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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद: माफी, प्रोटोकॉल और संगम स्नान को लेकर प्रशासन बैकफुट पर

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AIN NEWS 1 | प्रयागराज माघ मेले के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच उपजा विवाद अब एक बड़े धार्मिक-प्रशासनिक टकराव का रूप ले चुका है। मौनी अमावस्या के दिन हुए घटनाक्रम के बाद यह मामला केवल एक स्नान व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सनातन परंपरा, संत सम्मान और प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़ा विषय बन गया। अब शंकराचार्य के शिष्यों का दावा है कि प्रयागराज प्रशासन माफी मांगने को तैयार हो गया है और लखनऊ के दो वरिष्ठ अधिकारी स्वयं संगम स्नान की व्यवस्था कराएंगे। हालांकि शंकराचार्य ने इसके लिए दो स्पष्ट शर्तें रखी हैं।

क्या है पूरा मामला?

माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या को शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पारंपरिक पालकी के साथ संगम स्नान के लिए निकले थे। इसी दौरान पुलिस और मेला प्रशासन ने भीड़ नियंत्रण का हवाला देते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। प्रशासन ने पालकी से स्नान की अनुमति नहीं दी और पैदल जाने को कहा गया।

इस बात को लेकर शंकराचार्य के शिष्यों और पुलिसकर्मियों के बीच धक्का-मुक्की हुई। आरोप है कि कुछ शिष्यों के साथ अभद्रता और मारपीट भी की गई। यह घटना शंकराचार्य और उनके अनुयायियों को अत्यंत आहत करने वाली लगी।

धरना, नाराजगी और बढ़ता विवाद

घटना के बाद शंकराचार्य अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए। उनका कहना था कि यह केवल उनका अपमान नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं और शंकराचार्य पद की गरिमा का अपमान है। देखते ही देखते यह मुद्दा संत समाज में चर्चा का विषय बन गया।

सोशल मीडिया पर भी मामला तेजी से फैला और कई बार X (पूर्व ट्विटर) पर ट्रेंड करता रहा। आम श्रद्धालुओं के बीच भी प्रशासन के रवैये को लेकर नाराजगी देखने को मिली।

प्रशासन की कोशिश: सीक्रेट मीटिंग

विवाद को शांत करने के लिए 27 जनवरी की शाम प्रयागराज माघ मेला क्षेत्र में एक गोपनीय बैठक बुलाई गई। यह बैठक धर्म संघ के शिविर में हुई, जो शंकराचार्य के शिविर से कुछ दूरी पर स्थित है।

इस बैठक में मेला अधिकारी ऋषि राज, अपर मेला अधिकारी दयानंद प्रसाद समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। शंकराचार्य स्वयं बैठक में शामिल नहीं हुए। उनकी ओर से प्रयागराज के मनकामेश्वर मंदिर के महंत श्रीधरानंद ब्रह्मचारी को प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया।

बैठक में क्या सहमति बनी?

बैठक में प्रशासन की ओर से तीन प्रमुख बातें रखी गईं:

  1. मौनी अमावस्या के दिन भीड़ प्रबंधन के कारण शंकराचार्य स्नान नहीं कर सके, इसका प्रशासन को खेद है।
  2. शंकराचार्य जब चाहें, उन्हें पारंपरिक मर्यादा के अनुसार ससम्मान संगम स्नान कराया जाएगा।
  3. भविष्य में चारों शंकराचार्यों के लिए प्रोटोकॉल व्यवस्था को लेकर विशेष सतर्कता बरती जाएगी।

इन तीनों बिंदुओं पर प्रतिनिधि स्तर पर सहमति बन गई।

जहां बात अटक गई

विवाद का असली मोड़ तब आया जब माफी को लेकर चर्चा हुई। शंकराचार्य की ओर से स्पष्ट मांग रखी गई कि:

  • प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी मांगे
  • माफी लिखित रूप में दी जाए

प्रशासन ने गलती स्वीकार तो की, लेकिन “माफी” शब्द बोलने से इनकार कर दिया। अधिकारियों का कहना था कि वे केवल “खेद प्रकट” कर सकते हैं, सार्वजनिक माफीनामा देना उनके लिए संभव नहीं है।

जब इन बातों को लिखित रूप में देने की मांग की गई, तो उसे भी अस्वीकार कर दिया गया। यहीं पर सहमति टूट गई।

शंकराचार्य का माघ मेला छोड़ने का फैसला

सीक्रेट मीटिंग की पूरी जानकारी रात में ही शंकराचार्य तक पहुंचा दी गई। प्रशासन की सीमित सहमति से संतुष्ट न होकर उन्होंने माघ मेला छोड़ने का निर्णय लिया।

28 जनवरी की सुबह शंकराचार्य ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपने फैसले की घोषणा की और बिना संगम स्नान किए प्रयागराज से प्रस्थान कर वाराणसी चले गए।

उनका कहना था कि जब मन आहत हो और आत्मसम्मान को ठेस पहुंची हो, तब पवित्र जल भी शांति नहीं दे सकता।

वाराणसी में रणनीति और समर्थन

वाराणसी पहुंचने के बाद शंकराचार्य ने संतों के साथ बैठक की और आगे की रणनीति तय की। इस दौरान कंप्यूटर बाबा भी उनके समर्थन में खुलकर सामने आए और मौनी अमावस्या से उनके साथ डटे रहे।

संत समाज में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सरकार के प्रति असंतोष की भावना उभरने लगी।

सरकार क्यों आई बैकफुट पर?

सूत्रों के अनुसार, विवाद बढ़ने के पीछे कई कारण रहे:

  • संत समाज का दबाव लगातार बढ़ रहा था
  • सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना हो रही थी
  • उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य खुले तौर पर शंकराचार्य के पक्ष में बयान दे रहे थे

बताया जाता है कि उन्होंने यहां तक कहा कि यदि कोई कहेगा तो वे स्वयं शंकराचार्य से मिलने जाएंगे।

इन परिस्थितियों में सरकार नहीं चाहती थी कि यह मामला और तूल पकड़े। इसलिए लखनऊ स्तर से वरिष्ठ अधिकारियों को समाधान की जिम्मेदारी सौंपी गई।

अब क्या प्रस्ताव आया है?

शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी योगीराज सरकार के अनुसार:

  • लखनऊ के दो वरिष्ठ अधिकारी वाराणसी आकर शंकराचार्य से मुलाकात करेंगे
  • माघ पूर्णिमा पर उन्हें ससम्मान प्रयागराज लाया जाएगा
  • संगम में विधिवत स्नान कराया जाएगा

हालांकि शंकराचार्य ने इसके लिए दो शर्तें स्पष्ट कर दी हैं:

  1. जिम्मेदार अधिकारी लिखित माफीनामा दें
  2. चारों शंकराचार्यों के लिए समान प्रोटोकॉल व्यवस्था लागू हो

इन शर्तों के पूरा होने पर ही आगे बात बढ़ेगी।

पूरे विवाद को 5 बिंदुओं में समझें

  1. मौनी अमावस्या पर पालकी सहित स्नान से रोका गया
  2. शिष्यों से धक्का-मुक्की और अभद्रता का आरोप
  3. देर रात नोटिस चस्पा करने को लेकर विवाद
  4. प्रशासन द्वारा माफी से इनकार, केवल खेद पर सहमति
  5. शंकराचार्य का माघ मेला छोड़कर वाराणसी प्रस्थान

यह पूरा मामला अब केवल एक धार्मिक आयोजन से जुड़ा विवाद नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक संवेदनशीलता, परंपराओं के सम्मान और संत समाज के आत्मसम्मान से जुड़ा विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या प्रशासन शंकराचार्य की शर्तें मानता है या यह विवाद और गहराता है।

The Shankaracharya Avimukteshwaranand controversy during the Prayagraj Magh Mela has become a major issue involving religious protocol, administrative responsibility, and saint community sentiments. The dispute began after the administration stopped the Shankaracharya from traditional Sangam Snan on Mauni Amavasya, leading to protests, social media outrage, and political pressure. Now, the Prayagraj administration is reportedly ready to apologize, while senior Lucknow officials may arrange a respectful holy dip on Magh Purnima, making this issue highly significant for Indian religious governance and tradition management.

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