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गाजियाबाद में डिजिटल अरेस्ट का बड़ा मामला: फर्जी पुलिस, ईडी और कोर्ट के डर से रिटायर्ड बैंक मैनेजर से 2.20 करोड़ की ठगी!

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AIN NEWS 1: गाजियाबाद में साइबर ठगी का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां साइबर अपराधियों ने कानून और जांच एजेंसियों का डर दिखाकर 84 वर्षीय रिटायर्ड बैंक मैनेजर और उनकी पत्नी को अपना शिकार बना लिया। ठगों ने खुद को पुलिस अधिकारी, प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारी और यहां तक कि जज बताकर पीड़ित दंपति को 12 दिनों तक मानसिक दबाव में रखा। इस दौरान उनसे करीब 2.20 करोड़ रुपये की रकम अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करा ली गई।

यह पूरा मामला डिजिटल अरेस्ट साइबर फ्रॉड से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसमें अपराधी वीडियो कॉल के जरिए नकली जांच प्रक्रिया दिखाकर लोगों को डराते हैं और उन्हें पैसे भेजने के लिए मजबूर कर देते हैं।

538 करोड़ रुपये के घोटाले का डर दिखाकर शुरू हुआ खेल

जानकारी के मुताबिक, गाजियाबाद निवासी रिटायर्ड बैंक मैनेजर के पास अचानक एक फोन कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताया और कहा कि उनके नाम से 538 करोड़ रुपये के बड़े वित्तीय घोटाले की जांच चल रही है।

आरोपियों ने पीड़ित को बताया कि उनके बैंक खाते और पहचान का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर अपराधों में किया गया है। यह सुनकर बुजुर्ग दंपति घबरा गए।

इसके बाद ठगों ने उन्हें विश्वास दिलाने के लिए वीडियो कॉल का सहारा लिया। वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी पहने कुछ लोग दिखाई दिए और उन्होंने खुद को अधिकारी बताया। उन्होंने पीड़ितों को लगातार यह एहसास कराया कि वे एक गंभीर कानूनी कार्रवाई में फंस चुके हैं।

फर्जी पुलिस के बाद आया ED अधिकारी और नकली जज

साइबर अपराधियों ने ठगी की पूरी कहानी को असली दिखाने के लिए कई किरदार तैयार किए। पहले नकली पुलिस अधिकारी बनकर डराया गया। इसके बाद कथित ईडी अधिकारी ने जांच का हवाला दिया।

ठगों ने यहीं नहीं रोका। उन्होंने एक व्यक्ति को जज बनाकर वीडियो कॉल पर पेश किया, जिसने कथित तौर पर पीड़ितों को बताया कि उनके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया चल रही है और अगर उन्होंने जांच में सहयोग नहीं किया तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान पीड़ित दंपति को किसी से संपर्क करने से मना किया गया। उन्हें कहा गया कि मामला बेहद गोपनीय है और इसकी जानकारी किसी अन्य व्यक्ति को देने पर कार्रवाई हो सकती है।

जमा पूंजी खत्म होने के बाद लिया 70 लाख रुपये का कर्ज

लगातार डर और दबाव के कारण बुजुर्ग दंपति ठगों के निर्देशों का पालन करते रहे। उन्होंने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी ठगों के बताए बैंक खातों में भेज दी।

जब उनकी खुद की रकम खत्म हो गई तो उन्होंने करीब 70 लाख रुपये तक उधार लेकर भी आरोपियों के खातों में ट्रांसफर कर दिए।

कुल मिलाकर ठगों ने उनसे लगभग 2.20 करोड़ रुपये की ठगी कर ली।

पीड़ितों को बाद में जब एहसास हुआ कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई है, तब उन्होंने मामले की शिकायत साइबर पुलिस से की। पुलिस ने शिकायत दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों से बढ़ी चिंता

पिछले कुछ समय में डिजिटल अरेस्ट के मामलों में तेजी आई है। साइबर अपराधी अब लोगों को डराने के लिए पुलिस, सीबीआई, ईडी, कोर्ट और अन्य सरकारी संस्थाओं के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इन मामलों में ठग पीड़ितों को यह विश्वास दिलाते हैं कि वे किसी अपराध में फंस चुके हैं। इसके बाद जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, कोई भी सरकारी जांच एजेंसी वीडियो कॉल के जरिए किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं रखती और न ही जांच पूरी करने के नाम पर पैसे जमा कराने के लिए कहती है।

पुलिस ने लोगों से की सावधानी बरतने की अपील

साइबर पुलिस ने लोगों से अपील की है कि अगर किसी अनजान व्यक्ति का फोन आता है और वह पुलिस, ईडी या कोर्ट का अधिकारी बनकर डराने की कोशिश करता है तो तुरंत सतर्क हो जाएं।

किसी भी स्थिति में अपने बैंक खाते, ओटीपी, पासवर्ड या निजी जानकारी किसी के साथ साझा न करें। अगर कोई व्यक्ति जांच के नाम पर पैसे मांगता है तो इसकी सूचना तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन को दें।

गाजियाबाद का यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि साइबर अपराधी अब उम्र, पद या अनुभव नहीं देखते। वे केवल डर और भरोसे का फायदा उठाकर लोगों को आर्थिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। जागरूकता और सतर्कता ही ऐसे अपराधों से बचने का सबसे बड़ा तरीका है।

Ghaziabad Digital Arrest Scam has shocked people after an 84-year-old retired bank manager and his wife were allegedly cheated of Rs 2.20 crore by cyber criminals. The fraudsters used fake police officers, fake ED officials and a fake judge through video calls to create fear and force the victims to transfer money. This case highlights the growing threat of digital arrest scams, online fraud, cyber crime and identity-based financial scams in India.

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