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लखनऊ में वेंटिलेटर के इंतजार में बुजुर्ग की मौत: सिस्टम की लापरवाही या स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई?

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AIN NEWS 1: राजधानी लखनऊ में स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच एक बार फिर एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने सिस्टम की संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गोरखपुर से इलाज की उम्मीद लेकर आए 65 वर्षीय बुजुर्ग पारसनाथ पांडेय को समय पर वेंटिलेटर नहीं मिल सका और आखिरकार उन्होंने अस्पताल के बाहर एंबुलेंस में ही दम तोड़ दिया। यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की खामियों को उजागर करती है।

🚑 डेढ़ घंटे तक एंबुलेंस में तड़पते रहे मरीज

देवरिया निवासी पारसनाथ पांडेय लंबे समय से सांस और लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। बुधवार सुबह उनके परिजन उन्हें बेहतर इलाज की उम्मीद में लखनऊ के केजीएमयू (किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी) लेकर पहुंचे। लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी हालात नहीं सुधरे।

परिजनों का आरोप है कि मरीज को करीब एक घंटे तक एंबुलेंस में ही इंतजार करना पड़ा। इस दौरान उनकी हालत लगातार बिगड़ती रही, लेकिन अस्पताल में वेंटिलेटर उपलब्ध न होने की बात कहकर उन्हें बलरामपुर अस्पताल रेफर कर दिया गया।

🏥 दूसरे अस्पताल में भी राहत नहीं

करीब 12:30 बजे परिजन मरीज को लेकर बलरामपुर अस्पताल पहुंचे। यहां भी हालात कुछ बेहतर नहीं थे। मरीज के बेटे चंद्रप्रकाश ने बताया कि इमरजेंसी में पहले कागजी प्रक्रिया पूरी करने में ही लगभग आधा घंटा लग गया।

जब तक मरीज को आईसीयू में शिफ्ट कर वेंटिलेटर सपोर्ट दिया गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पारसनाथ पांडेय की हालत इतनी बिगड़ चुकी थी कि डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके और उन्होंने दम तोड़ दिया।

👨‍⚕️ अफसरों की मौजूदगी के बावजूद नहीं मिली मदद

इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि जब मरीज एंबुलेंस में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा था, उस समय स्वास्थ्य विभाग के कई बड़े अधिकारी उसी अस्पताल परिसर में मौजूद थे।

बताया जा रहा है कि प्रमुख सचिव स्वास्थ्य, डीजी हेल्थ और सीएमओ जैसे वरिष्ठ अधिकारी अस्पताल में मौजूद थे। कुछ ही समय पहले उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक भी वहां से दौरा करके निकले थे। इसके बावजूद किसी की नजर उस मरीज पर नहीं पड़ी, जो एंबुलेंस में तड़प रहा था।

यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब इतने बड़े अधिकारी मौके पर मौजूद थे, तब भी मरीज को तत्काल मदद क्यों नहीं मिल सकी?

⚠️ सिस्टम की खामियां या लापरवाही?

इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी अस्पतालों में व्यवस्थाएं केवल कागजों तक ही सीमित हैं? क्या जमीन पर हालात इतने कमजोर हैं कि एक गंभीर मरीज को समय पर वेंटिलेटर तक नहीं मिल पाता?

अक्सर देखा जाता है कि मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर किया जाता है, जिससे इलाज में देरी होती है और कई बार मरीज की जान चली जाती है।

🗣️ डॉक्टरों का पक्ष

इस मामले में केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर के सीएमएस डॉ. प्रेमराज सिंह का कहना है कि अस्पताल में हर मरीज को बेहतर इलाज देने की कोशिश की जाती है। उन्होंने बताया कि मरीज की स्थिति का आकलन करने में थोड़ा समय लगता है और अगर वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं होता, तो इसकी जानकारी परिजनों को दे दी जाती है।

उनका यह भी कहना है कि कई बार परिजन वेंटिलेटर मिलने की उम्मीद में इंतजार करते रहते हैं, जिससे मरीज की हालत और बिगड़ जाती है। हालांकि, इस मामले में उन्होंने यह माना कि संभवतः ऐसा ही कुछ हुआ होगा।

⚖️ हाईकोर्ट ने भी जताई चिंता

राजधानी के सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी का मुद्दा नया नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ पहले ही इस पर चिंता जता चुकी है।

कोर्ट ने राज्य सरकार से वेंटिलेटर की उपलब्धता, उनकी कार्य स्थिति और मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं पर विस्तृत रिपोर्ट और शपथ पत्र मांगा है। इससे साफ है कि समस्या गंभीर है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

👨‍👩‍👦 एक परिवार की टूटती उम्मीद

पारसनाथ पांडेय की मौत ने उनके परिवार को गहरा सदमा दिया है। जो परिवार इलाज की उम्मीद लेकर राजधानी आया था, उसे एक दर्दनाक अनुभव के साथ वापस लौटना पड़ा।

बेटे चंद्रप्रकाश का कहना है कि अगर समय पर इलाज मिल जाता, तो शायद उनके पिता की जान बच सकती थी। उनका यह भी आरोप है कि सिस्टम की लापरवाही ने उनके पिता की जान ले ली।

🔍 अब आगे क्या?

यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अगर समय रहते स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को मजबूत नहीं किया गया, तो ऐसी घटनाएं आगे भी होती रहेंगी।

सरकार और स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि:

अस्पतालों में वेंटिलेटर की संख्या बढ़ाई जाए

इमरजेंसी प्रक्रियाओं को तेज और सरल बनाया जाए

रेफरल सिस्टम को बेहतर किया जाए

जवाबदेही तय की जाए

लखनऊ जैसी राजधानी में अगर एक मरीज को वेंटिलेटर के लिए भटकना पड़े और आखिरकार एंबुलेंस में ही उसकी मौत हो जाए, तो यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है।

यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या स्वास्थ्य सेवाएं वास्तव में आम लोगों तक पहुंच रही हैं, या फिर यह सिर्फ दावों तक ही सीमित हैं।

A tragic case of hospital negligence in Lucknow highlights the ongoing healthcare crisis in Uttar Pradesh, where an elderly patient from Gorakhpur died after failing to receive a ventilator on time. Despite being shifted between KGMU and Balrampur Hospital, delays in emergency response, ventilator shortage, and administrative inefficiencies led to the patient’s death in an ambulance. This incident raises serious concerns about ventilator availability, hospital preparedness, and the overall state of emergency medical services in India.

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