AIN NEWS 1 सहारनपुर: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को गिराए जाने के बाद मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। 5 सितंबर 2026 को प्रशासन ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में मस्जिद को ध्वस्त कर दिया था। कार्रवाई के बाद अब मस्जिद के मुतवल्ली तनवीर अहमद सामने आए हैं और उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई तथा पूरे मुकदमे की कानूनी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
तनवीर अहमद का सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2 सितंबर को जिला जज की अदालत से पारित आदेश में मस्जिद को गिराने का स्पष्ट निर्देश नहीं था, बल्कि उनके अनुसार उस आदेश में निचली अदालत के बेदखली संबंधी आदेश के खिलाफ दाखिल अपील को खारिज किया गया था। ऐसे में उनका सवाल है कि आखिर मस्जिद पर बुलडोजर चलाने का आधार क्या था और ध्वस्तीकरण का निर्णय किस आदेश के तहत लिया गया?
हालांकि प्रशासन का कहना है कि शहर मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश में सरकारी जमीन पर कथित अनधिकृत कब्जे से बेदखली का निर्देश दिया गया था। इसके खिलाफ दाखिल अपील जिला अदालत ने 2 सितंबर को खारिज कर दी। प्रशासन के मुताबिक इसके बाद बेदखली आदेश का अनुपालन करते हुए मस्जिद को हटाया गया।
मुतवल्ली ने उठाया ध्वस्तीकरण के आदेश का सवाल
मुतवल्ली तनवीर अहमद के मुताबिक पूरे मामले में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि अदालत ने वास्तव में क्या आदेश दिया था। उनका कहना है कि जिला जज के 2 सितंबर के फैसले में सीधे तौर पर मस्जिद को तोड़ने की बात नहीं कही गई थी।
तनवीर अहमद का तर्क है कि अदालत के आदेश और प्रशासन की कार्रवाई के बीच की कानूनी कड़ी को स्पष्ट किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि अदालत ने केवल बेदखली के आदेश को बरकरार रखा था तो प्रशासन ने उसे किस तरह ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का आधार बनाया, यह कानूनी रूप से महत्वपूर्ण सवाल है।
इसी बिंदु को लेकर अब मस्जिद प्रबंधन अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। ताजा जानकारी के मुताबिक इस विवाद को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका भी दाखिल की जा चुकी है। याचिका में 16 जुलाई 2026 के शहर मजिस्ट्रेट के आदेश और 2 सितंबर के जिला जज के आदेश को चुनौती दी गई है।
315 वर्ग मीटर सरकारी जमीन का विवाद
इस पूरे मामले की शुरुआत मस्जिद की जमीन को लेकर हुए विवाद से हुई। प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित करीब 315 वर्ग मीटर जमीन को सरकारी भूमि माना गया और मस्जिद को उस पर अनधिकृत कब्जे के रूप में चिन्हित किया गया।
शहर मजिस्ट्रेट ने 16 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत कार्रवाई करते हुए परिसर खाली करने का आदेश दिया था। इसी आदेश में कथित अनधिकृत कब्जे को लेकर करीब 6.41 करोड़ रुपये की राशि का जुर्माना भी लगाया गया था।
मस्जिद प्रबंधन ने इस आदेश के खिलाफ जिला अदालत में अपील की। 2 सितंबर को जिला जज की अदालत ने अपील खारिज कर दी। इसके तीन दिन बाद, 5 सितंबर की सुबह प्रशासन ने मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे।
वक्फ बोर्ड को पक्षकार नहीं बनाने का दावा
मुतवल्ली तनवीर अहमद ने मुकदमे की प्रकृति को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका दावा है कि मस्जिद वक्फ बोर्ड में दर्ज थी और ऐसी स्थिति में वक्फ बोर्ड की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए था।
उनका कहना है कि यदि किसी संपत्ति का संबंध वक्फ से है तो उसके रिकॉर्ड, प्रबंधन और कानूनी स्थिति की जांच संबंधित दस्तावेजों के आधार पर होनी चाहिए। तनवीर अहमद का आरोप है कि इस मामले में उनके खिलाफ मुकदमा चलाया गया, जबकि वक्फ बोर्ड को मामले में पक्षकार बनाए जाने की जरूरत थी।
यह मुद्दा अब कानूनी बहस का हिस्सा बन सकता है। हालांकि वक्फ संपत्ति की वास्तविक स्थिति, रिकॉर्ड में उसका दर्ज होना और संबंधित पक्षों की कानूनी भूमिका का अंतिम निर्धारण अदालत के सामने उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर ही होगा।
“मुतवल्ली का काम हिसाब-किताब देखना है”
तनवीर अहमद ने अपने खिलाफ चल रही कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि वह मस्जिद के मुतवल्ली के रूप में हिसाब-किताब देखने का काम करते थे।
उन्होंने बताया कि जब वह और अन्य लोग मस्जिद में नमाज पढ़ने जाते थे, तब उनसे मस्जिद का हिसाब-किताब देखने के लिए कहा गया। इसके बाद उन्होंने यह जिम्मेदारी संभालनी शुरू की और बाद में उन्हें मुतवल्ली का पद दे दिया गया।
तनवीर अहमद का दावा है कि मुकदमे उनके नाम से चलाए गए, लेकिन न तो बैंक खाते में उनके नाम की स्थिति थी और न ही वक्फ के रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज था। इसी आधार पर उन्होंने सवाल उठाया कि उन्हें मुतवल्ली मानकर उनके खिलाफ कार्रवाई किस आधार पर की गई।
उनका कहना है कि किसी व्यक्ति को मुतवल्ली मानने से पहले संबंधित रिकॉर्ड, नियुक्ति की प्रक्रिया और दस्तावेजों की जांच की जानी चाहिए थी।
करीब 500 वकीलों की सलाह से आगे बढ़ेगी कानूनी लड़ाई
मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद अब मस्जिद प्रबंधन कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। तनवीर अहमद के अनुसार मुस्लिम समाज और बड़ी संख्या में वकील इस मामले में कानूनी पक्ष को मजबूत करने के लिए आगे आए हैं।
उन्होंने बताया कि करीब 500 वकीलों की सलाह के बाद आगे की कानूनी रणनीति तैयार की जाएगी। उनका कहना है कि मामले को भावनात्मक या राजनीतिक तरीके से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और कानून के आधार पर अदालत के सामने रखा जाएगा।
इस बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल याचिका से यह विवाद अब उच्च न्यायालय के स्तर पर पहुंच गया है। याचिका में प्रशासनिक और न्यायिक आदेशों की वैधता को चुनौती दी गई है।
यूपी में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल: 5 IAS और 6 PCS अफसरों के तबादले, जालौन-बहराइच के DM भी बदले
प्रशासन का क्या कहना है?
दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि पूरी कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई। अधिकारियों के अनुसार शहर मजिस्ट्रेट ने सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे के मामले में बेदखली का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ दाखिल अपील जिला अदालत ने खारिज कर दी, जिसके बाद कार्रवाई की गई।
सहारनपुर के अधिकारियों ने यह भी कहा कि ध्वस्तीकरण के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया गया था। प्रशासन का दावा है कि कार्रवाई अदालत के आदेशों के अनुपालन में की गई और सभी आवश्यक एहतियाती कदम उठाए गए।
अब हाईकोर्ट में तय होगी अगली दिशा
मस्जिद को गिराए जाने के बाद विवाद का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव इलाहाबाद हाईकोर्ट हो सकता है। वहां दाखिल याचिका में 16 जुलाई के शहर मजिस्ट्रेट के आदेश और 2 सितंबर के जिला जज के आदेश को चुनौती दी गई है।
यानी अब इस मामले में मुख्य सवाल केवल मस्जिद के निर्माण या जमीन के स्वामित्व तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ यह भी जांच का विषय बन गया है कि बेदखली के आदेश को लागू करने की प्रशासनिक प्रक्रिया क्या थी, ध्वस्तीकरण के लिए किस कानूनी आधार का इस्तेमाल किया गया और मस्जिद प्रबंधन तथा वक्फ से जुड़े दावों पर कानून के तहत किस तरह विचार किया जाना चाहिए।
फिलहाल दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। प्रशासन इसे सरकारी जमीन से अनधिकृत कब्जा हटाने की कार्रवाई बता रहा है, जबकि मस्जिद के मुतवल्ली इसे प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवालों वाला मामला बता रहे हैं। अब अदालत में पेश होने वाले रिकॉर्ड और दस्तावेज ही इस विवाद की कानूनी दिशा को स्पष्ट करेंगे।
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि 5 सितंबर को मस्जिद गिराए जाने के बाद मलबे के नीचे करीब 20 फीट गहरा कुआं मिलने की रिपोर्ट भी सामने आई है। इस कुएं की उम्र और ऐतिहासिक महत्व की जांच के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की भूमिका पर भी विचार किया जा रहा है।
The Saharanpur Collectorate Mosque Demolition has triggered a legal and administrative controversy after the mosque was demolished on September 5, 2026. Mosque mutawalli Tanveer Ahmed has questioned the demolition process, arguing that the September 2 district court order did not explicitly direct demolition. The Saharanpur Mosque Case concerns alleged unauthorised occupation of government land, the role of the Waqf Board and the validity of the eviction proceedings. The matter has now reached the Allahabad High Court, where the legal status of the orders and the demolition process may be examined.



















