AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश में आम लोगों की शिकायतों और समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए जिलाधिकारियों (DM) और पुलिस अधिकारियों को सरकारी मोबाइल/CUG नंबर उपलब्ध कराए गए हैं। इन नंबरों का मकसद साफ है—जरूरत पड़ने पर आम नागरिक सीधे जिले के वरिष्ठ अधिकारी तक अपनी बात पहुंचा सके। लेकिन इन सरकारी नंबरों की उपलब्धता को लेकर सामने आई एक मीडिया पड़ताल ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि यूपी के सभी 75 जिलों में DM और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के सरकारी नंबरों पर संपर्क करने की कोशिश की गई। रिपोर्ट के अनुसार, सात दिनों तक अलग-अलग समय पर फोन किए गए। पड़ताल में बड़ी संख्या में अधिकारी खुद फोन पर उपलब्ध नहीं मिले। हालांकि, इस रिपोर्ट के कुछ आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह मीडिया संस्थान की अपनी पड़ताल है, कोई आधिकारिक सरकारी ऑडिट नहीं।

75 में 72 DM से नहीं हो सकी सीधे बात
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, 75 जिलों के जिलाधिकारियों के सरकारी नंबरों पर संपर्क करने का प्रयास किया गया। इनमें से 72 DM से सीधे फोन पर बातचीत नहीं हो सकी।
कई जगह फोन उनके कार्यालय के कर्मचारियों या PRO ने उठाया। कुछ मामलों में बताया गया कि DM बैठक में हैं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में व्यस्त हैं या किसी अन्य सरकारी कार्यक्रम में गए हुए हैं।
रिपोर्ट में इटावा के तत्कालीन DM शुभ्रांत कुमार शुक्ला और लखीमपुर खीरी के DM अंजनी कुमार सिंह के सरकारी नंबर पर खुद बातचीत होने का उल्लेख किया गया है। कुछ अन्य जगहों पर भी वरिष्ठ अधिकारी के बजाय कार्यालय का स्टाफ फोन पर मिला।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि “72 DM ने फोन नहीं उठाया” का मतलब यह नहीं है कि सभी 72 अधिकारियों ने जानबूझकर जनता की कॉल काट दी या फोन बंद रखा। कई मामलों में कार्यालय के कर्मचारियों ने कॉल रिसीव की और अधिकारी के व्यस्त होने की जानकारी दी।
पुलिस अधिकारियों से भी नहीं हो सकी सीधी बातचीत
पुलिस विभाग की स्थिति भी इस पड़ताल में सवालों के घेरे में रही। यूपी में 68 जिलों में SP/SSP व्यवस्था है, जबकि 7 शहरों में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू है।
रिपोर्ट के अनुसार, 68 जिलों के SP/SSP और सात पुलिस कमिश्नरेट के संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों के सरकारी नंबरों पर संपर्क किया गया, लेकिन किसी पुलिस प्रमुख से सीधे बातचीत नहीं हो सकी।
इसलिए वायरल हो रही लाइन “एक भी SSP ने फोन नहीं उठाया” पूरी तरह सटीक नहीं मानी जानी चाहिए। दरअसल, सभी जिलों में पुलिस प्रमुख का पद SSP नहीं है और सात जगह कमिश्नरेट व्यवस्था है।
कई जगह कर्मचारियों ने संभाली कॉल
पड़ताल के दौरान कई सरकारी नंबरों पर कॉल उठाने वाले कर्मचारियों ने बताया कि संबंधित अधिकारी बैठक में हैं। कुछ स्थानों पर कॉल करने वाले को कार्यालय आने, संबंधित SDM या दूसरे अधिकारी से संपर्क करने की सलाह दी गई।
कुछ नंबरों पर कॉल का जवाब नहीं मिला, जबकि कुछ जगहों पर नंबर व्यस्त या पहुंच से बाहर होने की स्थिति भी सामने आने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
यह व्यवस्था उस समय ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जब कोई नागरिक स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं होने के बाद जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक या पुलिस अधिकारी से संपर्क करना चाहता है।
आखिर सरकारी CUG नंबर क्यों दिए जाते हैं?
सरकारी CUG यानी Closed User Group मोबाइल नंबर वरिष्ठ अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों के आधिकारिक संपर्क के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
इनका उद्देश्य केवल अधिकारियों के बीच संपर्क बनाए रखना नहीं है। कई सरकारी विभागों में ऐसे नंबर इसलिए भी दिए जाते हैं ताकि जरूरी स्थिति में आम लोग संबंधित अधिकारी के कार्यालय तक पहुंच सकें।
DM जिले का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होता है। वहीं SP या SSP जिले में पुलिस व्यवस्था का नेतृत्व करता है। ऐसे में उनके आधिकारिक संपर्क नंबरों की उपलब्धता प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ जाती है।
पुलिस के करीब 25 हजार CUG कनेक्शन
रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश पुलिस के CUG नेटवर्क को लेकर भी बड़ा आंकड़ा सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पुलिस विभाग में करीब 25 हजार CUG SIM कनेक्शन इस्तेमाल किए जाते हैं।
इन मोबाइल कनेक्शनों को चालू रखने, मोबाइल सेवाओं और डेटा आदि से जुड़े खर्च के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 में करीब 9 करोड़ रुपये के प्रावधान का उल्लेख रिपोर्टों में किया गया है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। इसे सीधे यह कहना सही नहीं होगा कि “DM और SP के फोन के रिचार्ज पर 9 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।” करीब 9 करोड़ रुपये का आंकड़ा पुलिस विभाग के CUG कनेक्शनों से संबंधित बताया गया है और यह केवल DM-SP के मोबाइल नंबरों तक सीमित खर्च नहीं माना जा सकता।
पहले भी दिए जा चुके हैं फोन उपलब्ध रखने के निर्देश
सरकारी अधिकारियों के मोबाइल नंबरों पर जनता की पहुंच का मुद्दा नया नहीं है। पहले भी उत्तर प्रदेश में वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को सरकारी मोबाइल नंबर अपने पास रखने और जरूरत पड़ने पर जनता से संपर्क बनाए रखने को लेकर निर्देश दिए जाने की बात सामने आती रही है।
ऐसे निर्देशों का मूल उद्देश्य यही है कि किसी नागरिक को गंभीर समस्या होने पर वह सरकारी तंत्र के वरिष्ठ स्तर तक अपनी बात पहुंचा सके।
लेकिन केवल मोबाइल नंबर जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या जरूरत के समय वह नंबर वास्तव में काम करता है और क्या नागरिक की बात उचित अधिकारी तक पहुंचती है?
क्या हर कॉल का जवाब DM या SSP खुद देंगे?
यहां एक और महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। किसी सरकारी अधिकारी का हर कॉल स्वयं उठाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। DM और SP/SSP दिनभर बैठकों, कानून-व्यवस्था, निरीक्षण, प्रशासनिक कार्यों और आपात स्थितियों में व्यस्त रहते हैं।
इसलिए अगर अधिकारी खुद फोन नहीं उठा पाते हैं तो उनके कार्यालय में प्रशिक्षित स्टाफ, PRO या अधिकृत अधिकारी की व्यवस्था होनी चाहिए, जो शिकायत को दर्ज करके उसे संबंधित अधिकारी तक पहुंचाए।
समस्या तब पैदा होती है जब न अधिकारी फोन पर उपलब्ध हों और न ही कॉल करने वाले की समस्या दर्ज करने की कोई प्रभावी व्यवस्था हो।
जनता के लिए इसका क्या मतलब है?
किसी जिले का आम नागरिक जब DM या SP के सरकारी नंबर पर कॉल करता है तो उसकी उम्मीद होती है कि उसकी समस्या कम से कम संबंधित अधिकारी या उनके कार्यालय तक पहुंच जाएगी।
अगर फोन लगातार नहीं उठता या केवल यह जानकारी मिलती है कि अधिकारी व्यस्त हैं, तो नागरिक के लिए अगला रास्ता स्पष्ट होना चाहिए।
यही वजह है कि सरकारी CUG व्यवस्था को केवल मोबाइल कनेक्शन देने की योजना के रूप में नहीं, बल्कि जवाबदेही और जनसुनवाई की व्यवस्था के रूप में देखना जरूरी है।
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AIN NEWS 1 का फैक्ट-चेक निष्कर्ष
दैनिक भास्कर की पड़ताल को पूरी तरह फर्जी बताने का आधार नहीं मिला है। रिपोर्ट में 75 जिलों के DM और पुलिस अधिकारियों के सरकारी नंबरों पर किए गए संपर्क का विस्तृत दावा किया गया है। हालांकि, 72 DM और करीब 9 करोड़ रुपये जैसे आंकड़ों को सरकारी ऑडिट का प्रमाणित आंकड़ा नहीं, बल्कि मीडिया रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित होगा।
इसी तरह “एक भी SSP ने फोन नहीं उठाया” कहना भ्रामक हो सकता है, क्योंकि यूपी के सभी जिलों में SSP व्यवस्था नहीं है और सात शहर पुलिस कमिश्नरेट के तहत आते हैं।
सबसे बड़ा सवाल फिर भी वही है—जब जनता के लिए सरकारी फोन नंबर जारी किए जाते हैं और उन पर सरकारी पैसा खर्च होता है, तो जरूरत के वक्त आम नागरिक की आवाज आखिर किस अधिकारी तक पहुंचती है?
A recent media investigation into UP government officers phone numbers examined the accessibility of District Magistrates (DMs), SPs, SSPs and police commissionerates across Uttar Pradesh. The report claimed that direct contact could not be established with 72 of 75 DMs and with senior police officials across 68 districts and seven police commissionerates. The investigation also highlighted the use of around 25,000 UP Police CUG SIM connections and a reported provision of around Rs 9 crore for CUG-related expenses in 2026-27. The findings raise questions about government officer accessibility, public grievance redressal and administrative accountability in Uttar Pradesh.



















