोर रूम पर “tacit or active control” यानी अप्रत्यक्ष या सक्रिय नियंत्रण से संबंधित निष्कर्ष दर्ज किए थे। समिति ने कथित misconduct को गंभीर बताते हुए उनके खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की बात कही थी।
इस रिपोर्ट के बाद तत्कालीन CJI संजीव खन्ना ने मामले को आगे की संवैधानिक प्रक्रिया के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के समक्ष भेजा। इसके बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद में हटाने की प्रक्रिया शुरू करने का रास्ता खुला।
यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि इन-हाउस जांच कोई आपराधिक ट्रायल नहीं थी। इसका उद्देश्य न्यायिक आचरण और संस्थागत जवाबदेही से जुड़े आरोपों की जांच करना था। बाद में इसी मामले से जुड़े अलग-अलग कानूनी सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने भी आए।
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जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दी थी चुनौती
जस्टिस वर्मा ने इन-हाउस जांच की प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि जांच प्रक्रिया में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ और उनके खिलाफ निष्कर्ष पर्याप्त ठोस प्रमाणों पर आधारित नहीं थे।
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2025 में उनकी चुनौती खारिज कर दी थी। इस मामले में अदालत ने इन-हाउस प्रक्रिया को असंवैधानिक मानने से इनकार किया।
इसलिए मौजूदा FIR वाली याचिका को समझने के लिए यह पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण है। मामला पहले ही न्यायपालिका की आंतरिक जांच और बाद में संसद की जांच प्रक्रिया तक पहुंच चुका था।
अप्रैल 2026 में जस्टिस वर्मा ने दिया इस्तीफा
विवाद के बीच अप्रैल 2026 में जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया। उन्होंने अपने इस्तीफे में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अपनी पीड़ा और असहमति जाहिर की थी।
इस्तीफे के बाद यह सवाल भी उठा कि क्या उनके खिलाफ चल रही संसदीय जांच आगे जारी रह सकती है। उस समय उपलब्ध रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि राष्ट्रपति द्वारा इस्तीफा स्वीकार किए जाने की स्थिति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी।
इसी संदर्भ को लेकर FIR की मांग करने वाले याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि इस्तीफे के बाद आपराधिक जांच का रास्ता खुलना चाहिए।
संसद की जांच समिति ने भी सौंपी रिपोर्ट
जस्टिस वर्मा प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम 18 मई 2026 को हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित Judges Inquiry Committee ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी।
लोकसभा सचिवालय की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यह समिति Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत गठित की गई थी। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार ने की। उनके साथ बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्री चंद्रशेखर और कर्नाटक हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य समिति में शामिल थे। समिति का गठन 12 अगस्त 2025 को किया गया था।
लोकसभा सचिवालय ने कहा था कि रिपोर्ट को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जाएगा। जुलाई 2026 में भी रिपोर्ट को संसद के मानसून सत्र में रखने की जानकारी सामने आई थी।
क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जस्टिस वर्मा को क्लीन चिट मिल गई?
नहीं। यह समझना सबसे जरूरी है।
7 अगस्त 2026 का सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल उस याचिका से संबंधित है जिसमें FIR और कोर्ट-मॉनिटर SIT जांच की मांग की गई थी। अदालत ने याचिका को स्वीकार नहीं किया और इसे “Publicity Interest Litigation” बताते हुए खारिज कर दिया।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने कथित नकदी से जुड़े आरोपों को झूठा घोषित कर दिया। न ही इस आदेश को जस्टिस वर्मा के खिलाफ पहले की इन-हाउस या संसदीय जांच की रिपोर्ट पर अंतिम न्यायिक फैसला माना जा सकता है।
इसी तरह यह कहना भी गलत होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने FIR की जांच करके उसे गलत पाया। FIR और SIT जांच की मांग वाली याचिका ही अदालत ने आगे सुनने से इनकार कर दी।
अब इस मामले की स्थिति क्या है?
फिलहाल इस विवाद में कई अलग-अलग प्रक्रियाओं को एक साथ समझना जरूरी है। मार्च 2025 में आग लगने के बाद कथित नकदी मिलने से विवाद शुरू हुआ। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच हुई। जस्टिस वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट किया गया। इन-हाउस समिति के निष्कर्षों के बाद संसद में न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया से जुड़ी कार्रवाई आगे बढ़ी।
अप्रैल 2026 में जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दिया और मई 2026 में संसद की जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी। इसके बाद अब 7 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने FIR और SIT जांच की मांग वाली नई याचिका खारिज कर दी है।
जस्टिस यशवंत वर्मा के कथित ‘बर्न्ट कैश’ मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला FIR और SIT जांच की मांग वाली याचिका तक सीमित है। अदालत ने याचिका को “Publicity Interest Litigation” बताते हुए खारिज किया है। लेकिन इसे जस्टिस वर्मा को पूरे मामले में क्लीन चिट के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
AIN NEWS 1 के लिए सबसे सटीक निष्कर्ष यही है:
“सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के कथित बर्न्ट कैश मामले में FIR और कोर्ट-मॉनिटर SIT जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने इसे Publicity Interest Litigation बताया, लेकिन इस आदेश को जस्टिस वर्मा को पूरे मामले में क्लीन चिट माना जाना सही नहीं है।”
The Justice Yashwant Varma burnt cash case has taken another turn after the Supreme Court dismissed a plea seeking an FIR and court-monitored SIT probe into the alleged cash discovery at his official residence. A bench of Justices P.S. Narasimha and Alok Aradhe described the petition as a “publicity interest litigation.” The controversy began in March 2025 after burnt and partially burnt currency was reportedly found during firefighting operations at Justice Varma’s official residence. The matter subsequently went through an in-house judicial inquiry and a Judges Inquiry Committee constituted under the Judges (Inquiry) Act, 1968. The latest Supreme Court order does not amount to a clean chit to Justice Yashwant Varma and relates specifically to the FIR and SIT plea.



















