AIN NEWS 1 गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश। भाजपा नेता गजेंद्र भाटी उर्फ गज्जी भाटी हत्याकांड में अदालत से बरी होने के बाद साहिबाबाद के पूर्व विधायक अमरपाल शर्मा ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। मंगलवार को इंदिरापुरम स्थित अपने कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता के दौरान उन्होंने मामले को राजनीतिक साजिश करार दिया और कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था। करीब नौ साल तक चले मुकदमे में राहत मिलने के बाद उन्होंने सवाल उठाया कि इस दौरान उनकी प्रतिष्ठा, राजनीतिक जीवन और मानसिक शांति को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
अमरपाल शर्मा ने आरोप लगाया कि उन्हें राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण हत्या के मामले में फंसाया गया। उनके मुताबिक, इस मुकदमे ने उनके जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष प्रभावित किए और उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाया। हालांकि, राजनीतिक साजिश के उनके आरोपों को उनके दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अदालत के फैसले का आधार अभियोजन पक्ष द्वारा आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों से साबित नहीं कर पाना रहा।
नौ साल तक मुकदमा चलने के बाद मिली राहत
गाजियाबाद के खोड़ा इलाके में वर्ष 2017 में हुए गज्जी भाटी हत्याकांड की सुनवाई लंबे समय तक एमपी-एमएलए अदालत में चली। इस मामले में पूर्व विधायक अमरपाल शर्मा के साथ राजकुमार उर्फ राजू पहलवान और नरेंद्र कुमार उर्फ नरेंद्र फौजी भी आरोपी थे।
12 अक्टूबर 2026 को गाजियाबाद की एमपी-एमएलए अदालत ने तीनों आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहा। फैसले के बाद अमरपाल शर्मा ने इसे अपने लिए बड़ी कानूनी राहत बताया।
अगले दिन आयोजित प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा कि उन्हें शुरू से ही न्यायालय पर विश्वास था। उनके अनुसार, आखिरकार अदालत के फैसले से उन्हें राहत मिली है। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को अपने राजनीतिक जीवन के लिए नुकसानदेह बताया और कहा कि मुकदमे के कारण उन्हें लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
‘मेरे जीवन के नौ साल कौन लौटाएगा?’
प्रेसवार्ता के दौरान अमरपाल शर्मा ने मुकदमे के दौरान हुए नुकसान का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि यदि किसी व्यक्ति को वर्षों तक गंभीर आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़े और अंत में अदालत उसे बरी कर दे, तो उस अवधि में हुए मानसिक, सामाजिक और राजनीतिक नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
उनका कहना था कि किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और सामाजिक छवि उसके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। लंबे समय तक हत्या जैसे गंभीर मामले में आरोपी बने रहने से व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन पर भी असर पड़ सकता है।
शर्मा ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ ऐसा माहौल बनाया गया, जिससे उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचे। उन्होंने दावा किया कि उन्हें विकास की राजनीति से दूर करने और उनका राजनीतिक भविष्य प्रभावित करने की कोशिश की गई।
हालांकि, किसी मुकदमे में बरी होने और किसी व्यक्ति को जानबूझकर झूठे मामले में फंसाए जाने के बीच कानूनी अंतर होता है। अदालत से बरी होने का अर्थ है कि संबंधित मामले में अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका। राजनीतिक साजिश के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए अलग साक्ष्य आवश्यक होते हैं।
एफआईआर में नाम नहीं होने का उठाया सवाल
अमरपाल शर्मा ने मामले की शुरुआती जांच और एफआईआर को लेकर भी सवाल उठाए। उनका दावा है कि घटना के बाद दर्ज शुरुआती प्राथमिकी में उनका नाम शामिल नहीं था और बाद में जांच के दौरान उन्हें आरोपी बनाया गया।
उन्होंने सवाल किया कि यदि शुरुआत से ही उन्हें संदेह के दायरे में माना जा रहा था, तो एफआईआर दर्ज कराते समय उनका नाम क्यों नहीं लिया गया? उन्होंने मुकदमे में पेश किए गए गवाहों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए।
बचाव पक्ष की ओर से भी मुकदमे के दौरान साक्ष्यों और गवाहियों को लेकर दलीलें दी गई थीं। अंततः अदालत ने आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी एफआईआर में नाम दर्ज नहीं होने से किसी व्यक्ति की संलिप्तता अपने आप साबित या खारिज नहीं हो जाती। जांच के दौरान उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किसी व्यक्ति का नाम सामने आ सकता है। किसी आपराधिक मामले में अंतिम निष्कर्ष न्यायालय साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर निकालता है।
2 सितंबर 2017 को हुई थी गज्जी भाटी की हत्या
यह मामला 2 सितंबर 2017 का है। गाजियाबाद के खोड़ा इलाके में भाजपा नेता गजेंद्र भाटी, जिन्हें गज्जी भाटी के नाम से जाना जाता था, की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना में उनके साथी बलबीर सिंह चौहान भी गोली लगने से घायल हुए थे।
घटना के बाद इलाके में सनसनी फैल गई थी। गज्जी भाटी की हत्या का मामला स्थानीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बना। जांच के दौरान अमरपाल शर्मा, राजकुमार उर्फ राजू पहलवान और नरेंद्र कुमार उर्फ नरेंद्र फौजी के नाम सामने आए। आरोप लगाया गया कि अमरपाल शर्मा ने हत्या की साजिश रची थी, जबकि अन्य आरोपियों को शूटर बताया गया।
ये आरोप मुकदमे का हिस्सा थे। अदालत ने सुनवाई पूरी होने के बाद अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों को आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना और तीनों आरोपियों को बरी कर दिया।
अदालत के फैसले से क्या बदला?
इस फैसले से अमरपाल शर्मा और अन्य दोनों आरोपियों को गज्जी भाटी हत्याकांड के मुकदमे में बड़ी राहत मिली है। करीब नौ साल तक चले इस मामले में अब निचली अदालत ने अपना निर्णय सुना दिया है।
हालांकि, फैसले के बाद मामले का कानूनी पक्ष पूरी तरह समाप्त हो जाएगा या नहीं, यह आगे की कार्रवाई पर निर्भर करेगा। गज्जी भाटी के परिवार की ओर से अदालत के फैसले पर असंतोष जताया गया है। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, परिवार ने इस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कही है।
यदि फैसले के खिलाफ अपील या अन्य वैधानिक कार्यवाही की जाती है, तो उस पर आगे का निर्णय संबंधित न्यायालय करेगा। फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एमपी-एमएलए अदालत ने तीनों आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी किया है।
राजनीतिक भविष्य को लेकर भी चर्चा
अमरपाल शर्मा के बरी होने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। प्रेसवार्ता में उन्होंने अपने खिलाफ हुई कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जोड़ते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने संकेत दिया कि वह आगे भी सक्रिय राजनीति में बने रहना चाहते हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर उनसे सवाल पूछे गए, जिस पर उन्होंने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से मिलने की इच्छा जताई। हालांकि, किसी राजनीतिक दल से टिकट मिलने या चुनाव लड़ने के संबंध में अभी किसी आधिकारिक घोषणा को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
शर्मा के लिए अदालत से मिली राहत राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन इसका वास्तविक असर आने वाले समय में उनकी राजनीतिक गतिविधियों, पार्टी के फैसलों और क्षेत्र में उनके जनसमर्थन पर निर्भर करेगा।
परिवार की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण
इस मामले में जहां अमरपाल शर्मा ने बरी होने के बाद न्याय मिलने की बात कही है, वहीं मृतक गज्जी भाटी के परिवार ने फैसले पर असंतोष जताया है। परिवार की ओर से उच्च न्यायालय का रुख करने की बात सामने आई है।
ऐसे मामलों में मृतक के परिवार की न्याय पाने की मांग और आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार, दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर निर्णय करना है। यदि किसी पक्ष को निचली अदालत के फैसले से असहमति है, तो उसके पास कानून के तहत उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल करने का अधिकार होता है।
अब आगे क्या होगा?
गज्जी भाटी हत्याकांड में एमपी-एमएलए अदालत के फैसले के बाद अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि मृतक का परिवार उच्च न्यायालय में अपील दाखिल करता है या नहीं। दूसरी ओर, अमरपाल शर्मा ने फैसले के बाद अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते हुए सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी है।
करीब नौ साल पुराने इस मामले में अदालत का फैसला एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। अमरपाल शर्मा के लिए यह कानूनी राहत का अवसर है, जबकि मृतक के परिवार की ओर से फैसले को चुनौती देने की संभावना मामले को आगे बढ़ा सकती है।
फिलहाल, इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि गाजियाबाद की एमपी-एमएलए अदालत ने 12 अक्टूबर 2026 को अमरपाल शर्मा, राजकुमार उर्फ राजू पहलवान और नरेंद्र कुमार उर्फ नरेंद्र फौजी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। राजनीतिक साजिश और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने संबंधी बयान अमरपाल शर्मा के आरोप हैं, जबकि आगे की कानूनी स्थिति परिवार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों और संबंधित न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करेगी।
Former Sahibabad MLA Amarpal Sharma has been acquitted in the 2017 Gajji Bhati murder case by the MP-MLA court in Ghaziabad. The court acquitted Amarpal Sharma, Rajkumar alias Raju Pehalwan, and Narendra Kumar alias Narendra Fauji due to insufficient evidence. Following the verdict, Amarpal Sharma alleged a political conspiracy and questioned who would compensate him for the nine years he says he lost during the legal battle. The Gajendra Bhati murder case remains a significant development in Ghaziabad news, with the victim’s family reportedly considering challenging the court’s decision in the High Court.



















